संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | १०३९ |
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हुआ। युधिष्ठिर! जो कोई भी उस तीर्थमें उपवासपूर्वक ईशान देवका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। उस तीर्थमें स्नान करके जो ब्राह्मण ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदकी एक-एक ऋचाका भी पाठ करता है, उसे चारों वेदोंके पाठका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य वहाँ ब्राह्मणोंके लिये गोदान अथवा अन्नदान करता है, उस गौ तथा उसकी सन्तानोंके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
पिप्पलेश्वर, विमलेश्वर, विश्वरूपा-नर्मदासंगम तथा एक दिनमें मेघनादेश्वर आदि पाँच लिंगोंकी यात्राका माहात्म्य, राजा धर्मसेनकी कथा
मार्कण्डेयजी कहते हैं—नर्मदाके तटपर पिप्पलाद नामक एक मुनि थे। वे माता-पितासे रहित थे। उन्होंने सोलह वर्षोंतक निराहार रहकर एकचित्त हो पार्वतीसहित भगवान् शंकरको प्रसन्न किया।
तब महादेवजी बोले—ब्रह्मन्! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे सन्तुष्ट हूँ। तुम मनोवांछित वर माँगो।
पिप्पलाद बोले—देव! आप इस तीर्थमें सदा मेरे नामसे प्रसिद्ध होकर निवास करें।
पिप्पलादके ऐसा कहनेपर 'तथास्तु' कहकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके चले जानेपर पिप्पलादने नर्मदाकी महाजलराशिमें स्नान किया और भगवान् शिवकी स्थापना करके वे उत्तर पर्वतपर चले गये। जो मनुष्य उस तीर्थमें भक्तिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण एवं महेश्वरका पूजन करता है, वह अश्वमेध यज्ञका उत्तम फल पाता है। पिप्पलेश्वरके समीप जिसकी मृत्यु होती है, वह भगवान् शिवके धाममें जाता है। पिप्पलेश्वर तीर्थमें भक्तिपूर्वक पितरोंकी तृप्तिके उद्देश्यसे जो ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, उसके पितर बारह हजार वर्षोंतक तृप्त रहकर उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं।
राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम विमलेश्वरतीर्थको जाय। जहाँ एक मनोहर देवशिला है, जहाँ गर्जन और खेटक नामसे प्रसिद्ध तीर्थ है। वहीं उत्तम देवशिला भी है। जो मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितर बारह वर्षोंतक परम तृप्त हो देवलोकमें आनन्द भोगते हैं। जो देवशिलातीर्थमें भक्तिभावसे थोड़े-से दानके द्वारा भी ब्राह्मणोंका सत्कार करता है, उसके पुण्यफलका अन्त नहीं है।
युधिष्ठिर! तदनन्तर नर्मदाके उत्तर तटकी यात्रा करे। मेघनादतीर्थके समीप सरिताओंमें श्रेष्ठ विश्वरूपा नदी बहती है। एक समय नर्मदाके तटपर विराजमान होकर भगवान् शंकर तपस्या करते-करते विश्वरूप हो गये। तब उन्हींके शरीरसे सरिताओंमें श्रेष्ठ विश्वरूपा प्रकट हुई और नर्मदाके जलमें जाकर मिल गयी। दोनोंका संगम बड़ा ही गुणवान् है। जो मनुष्य उस तीर्थमें जाकर स्नान करता है, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। वहाँ जो कर्म किया जाता है वह सब अक्षय होता है। उस तीर्थमें किया हुआ श्राद्ध, यज्ञ और शिवपूजन कोटिगुना फल देनेवाला होता है। वहाँ पाँच शिवलिंग प्रसिद्ध हैं—मेघनादेश्वर, गोष्ठेश्वर, वागीश्वर, काकडेश्वर और लक्षेश्वर। जो इन पाँचों लिंगोंका एक दिनमें पूजन करता है, वह इसी शरीरसे भगवान् शिवको पा लेता है और मोक्षका भागी होता है।
पूर्वकालमें अयोध्यापुरीमें धर्मसेन नामक बलवान् राजा राज्य करते थे। उन्होंने धर्मपूर्वक राज्यका पालन तथा बहुत-सी दक्षिणावाले अनेकानेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया। एक समय धर्मशास्त्र सुनते हुए राजाने नर्मदा नदीका चरित्र सुना। सुनकर वे नर्मदाके उत्तर तटपर गये और नर्मदामें स्नान करके उन्होंने मेघनादेश्वरका पूजन किया। तत्पश्चात् सूर्योदय होते-होते घोड़ेपर सवार हो