संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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वे उत्तर दिशामें गोष्ठेश्वर शिवके समीप पहुँचे। गोष्ठेश्वरकी विधिपूर्वक पूजा करके राजा धर्मसेन वागीश्वर तीर्थमें गये। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके चन्दन, अगर, कपूर और धूप-दीप आदि विधानोंसे शिवकी पूजा सम्पन्न करके पुनः घोड़ेपर सवार हो वे श्रेष्ठ राजा काकडेश्वरमें आये। काकडेश्वरकी पूजा करके वे लक्षेश्वर तीर्थमें गये और वहाँ नर्मदाके जलमें स्थित लक्षेश्वरका विधिपूर्वक पूजन करके मेघनादतीर्थमें लौट आये। इतनेमें सूर्य अस्त हो गये। उस समय कालरूपधारी भगवान् शिवका ध्यान करते हुए राजा धर्मसेन ज्यों ही घोड़ेसे उतरकर खड़े हुए, त्यों ही वह दिव्य शरीर धारण करके इन्द्रके विमानमें जा बैठा और इन्द्रलोकको चला गया। राजाके पीछे-पीछे एक कुतिया भी तीर्थयात्रा कर रही थी। उसने भी दिव्य देह धारण करके स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। यह सब देखकर धर्मसेनके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने दिव्यदेहधारी अश्वसे पूछा—'यह सब क्या है?' तब उसने आकाशसे ही उत्तर दिया, 'राजन्! आप अपने मनमें खेद क्यों मानते हैं? शारीरिक कष्ट सहन करनेसे और तपस्यासे दिव्य विभूतियोंकी प्राप्ति होती है। अभीतक तो आपने दूसरेके पैरोंसे यात्रा की है, अब पैदल जाइये। जब पुनः अपने पैरोंसे यात्रा करेंगे तब आपको अवश्य सिद्धि प्राप्त होगी।'
यह सुनकर राजाने दूसरे दिन पुनः लिंग-पूजनके लिये प्रस्थान किया। उन पाँचों लिंगोंका पूजन करके नर्मदा-तटपर आकर जब उन्होंने मेघनादेश्वरका दर्शन किया तब द्वारपर ही उन्हें भगवान् शिवका दर्शन हुआ। उनके पाँच मुख, दस भुजाएँ और प्रत्येक मुखपर तीन-तीन नेत्र थे। हाथमें त्रिशूल शोभा पा रहा था। संसारको अपने गर्भमें धारण करनेवाले भगवान् शिव वृषभपर आरूढ़ थे और उनके मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट अपनी चाँदनी छिटका रहा था। उन देवदेवेश्वर परमेश्वरका दर्शन करके राजाने इस प्रकार स्तुति की—'देव! महादेव!! आपकी जय हो। महा-पातकोंका नाश करनेवाले शिव! मैं संसार-समुद्रमें डूबा हुआ हूँ, आप इस समय मेरा उद्धार कीजिये।'
महादेवजी बोले—महाभाग! तुम मेरे भक्त हो। अतः तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो। उसे मैं तुम्हें दूँगा।
राजाने कहा—देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे अपने साथ रहनेवाला सेवक बना लीजिये और जो लोग एक दिनमें इन पाँचों लिंगोंका पूजन करें, वे सभी आपके अनुचर हों। यही मेरे लिये वर है।
धर्मसेनकी बात सुनकर महादेवजीने 'एवमस्तु' कहा तथा उन्हें साथ लेकर वे कैलास पर्वतपर चले गये। युधिष्ठिर! भगवान् शिवने राजा धर्मसेनको अपने-आपमें लीन कर लिया।
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मृकण्ड-आश्रममें दो गन्धर्वोंका उद्धार तथा चन्द्रमती-नर्मदासंगम आदि अन्य तीर्थोंकी महिमा
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! नर्मदाके दक्षिण तटपर मृकण्ड मुनिका पवित्र आश्रम है। उसमें परम धर्मात्मा मेरे पिता मृकण्डजीने दीर्घकालतक तपस्या की है। उनके आश्रममें उत्तम व्रतका पालन करनेवाले बहुत-से अन्य महर्षि भी निवास करते थे। इसी समय हेति और प्रहेति नामवाले दो गन्धर्व इन्द्रकी सभामें गये। वहाँ उन्होंने एक श्रेष्ठ अप्सराको देखा। देखते ही वे दोनों कामबाणसे पीड़ित हो गये। तब हेतिने मुर्गेकी और प्रहेतिने मोरकी बोली बोलकर मधुर स्वरसे उसे रिझानेकी चेष्टा की। उनका यह अभिप्राय जानकर देवराज इन्द्रने उन्हें शाप