भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1070
* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *१०४१

दिया—'अरे! तुम दोनों वास्तवमें मुर्गा और मोर हो जाओगे। देवताओंके सौ वर्ष पूरे होनेपर फिर यहाँ आ सकोगे।'

युधिष्ठिर! इन्द्रके इस शापसे दोनों दुराचारी गन्धर्व पक्षीकी योनिमें आ गये। उस समय भी वे बड़े सुन्दर थे। उन्हें देखना सबको प्रिय लगता था। वे अपने पूर्वजन्मके वृत्तान्तको स्मरण करके सब तीर्थोंमें भ्रमण करने लगे। एक दिन उन्होंने देवर्षि नारदको देखा और इस प्रकार पूछा, 'शुभाचार ब्रह्मपुत्र! हम दोनों किस कर्मसे इस योनिसे मुक्ति पा सकेंगे।'

नारदजीने कहा—नर्मदाजीके दक्षिण तटपर मृकण्ड मुनिका शुभाश्रम है। वह पशु-पक्षियोंकी योनिसे मुक्ति देनेवाला उत्तम तीर्थ है। तुम दोनों वहाँ नर्मदाजीके जलमें गोता लगाओ, इससे तुम्हारा सब कार्य सिद्ध होगा।

तदनन्तर हेति और प्रहेति—दोनों उस तीर्थमें स्नान करके पूर्ववत् दिव्यरूपधारी हो गये। फिर विधिपूर्वक स्नान करके उन्होंने सदाशिव देवका ध्यान किया और कुछ कालतक ध्यानमें ही स्थित रहे। इसी समय पातालसे सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान दो शिवलिंग वहाँ प्रकट हुए। एकका कुक्कुटेश्वर और दूसरेका मयूरेश्वर नाम हुआ। वे दोनों गन्धर्व विमानपर बैठकर इन्द्रलोकको चले गये। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। स्नानके पश्चात् वहाँ तिल और जलसे तर्पण करनेपर पितरोंकी उत्तम गति होती है। जो वहाँ मृत्युको प्राप्त होता है, वह फिर इस घोर संसार-सागरमें लौटकर नहीं आता।

तत्पश्चात् चन्द्रमती और नर्मदाके संगममें जो उत्तम तीर्थ हैं, उनकी यात्रा करे। वहाँ चन्द्रेश्वर, सिद्धेश्वर, घण्टेश्वर तथा महिषेश्वर—ये चार सिद्धलिंग हैं। तदनन्तर अश्वतीर्थ, वृषसेनतीर्थ, हयग्रीवतीर्थ और शुकतीर्थ हैं। उनसे आगे रमेश्वरतीर्थकी यात्रा करे, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। राजन्! नर्मदाके तटपर रमेश्वरतीर्थ महापातकोंका भी नाश कर देता है। वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य फिर संसारमें जन्म नहीं लेता। पितरोंके लिये वहाँ विधिपूर्वक तिलोदक और पिण्डदान देना चाहिये। इससे पितरोंकी परम गति होती है। इससे आगे उत्तम हारिणीतीर्थ है। वहाँ सिद्धलिंग हरिणेश्वर, धनुरीश्वर, बाणेश्वर तथा लुब्धकेश्वर—इन सबकी पूजा करके मनुष्य शिवलोकमें जाता है।


भानुमतीका तीर्थसेवन, शूलभेदतीर्थमें शबर-दम्पतिका उद्धार और सती भानुमतीको कैलासधामकी प्राप्ति

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! भगवान् शंकरकी पूजा करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह शास्त्रोक्त आठ मानस मन्त्रोंद्वारा आठ फूल निवेदन करे। उन फूलोंके नाम इस प्रकार हैं—वारिज, सौम्य, आग्नेय, वायव्य, पार्थिव, वानस्पत्य, प्राजापत्य और शिवपुष्प। अब इनके स्वरूपका निर्णय सुनो—जलको ही वारिज समझना चाहिये, मधुयुक्त दूध सौम्य कहलाता है, धूप और दीप आग्नेय पुष्पके अन्तर्गत हैं, चन्दन आदि वायव्य पुष्प हैं, कन्द-मूल आदि पार्थिव पुष्प और फल वानस्पत्य पुष्प है। अन्न आदि भोज्य पदार्थ प्राजापत्य पुष्प कहलाते हैं तथा उपासनाका ही नाम शिवपुष्प है। इनके सिवा अहिंसा प्रथम पुष्प है, इन्द्रियनिग्रह द्वितीय पुष्प और दया तृतीय पुष्प है। इन आध्यात्मिक पुष्पोंसे सब देवता सन्तुष्ट होते हैं। राजन्! इस हारिणीतीर्थमें तपस्या और भक्तिके द्वारा भगवान् शिवकी पूजा करनी चाहिये। जो ब्राह्मण रुद्रसूक्त, पुरुषसूक्त और अपनी-अपनी शाखाके अनुसार गृह्यसूत्र—'इषे त्वा' इत्यादि मन्त्र, ज्योतिर्ब्राह्मण, गायत्रीमन्त्र, मधुब्राह्मण, मण्डल ब्राह्मण