भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1071, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1071
१०४२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तथा देवव्रत नामसे प्रसिद्ध दैव्यसूक्त आदि यजुर्वेदोक्त सूक्तोंका भक्तिपूर्वक जाप करते हैं, वे भगवान् शिवके लोकमें जाते हैं।

पूर्वकालमें वीरसेन नामसे विख्यात एक महापराक्रमी राजा हो गये हैं, वे चेदिदेशके स्वामी थे। बड़े-बड़े मण्डलाधीश्वर भी उनकी अधीनता स्वीकार कर चुके थे। राजा वीरसेनके राज्यमें कोई किसीका शत्रु नहीं था, किसीको रोग नहीं होता था और चोर आदिका उपद्रव भी नहीं था। उस राज्यमें कहीं भी अधर्म नहीं होता था, सदा सर्वत्र धर्मका ही पालन किया जाता था। राजा अपनी पत्नी और अनेक पुत्रोंके साथ सदा आनन्दसे रहते थे। उनके एक पुत्री थी, जो गिरिराजनन्दिनी उमाकी भाँति सुन्दरी थी। उसपर माता-पिता, भाई-बन्धु सभीकी स्नेहदृष्टि बनी रहती थी। समय आनेपर बारहवें वर्षमें चेदिराजने विधिपूर्वक अपनी पुत्रीका वैवाहिक कार्य सम्पन्न किया। विवाहके बाद उस कन्याका पति मृत्युको प्राप्त हो गया। बेटीको विधवा हुई देख राजा शोकमें डूब गये। उन्होंने दुःखसे पीड़ित होकर रानीसे कहा—'कल्याणी! यह तो जीवनभरके लिये अत्यन्त दुःसह दुःख आ पड़ा है। मेरी पुत्री रूप और यौवनसे सम्पन्न है, इसकी रक्षा कैसे की जा सकती है। भानुमतीके शीलकी रक्षाका अब कोई उपाय दिखायी नहीं देता।'

माता-पिता जब आपसमें इस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे, उस समय उनकी बात सुनकर राजकुमारी भानुमती उनके समीप जाकर बोली—'पिताजी! मैं शोकाग्निसे जल रही हूँ, इसलिये आज आपके सामने संकोच छोड़कर बोलती हूँ। मेरे कारण कोई दोषकी बात नहीं होने पायेगी, यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ। आजसे मैं कभी श्रृंगार नहीं धारण करूँगी, मोटे वस्त्रोंसे अपना शरीर ढक लूँगी, संयमपूर्वक रहकर पुराणोक्त सभी व्रतोंका आचरण करूँगी और श्रीहरिके सन्तोषके लिये तपस्या करती हुई अपनी कायाको सुखा डालूँगी। तात! यदि आपकी सम्मति हो तो मैं ऐसा ही जीवन व्यतीत करना चाहती हूँ।

भानुमतीका यह वचन सुनकर राजा वीरसेन स्नेहसे कातर हो गये। उन्होंने कन्याकी तीर्थयात्राके उद्देश्यसे बहुत अधिक धन देकर उसे विदा किया। कुछ विश्वासपात्र वृद्ध पुरुषोंको पुत्रीकी रक्षामें नियुक्त किया और एक हथियारबंद सिपाही तथा पुरोहित ब्राह्मणको भी साथमें लगा दिया। भानुमती गंगाके तटपर गयी और वहाँ स्नान करके भगवान्‌के ध्यानमें तत्पर हुई। स्नान, ध्यान और पूजन यह उसका प्रतिदिनका नियम हो गया। उसकी रक्षा करनेमें समर्थ जो दास-दासियाँ आदि थे, वे भी उसके पिता राजा वीरसेनकी आज्ञासे वहीं गंगाके किनारे टिके रहे। इस प्रकार वह राजकुमारी बारह वर्षोंतक गंगाजीके तटपर रही। तदनन्तर किसी समय गंगाको छोड़कर अपने सहायक मन्त्रियोंके साथ दक्षिण दिशामें गयी, जहाँ महानदी नर्मदा बहती थीं। वहाँ अमरकण्टक पर्वत एवं ॐकारतीर्थमें वह छः महीनेतक रही। फिर एक तीर्थसे दूसरे तीर्थमें होती हुई अनेकानेक तीर्थोंमें भ्रमण करने लगी। प्रत्येक तीर्थमें स्नान करके भक्ति-भावसे पूजन करती हुई वह निवास करती थी। तत्पश्चात् वह पश्चिम दिशामें देवनदी और नर्मदाके संगमपर गयी। वहाँ ऋषियोंके समुदायसे सेवित एक पुण्य आश्रम दिखायी दिया। ऋषिवृन्दका दर्शन करके भानुमतीने सबको प्रणाम किया और पूछा—'महात्माओ! इस तीर्थका नाम और माहात्म्य क्या है? यह बतानेकी कृपा करें।'

तब एक ऋषिने कहा—'तपस्विनि! यह स्थान चक्रतीर्थके नामसे विख्यात है। पूर्वकालमें त्रिशूलधारी देवाधिदेव महादेवने सन्तुष्ट होकर यहीं श्रीहरिको चक्र प्रदान किया था। जो इस तीर्थमें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, उसे पुनरावृत्तिरहित उत्तम गति प्राप्त होती है। दूसरे दिन यहाँसे शूलभेदतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ रात्रिमें जागरण करके पुराणकी कथा पढ़े और सुने। पुष्प, धूप, दीप आदि निवेदन करके

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