भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1072

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०४३

भगवान् विष्णुकी पूजा करे। तीसरे दिन प्रातःकाल होनेपर ब्राह्मणोंको भोजन करावे और अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें भक्तिपूर्वक दान दे। फिर चौथे दिन जहाँ प्राची सरस्वती हैं, वहाँ जाना चाहिये। वे सरस्वती सम्पूर्ण जगत्‌को पावन करनेके लिये साक्षात् ब्रह्माजीसे प्रकट हुई हैं। पाँचवें दिन मार्कण्डेयेश्वर लिंगके समीप जाय और वहाँ स्नान करे। वह परम उत्तम स्थान सर्वदेवमय और सर्वतीर्थमय है। जो पवित्र एवं जितेन्द्रिय होकर वहाँ एक वर्ष या छः मास या पंद्रह दिन अथवा तीन रात्रि भी निवास करता है, उसका फिर मर्त्यलोकमें निवास नहीं होता। वह सदा स्वर्गलोकमें अक्षय निवास पाता है। जो नियमपूर्वक वहाँ निवास करता है, वह तीन जन्मोंके पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा जो विधवा नारी उत्तम व्रतका पालन करती हुई बारह वर्षोंतक वहाँ निवास करती है, वह अनन्त कालतक रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होती है।

मुनिका यह वचन सुनकर भानुमतीको बड़ी प्रसन्नता हुई। वह आलस्य छोड़कर अहर्निश तीर्थसेवन एवं स्नान करने लगी। उस तीर्थका प्रभाव देखकर राजकुमारीने पुरोहितजी और ब्राह्मणोंसे कहा—‘आपलोग मेरी यह बात सुनें। मैं जबतक जीऊँगी, यहीं रहूँगी। ऐसे उत्तम स्थानका त्याग नहीं करूँगी। आपलोग जाकर मेरे माता-पिता तथा भाईसे यह बात कह दें कि ‘भानुमती नियमपूर्वक व्रतका पालन करती हुई इस समय शूलभेदतीर्थमें रहती है और एक-एक दिनका अन्तर देकर उपवास करती हुई धीरे-धीरे एक मासतक उपवास करनेकी चेष्टा कर रही है। वह देवशिलापर रहकर प्रतिदिन भगवान् विष्णुका ध्यान करती और भूमिपर ही सोती है।’

यह सन्देश लेकर जब ब्राह्मणलोग चले गये, तब एक दिन दो शबर (भील) वहाँ आये। वे दोनों पति-पत्नी थे। शबरने अपनी स्त्रीसे कहा—‘प्रिये! यहाँ जितने कमलपुष्प मिलें, उन्हें राजकुमारीको देकर तुम शीघ्र भोजन कर लो। मैंने आज यहाँ देवपूजनका विचार किया है, इसलिये मुझे आज भोजन नहीं करना चाहिये। मैंने कभी किसी विधि-निषेधका पालन नहीं किया है। सदा पाप बढ़ाया और अशुभ कर्म किया है। अतः आज मैं धर्मका पालन करना चाहता हूँ।’

शबरी बोली—प्राणनाथ! मैंने किसी भी दिन आपसे पहले भोजन नहीं किया है। जहाँतक मुझे स्मरण है, आपके भोजनसे बचा हुआ अन्न ही मैंने भोजन किया है।

पत्नीका यह निश्चय जानकर शबर स्नान करनेके लिये गया। उसने आधे उत्तरीय वस्त्रसे स्नान करके सब देवताओंको भक्तिपूर्वक स्नान कराया और देवशिलाके पास डरते-डरते जाकर खड़ा हुआ। वह मन-ही-मन भगवान् विष्णुका चिन्तन करता था। शबरीने कुमुदके दो फूल राजकुमारीकी दासीके हाथमें दिये। रानीने उन फूलोंको देखकर दासीसे पूछा—‘तुमने ये दोनों फूल कहाँ पाये हैं, बताओ। शीघ्र जाओ और पता लगाओ। यदि और फूल मिलें तो ले आओ। धन देकर कमलके फूल खरीद लाना।’

भानुमतीकी यह बात सुनकर दासी शबरके पास गयी और बोली—बहुत-से श्रीफल तथा फूल मुझे ला दो।

शबरी बोली—मैं श्रीफल और विशेषतः फूल दूँगी, परंतु मुझे मूल्य लेनेकी इच्छा नहीं है।

तब दासी लौट गयी और रानीसे सब बात बता दी। तब रानी स्वयं आयीं और शबरसे बोलीं—तुम मूल्य लेकर मुझे फूल दो।

शबर बोला—देवि! मैं फल और फूलका मूल्य नहीं लेना चाहता। आपको जितनी आवश्यकता हो, मुझसे श्रीफल और फूल ले लें तथा विधिपूर्वक जगत्पति भगवान् वासुदेवकी पूजा करें।

रानी बोलीं—मैं मूल्य दिये बिना तुम्हारे कमलके फूल नहीं लूँगी। इन फूलोंके बदलेमें तुम धान्यका यह ढेर ले जाओ।