भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1073, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1073
१०४४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

शबर बोला— भद्रे! आज मैं भगवान्‌का चिन्तन छोड़कर आहारका चिन्तन नहीं करूँगा। देवपूजन किये बिना अन्य किसी कार्यमें मेरी बुद्धि नहीं लगती।

रानी बोलीं— तुम्हें अन्नका त्याग नहीं करना चाहिये, क्योंकि सब कुछ अन्नमें ही प्रतिष्ठित है। अतः प्रयत्न करके मेरे अन्नको ग्रहण करो।

शबर बोला— मैं पहलेसे आज अन्न न लेनेका निश्चय कर चुका हूँ। यह सत्य है। सत्य ही सम्पूर्ण जगत्‌का मूल्य है और सत्यमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। सत्यसे ही सूर्य तपते हैं, सत्यसे ही चन्द्रमा प्रकाशित होते हैं, सत्यसे ही वायु चलती है तथा सत्यके ही आधारपर यह पृथ्वी टिकी हुई है। अतः पूरा प्रयत्न करके मनुष्य सत्यकी रक्षा करे। सत्यका लोप कदापि न करे।

रानी बोलीं— फूल चार प्रकारके बताये गये हैं—एक तो बगीचेसे चुनकर लाया हुआ, दूसरा जंगलसे तोड़ा हुआ, तीसरा मूल्य देकर खरीदा हुआ और चौथा दानके रूपमें प्राप्त हुआ। इनमें उत्तम फल तो उसका माना गया है, जो स्वयं ही जंगलसे तोड़कर लाया गया हो। बगीचेके फूलका मध्यम फल बताया गया है। खरीदे हुए फूलको निकृष्ट श्रेणीमें रखा गया है तथा जो प्रतिग्रहसे प्राप्त हुआ फूल है, उसे विद्वानोंने निष्फल बताया है।

तब पुरोहितजीने कहा— रानी! फूल ले लो और भगवान्‌की पूजा करो।

पुरोहितकी आज्ञासे रानीने शबरका उपकार करते हुए वे फूल ले लिये और उनके द्वारा भगवान् विष्णुका विधिवत् पूजन किया। रातको जागरण करके उन्होंने पुराणकी कथा भी सुनी। तदनन्तर शबरने भी धूप-दीप आदि निवेदन करके श्रीहरिका पूजन किया और भगवान् केशवका ध्यान करते हुए वह रातभर जागता रहा। फिर प्रातःकाल होनेपर उसने स्नानके लिये उत्सुक मनुष्योंकी भीड़पर दृष्टिपात किया। कोई शूलभेदमें नहाते हैं तो कोई देवनदीमें। कोई प्राची सरस्वतीमें स्नान करते हैं, कोई मार्कण्डेय ह्रदमें गोता लगाते हैं और कितने ही मनुष्य भक्तिभावसे चक्रतीर्थमें स्नान कर रहे हैं तथा स्नानसे पवित्र हुए सब लोग देवशिलापर यत्नपूर्वक श्राद्ध करते हैं। यह सब देखकर शबरने भी बेलका पिण्डदान किया और भानुमतीने भी सत्तूके पिण्ड बनाकर पितरोंके लिये अर्पण किये। फिर दम्भ-दोषरहित उत्तम ब्राह्मणको खीर, दही, शक्कर, मधु, घी, पायस और कृसर (खिचड़ी) आदि पदार्थ भोजन कराये। तदनन्तर भानुमतीके साथ सब ब्राह्मण शूलभेदतीर्थमें गये। वहाँ सबने देखा, शबर अपनी स्त्रीके साथ कुण्डमें खड़ा है। तत्पश्चात् शबर भृगु पर्वतके शिखरपर जाकर स्त्रीके साथ कूदकर प्राण देनेको उद्यत हुआ। यह देख राजकुमारीने कहा— 'महासत्त्व! ठहरो-ठहरो, मेरी बात सुनो—तुम तो अभी जवान हो, किसलिये प्राणोंका त्याग करते हो? तुम्हें कौन-सा सन्ताप या उद्वेग हुआ है, कौन-सा दुःख अथवा रोग हुआ है?'

शबर बोला— मेरे प्राणत्याग करनेका कोई कारण नहीं है और न मुझे कोई दुःख ही है, परंतु संसारमें कुछ सार तत्त्व है, यह बात मेरी बुद्धिमें नहीं आती। मनुष्यका जन्म बड़े दुःखसे प्राप्त होता है। इस मनुष्य-जन्मको पाकर जो धर्माचरण नहीं करता, वह इस थोड़ेसे दोषके कारण घोर नरकमें पड़ता है। अतः तपस्विनि! मैं इस तीर्थमें गिरकर प्राण देना चाहता हूँ।

राजपुत्री बोली— शबर! अब भी समय है। तुम स्वधर्म पालन करते हुए नाना प्रकारके सत्कर्म कर सकते हो। मैं तुम्हें अन्न, वस्त्र और धन दूँगी। तुम भगवान्‌का ध्यान करते हुए सदैव धर्मका आचरण करो।

शबर बोला— देवि! मुझे अन्न और वस्त्र नहीं चाहिये; क्योंकि जो दूसरेका अन्न खाता है, वह पाप ही खाता है।

राजपुत्री बोली— कन्द, मूल, फलका आहार

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