संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
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* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *
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| करते हुए उत्तम भिक्षान्न भोजन करके तीर्थोंमें स्नान करो तो सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे।<br><br>शबर बोला—देवि! मैंने अपना हित देखकर इस तीर्थमें प्राण त्यागनेका विचार कर लिया है। अब मैं सत्यका लोप नहीं कर सकता, यह मेरा निश्चित मत है। आप सब लोग मुझे क्षमा करें।<br><br>इतना कहकर उसने उत्तरीय वस्त्रसे अपनेको प्रयत्नपूर्वक बाँधा और स्त्रीके साथ भगवान्का ध्यान करके वह नीचे गिर पड़ा। लुढ़कता हुआ जब आधे पर्वतपर आ गया, तब उसके प्राण निकल गये। कुन्दके ऊपर जाकर उसका शरीर निश्चेष्ट हो गया। इसी समय शबर अपनी स्त्रीके साथ दिव्य विमानपर चढ़कर उत्तम गतिको प्राप्त हुआ।<br><br>तीर्थका यह माहात्म्य देखकर रानी भानुमती हर्षमें भर गयीं और मन-ही-मन कुछ सोच-विचारकर कुण्डके समीप पहुँचीं। फिर बहुत-से ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्होंने पूजन किया और | उन सबको नाना प्रकारके दान दिये। उसके बाद रानी पर्वतके ऊपर चढ़ गयी। उस दिन चैत्र मासकी अमावास्या तिथि थी। पर्वतके शिखरपर आरूढ़ होकर उसने दोनों हाथ जोड़ लिये और सब ब्राह्मणोंसे इस प्रकार कहा—‘आप सब लोग मेरे माता-पिता, भाई तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंसे यह कहियेगा कि सब लोग मेरी त्रुटियोंको क्षमा करेंगे और उन्हें यह सूचित कीजियेगा कि भानुमती शूलभेदतीर्थमें कठोर तपस्या करके शरीर त्यागकर स्वर्गको चली गयी।’<br><br>ऐसा सन्देश देकर रानीने सब लोगोंको विदा कर दिया और स्वयं पर्वतके शिखरपर खड़ी हुई। उसने अपने आधे उत्तरीय वस्त्रको खूब कसकर बाँध लिया और एकचित्त होकर पर्वतपरसे अपने शरीरको छोड़ दिया। वह आधे पर्वततक गिरकर आयी थी, इतनेमें ही देवताओं और दैत्योंने देखा—भानुमती दिव्य विमानपर आरूढ़ हो कैलास धामको चली गयीं। |
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आदित्येश्वरतीर्थकी महिमा, मुनियोंद्वारा नर्मदाका स्तवन और उस तीर्थमें गोदानकी महिमा
</div>| मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! अब मैं आदित्येश्वरतीर्थका माहात्म्य बतलाता हूँ। एक समय दुर्भिक्षके मारे हुए ब्राह्मणलोग नर्मदाजीके तटपर आये और फल तथा फूलोंसे भरे हुए एक उत्तम वनमें घुसे। वहाँसे पुनः नर्मदाजीके समीप जाकर उन्होंने दर्शन किया। दर्शन करके कुछ लोग नतमस्तक हुए और कुछ लोग ‘देवि! तुम्हारी जय हो, तुम्हें नमस्कार है’ ऐसा कहते हुए उनकी स्तुति करने लगे।<br><br>ऋषि बोले—सिद्धगणोंसे सेवित नर्मदादेवी! आपको नमस्कार है। सबको पवित्र करनेवाली मंगलमयी देवि! तुम्हें नमस्कार है। सहस्रों ब्राह्मणोंद्वारा पूजित तथा भगवान् शंकरसे प्रकट हुई पराशक्ति नर्मदे! तुम्हें नमस्कार है। देवि! | तुम स्वयं पवित्र होकर सबको पवित्र करनेवाली हो, श्रेष्ठ हो, तुम्हें नमस्कार है। हमपर प्रसन्न होओ। शीतल जलसे सुशोभित सुखदायिनी नर्मदे! तुम सरिताओंमें श्रेष्ठ, पापहारिणी और दयावती हो, तुम्हें नमस्कार है। अनेक प्राणियोंके शरीरसे तुम्हारे अंगोंकी शोभा हो रही है। तुम्हारा एक-एक अंग गन्धवों, यक्षों तथा नागगणोंको पवित्र करनेवाला है। तुम उत्तम वर और सुख प्रदान करनेवाली हो, हम सब लोग तुम्हें नमस्कार करते हैं। तुम दुःखसे व्याकुल प्राणियोंको अभयदान देती हो। अनेक देवताओंने तुम्हारा पूजन किया है। मर्त्यलोकके मानव विष्ठा और मूत्रके समुद्ररूप इस शरीरमें डूबे रहकर तभीतक नरकोंमें निवास करते हैं, जबतक कि वेगसे |