भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1075

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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

चलनेवाली वायुके झोंकेसे उठती हुई उत्ताल तरंगोंसे सुशोभित तुम्हारे जलका स्पर्श नहीं करते। देवि! म्लेच्छ, पुलिन्द और राक्षस भी यदि तुम्हारे पवित्र जलको पीते हैं तो पापके घोर भयसे मुक्त हो जाते हैं, फिर भय और पापसे डरे हुए हम-जैसे ब्राह्मणोंको मुक्त करना तुम्हारे लिये कौन बड़ी बात है। इस घोर एवं अपवित्र कलियुगमें तुम्हीं निर्मल जलराशिसे परिपूर्ण होकर शोभा पाती हो। देवि! तुम्हारे ही प्रसादसे आकाशमें आकाशगंगाकी स्थिति है। इस समय तुम हमारी यथेष्ट रक्षा करो, जिससे तुम्हारे कृपाप्रसादसे हम सब लोग तुम्हारे लोकमें जा सकें। हमारे ऊपर अनुग्रह करो। हम तुम्हारे आश्रित हैं, तुम्हारी शरणमें आये हुए हैं, तुम्हीं हमारी गति हो। देवि! तुम आदिदेव महादेवजीसे प्रकट हुई हो, तुम्हारी शक्ति अद्भुत है।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ऋषियोंके इस प्रकार स्तवन करनेपर सरिताओंमें श्रेष्ठ महानदी नर्मदा प्रत्यक्ष होकर बोलीं—‘विप्रगण! मैं तुमपर सन्तुष्ट हूँ और तुम्हें मनोवांछित वर देती हूँ।’

तदनन्तर मेघोंकी बड़ी भारी घटा घिर आयी और खूब वर्षा हुई। देशमें सब ओर बहुत अन्न हुआ तथा सर्वत्र कन्द, मूल, फल और शाक आदि सुखपूर्वक मिलने लगे।

युधिष्ठिर! जो मनुष्य जितेन्द्रिय भावसे भक्तिपूर्वक ग्रहणके अवसरपर सूर्यतीर्थकी यात्रा करते हैं तथा काम, क्रोध, राग और द्वेषसे मुक्त हो भगवान् विष्णुकी कथा सुनते हुए वेदोंका पाठ करते हैं, अथवा ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेदकी एक-एक ऋचाका ही पाठ करते हैं वे सम्पूर्ण वेदोंके पाठका पूरा-पूरा फल पा लेते हैं। वहाँ गायत्रीमन्त्रके जपसे मनुष्य चारों वेदोंका फल पाता है। प्रातःकाल वहाँ अन्नदान और सुवर्णदान आदिके द्वारा भगवान्‌का पूजन करे। जो उस तीर्थमें स्नान करके योग्य ब्राह्मणोंको कपिला गौ प्रदान करता है उसके द्वारा पर्वत, वन और काननों-सहित मानो समूची पृथ्वी दे दी जाती है। जिसने वहाँ गोदान किया उसके द्वारा भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक एवं इक्कीस पातालोंका भी दान सम्पन्न हो जाता है। जो प्रातःकाल उठकर भक्तिपूर्वक प्रतिदिन कपिला गौकी प्रदक्षिणा करता है उसके द्वारा सात द्वीपोंवाली पृथ्वीकी परिक्रमा हो जाती है। जो कपिला गौके पंचगव्यसे भगवान् शंकरको स्नान कराता अथवा जगदाधार विष्णु, सूर्य या अन्य किसी देवताको नहलाता है और जो एक वर्षतक प्रतिदिन श्रोत्रिय ब्राह्मणको कपिला गौका दान देता है, इन दोनोंका फल एक बताया गया है। जो कोई भी मनको वशमें करके सूर्यतीर्थमें कपिला, कृष्णा, श्वेत रंग या लाल रंगकी दूध देनेवाली नयी गौको बछड़ेसहित ब्राह्मणके लिये देता है तथा ब्राह्मणको विष्णु, अपने-आपको भी विष्णु और गौको सूर्यस्वरूप समझते हुए गोदान करता है वह स्वर्गलोकमें निवास करता है और ब्रह्महत्या आदि पापोंसे भी मुक्त हो जाता है। युधिष्ठिर! धेनुदानसे सब पापोंका नाश हो जाता है। जो पापनाशक सुरभिसंगम नामक पुण्यतीर्थमें भक्तिपूर्वक प्रेतके लिये श्राद्ध करता है, उसके ऊपर भगवान् सूर्य और महादेवजी प्रसन्न रहते हैं।


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