भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1067

१०३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


करंजेश्वर तथा कुण्डलेश्वरतीर्थका प्रादुर्भाव और माहात्म्य

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! पहले सत्ययुगमें ब्रह्माजीके मानसपुत्र मरीचि हुए, जो वेद-वेदांगोंके तत्त्वज्ञ थे। मरीचिसे दीर्घकालके बाद महर्षि कश्यपका जन्म हुआ, जो द्वितीय ब्रह्माके समान थे। उनमें अपने पिताके क्षमा, दम, दया, दान, सत्य, शौच तथा सरलता आदि सभी सद्गुण शोभा पाते थे। महर्षि कश्यपके इन गुणोंको जानकर प्रजापति दक्षने अपनी तेरह कन्याओंका विवाह उनके साथ कर दिया। उनके नाम अदिति और दनु आदि थे। भैया युधिष्ठिर! इन दक्ष-कन्याओंके पुत्रों और पौत्रोंकी संख्या बहुत अधिक है। अदितिने इन्द्र आदि पुत्रोंको जन्म दिया। इसी प्रकार अन्य कन्याओंने नाग, प्रेत, पिशाच, पक्षी, यक्ष, राक्षस, सिंह, व्याघ्र, वराह आदिको उत्पन्न किया। महाबाहो! प्रजापति कश्यपके पुत्रोंसे चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी व्याप्त हो गयी।

युधिष्ठिर! दक्षकन्या दनुके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम करंज था। दानव करंजमें राजा बलिकी भाँति सभी प्रकारके उत्तम गुण विद्यमान थे। उसने बड़ी भारी तपस्या की, तब महादेवजीने उसे दर्शन देकर कहा—'करंज! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।'

करंज बोला— प्रभो! मुझे पुत्र और पौत्रोंके साथ धन दीजिये।

'तथास्तु' कहकर पार्वतीसहित शिव वृषभपर आरूढ़ हो वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तब वह दैत्य भी प्रसन्नतापूर्वक अपने नामसे महादेवजीकी स्थापना करके घरको लौट गया। तभीसे उस स्थानकी करंजेश्वर तीर्थके नामसे प्रसिद्धि हुई। राजन्! वहाँ स्नानमात्र करनेवाला मनुष्य ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे भी मुक्त हो जाता है। जो उस तीर्थमें देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, वह निश्चय ही अश्वमेध-यज्ञका पुण्यफल प्राप्त करता है। जो वहाँ प्राणत्याग करता है, वह बीस हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है और अन्तमें उत्तम कुलमें जन्म लेकर धनवान्, वेद-वेदांगोंका तत्त्वज्ञ, सर्वशास्त्रविशारद, राजा अथवा राजाके तुल्य होता है।

मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! प्राचीन त्रेतायुगमें पुलस्त्यपुत्र विश्रवाने भरद्वाज मुनिकी पुत्रीसे विवाह किया। उससे धनंजय नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो पुत्रोचित गुणोंसे सम्पन्न था। उसके जन्मका समाचार सुनकर लोकपितामह ब्रह्माजीने ऋषियों और देवताओंके साथ बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उस बालकका नामकरण-संस्कार किया और इस प्रकार कहा—'हे अनघ! यह बालक तुझ विश्रवासे प्रकट होकर मेरा पौत्र हुआ है। इसलिये मैंने तुम्हारे इस पुत्रको वैश्रवण नाम दिया है। यह सब देवताओंके धनका रक्षक होगा। लोकपालोंमें यह चौथा होगा। अविनाशी और यक्षोंका स्वामी होगा।'

आगे वही यक्षश्रेष्ठ कुण्डधार हुआ। उसने उत्तम स्वरूप और अवस्था पाकर माता-पिताकी आज्ञासे नर्मदाके तटपर बैठकर बड़ी भारी तपस्या की। तब दीर्घकालके पश्चात् महादेवजी उसपर प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—'वत्स! तुम अपनी इच्छाके अनुसार वर माँगो।'

कुण्डधार बोला— देव! यह तीर्थ और लिंग मेरे नामसे प्रसिद्ध हो।

तब 'एवमस्तु' कहकर पार्वतीसहित भगवान् शिव अन्तर्धान हो आकाशमार्गसे कैलास पर्वतको चले गये। तदनन्तर उस यक्षने भी आनन्दयुक्त हो वहाँ कुण्डलेश्वर महादेवको स्थापित किया। विविध उपचारोंके साथ शिवलिंगका पूजन और अन्न-पानादि तथा वस्त्राभूषणादिके द्वारा ब्राह्मणोंको तृप्त करके महादेवजीको सन्तुष्ट करनेके अनन्तर वह अपने घरको लौट गया। तबसे वह तीर्थ तीनों लोकोंमें कुण्डलेश्वरके नामसे विख्यात