संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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सेवकने लौटकर राजासे सब वृत्तान्त कह सुनाया। उसकी बात सुनकर राजा कण्ठ पृथ्वीपर गिर पड़ा। तब सेवकने कहा—'नाथ! आप पहलेके शुभाशुभके विषयमें इतना शोक क्यों करते हैं।' उसने उत्तर दिया—'मैं यहीं भगवान् सोमनाथके समीप प्राणत्याग करूँगा। तदनन्तर राजाने संगमके पापनाशक जलमें स्नान किया, भक्तिपूर्वक भगवान् सोमनाथकी पूजा की और तीन बार उनकी परिक्रमा करके प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश किया। उस समय वह मन-ही-मन पीताम्बर और महान् मुकुट धारण करनेवाले भगवान् विष्णुका ध्यान कर रहा था तथा यह प्रार्थना करता था कि 'श्रीहरिके ध्यानसे मेरी उत्तम गति हो।'
उस समय उसके ऊपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुई। यह अनुपम आश्चर्य देखकर कण्ठके सेवकोंने भी एक-दूसरेकी ओर दृष्टिपात किया और भगवान् गदाधरका ध्यान करते हुए उन्होंने उसी अग्निमें अपने शरीरकी भी आहुति दे दी। तब वे सब-के-सब दिव्य विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको चले गये।
युधिष्ठिर! भगवान् सोमनाथका ऐसा ही प्रभाव है। अष्टमी और चतुर्दशीको शुभ दिनमें सब समय और विशेषतः शुक्ल पक्षमें सप्तमी तथा रविवारका योग होनेपर मनुष्य उपवास करके भक्तिभावसे रात्रिमें जागरण करे। भगवान् शिवको स्नान कराकर उनके श्रीविग्रहमें चन्दनका लेप करे और पुष्प, धूप आदि देकर घीसे दीपक जलावे। फिर दूसरे दिन अष्टमीयुक्त सोमवारको प्रातःकाल क्रोधको जीतनेवाले, निन्दासे दूर रहनेवाले, सर्वाङ्गसुन्दर, शान्त, अपनी पत्नीका पालन करनेवाले, गायत्रीजपपरायण तथा कुकर्म-रहित ब्राह्मणका पूजन करे। ऐसा करनेसे वह भगवान् शिवके लोकमें जाता है।
पूतकेश्वर तथा जलशायी (चक्र) तीर्थका माहात्म्य, श्रीविष्णुके द्वारा नलमेघ दानवके वधकी कथा
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजेन्द्र! तदनन्तर नर्मदाके दक्षिण तटपर पूतकेश्वर नामक उत्तम तीर्थमें जाय, वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ लोगोंके हितकी कामनासे भगवान् शिवकी स्थापना की गयी है। युधिष्ठिर! जो मनुष्य वहाँ भगवान् शिवकी पूजा करता है, वह सब मनोरथोंको प्राप्त होता है। कृष्ण पक्षकी अष्टमी और चतुर्दशीको जो मनुष्य महाकालका पूजन करते हैं, वे कभी यमलोकमें नहीं जाते। नर्मदाके उत्तर तटपर उत्तम वैष्णवतीर्थ है, जो जलशायीके नामसे इस भूतलपर विख्यात है।
पूर्वकालमें नलमेघ नामसे प्रसिद्ध एक बड़ा भारी दैत्य था। उसने सब देवताओंको जीतकर उनका राज्य छीन लिया। नलमेघके भयसे इन्द्र आदि सब देवता सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मलोकमें गये और भाँति-भाँतिके स्तोत्रोंद्वारा ब्रह्माजीकी स्तुति करने लगे। तब ब्रह्माजीने देवताओंसे कहा—'भगवान् विष्णुके बिना वह दैत्य दूसरेसे नहीं जीता जा सकता।' यह सुनकर सम्पूर्ण देवताओंने श्रीविष्णुका स्तवन किया—'शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो।' देवताओंकी यह स्तुति सुनकर भगवान् जलशायी जाग उठे और मेघगर्जनाके समान, गम्भीर वाणीमें बोले—'ब्रह्मन्! आपने समस्त देवताओंके साथ आकर मुझे किसलिये जगाया है?'
**ब्रह्माजी बोले—**भगवन्! हमलोग नलमेघके भयसे आपके धाममें आये हैं। पापी नलमेघ दूसरे किसीके हाथसे नहीं मारा जा सकता। केवल आपके ही हाथसे उस दुष्टात्माकी मृत्यु होगी।
**भगवान् विष्णु बोले—**देवताओ! अपने-अपने स्थानको जाओ, मैं उस महाबली दैत्यका वध कर दूँगा।