भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1078

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०४९


बहुत ही प्रिय है। तुम्हारा यह तीर्थ भूतलपर मेरे प्रसादसे परम पवित्र माना जायगा।

ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये और देवर्षि नारदने सब प्राणियोंके उपकारके लिये वहाँ एक शिवलिंग स्थापित किया। नारदजीका वह तीर्थ इस पृथ्वीपर बहुत ही उत्तम है। मनुष्य जितेन्द्रिय होकर उस तीर्थमें जाय। जो लोग अस्त्र-शस्त्रद्वारा मारे गये हैं, उनकी सद्गतिके लिये वहाँ श्राद्ध करे। उस तीर्थमें किये हुए पिण्डदानके प्रभावसे वे मृतक पुरुष उत्तम लोकको जाते हैं। पूर्वकालमें नर्मदाजीके सामने नन्दीने भगवान् महेश्वरकी प्रसन्नताके लिये तप किया।

तब महादेवजी प्रसन्न होकर बोले—'नन्दीश्वर! मैं सन्तुष्ट हूँ, तुम मनोवांछित वर माँगो।'

नन्दीने कहा—देवेश्वर! मैं धन नहीं चाहता, कुल और सन्तान नहीं चाहता, मोक्ष या और कोई वस्तु भी नहीं चाहता। मुझे तो केवल आपके चरणारविन्दोंकी सेवा चाहिये। जन्म-जन्ममें आपके प्रति अविचल भक्ति प्राप्त हो।

'तथास्तु' कहकर महादेवजी नन्दीका हाथ अपने हाथमें लेकर शीघ्र ही उनके साथ कैलासधाममें चले गये। जो मनुष्य उस तीर्थमें स्नान करके भक्तिभावसे भगवान् त्रिलोचनकी पूजा करता है वह अग्निष्टोम यज्ञके पुण्य और फलको पाता है।


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नर्मदा-नागेशके संगममें कण्ठकी ब्रह्महत्यासे मुक्ति और सद्गति

मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! पूर्वकालमें शम्बर नामके एक राजा थे। शम्बरके पुत्र त्रिलोचन और त्रिलोचनका पुत्र कण्ठ हुआ। यह कण्ठ बड़ा नीच था। सदा पापोंमें ही लगा रहता था। एक दिन वह वनमें घूम रहा था। उसी समय उसे मृगोंका झुंड दिखायी दिया। कण्ठने उस पूरे झुंडको अपने बाणोंका निशाना बना दिया। उसी झुंडमें एक ब्राह्मण भी थे जो मृगका रूप धारण करके निर्जन वनमें विचर रहे थे। वे भी उस समय कण्ठके शस्त्रसे मारे गये। कण्ठको ब्रह्महत्या लगी और वह तेजोहीन होकर पृथ्वीपर विचरने लगा। घूमता-घूमता वह नर्मदा और नागेशके संगमपर जा पहुँचा तथा अधिक थका होनेके कारण एक वृक्षकी छायामें सो गया। तत्पश्चात् उठा और संगममें नहाकर बड़ी भक्तिके साथ उसने भगवान् सोमनाथका पूजन किया। इसके बाद कण्ठने कण्ठतक नर्मदाका पापनाशक जल पीया। इसी समय एक ब्राह्मण संगमतीर्थमें स्नान करनेके लिये आ रहे थे। रास्तेमें उन्हें वृक्षपर बैठी हुई एक भयानक स्त्री दिखायी दी। वह स्त्री उनसे बोली—'विप्रवर! यदि तुम संगममें स्नान करनेके लिये जाते हो तो वहाँ मेरा पति ठहरा हुआ है, उसे शीघ्र भेज देना।'

यह सुनकर ब्राह्मणदेवता संगमपर गये और वहाँ वृक्षकी छायामें बैठे हुए कण्ठको देखकर बोले—'मैंने वनमें एक स्त्री देखी है। उसने मुझसे कहा है कि संगमपर मेरा पति है, उसको मेरे पास भेज दो।'

तब कण्ठने अपने एक सेवकसे कहा—'तुम जाओ और उससे पूछो कि तुम कौन हो और कहाँसे आयी हो?'

सेवक जहाँ वह स्त्री बैठी थी, वहाँ गया और इस प्रकार बोला—'बाले! राजा कण्ठ पूछते हैं कि तुम कौन हो?'

स्त्री बोली—जितात्मा पुरुषोंको शिक्षा देनेवाले गुरु हैं, दुष्टोंका शासन करनेवाले राजा हैं और इस लोकमें जो छिपे हुए पाप करते हैं, उन सबके शासक विवस्वान्‌के पुत्र यमराज हैं। इस कण्ठने मृगरूपधारी ब्राह्मणका वध किया है, अतः इसे ब्रह्महत्या लगी है। ब्रह्महत्या मैं ही हूँ। यद्यपि मैंने उसे पकड़ रखा था, तथापि इस तीर्थके प्रभावसे वह मुझसे छूट गया है। यहाँ नर्मदासे आधे कोसके अंदर ब्रह्महत्याका प्रवेश नहीं होता। अतः तुम जाओ, कण्ठको शीघ्र ही यहाँ भेज देना।