संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पराशराश्रमकी महिमा, पराशर मुनिकी तपस्या, वरदान-प्राप्ति, भीमेश्वरमें गायत्री-जपका महत्त्व और नारदेश्वरतीर्थका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! नर्मदाके उत्तर तटपर महर्षि पराशरने पुत्रके लिये बड़ी भारी तपस्या की। उन्होंने हिमाचलकन्या गौरी तथा नारायणसहित लक्ष्मीको अपनी पराभक्तिसे सन्तुष्ट किया। तब देवी पार्वतीने प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'मुनिश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न हूँ। विप्रवर! तुम कोई वर माँगो।'
पराशरजी बोले—देवि! मुझे सब शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण एक पुत्र शीघ्र दीजिये और यह स्थान तीर्थ हो जाय तथा आप भी लोकोपकारके लिये सदा यहाँ निवास करें।
देवीने कहा—'एवमस्तु'—ऐसा ही होगा।
इतना कहकर पार्वतीदेवी अन्तर्धान हो गयीं। तब महात्मा पराशरजीने पार्वतीदेवी तथा भगवान् शंकरको वहाँ स्थापित किया जो देव-दानववन्दित तथा सब देवताओंद्वारा पूजित हैं। यह सब करके पराशर मुनि कृतकृत्य हो निश्चिन्त हो गये। राजन्! उस तीर्थमें भक्तिपूर्वक स्नान करके शुद्धचित्त हो चैत्र, श्रावण और मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षमें अष्टमी, चतुर्दशी एवं सूर्यग्रहणके पर्वमें सदा भगवान् शंकर और पार्वतीदेवीका पूजन करे। स्त्रियाँ हों या पुरुष—सभी काम-क्रोधसे रहित हो उपवास करके भक्ति-भावसे व्रतका पालन करें। फिर हाथभरके कुश और उत्तम तिल लेकर ब्राह्मणको उत्तराभिमुख बिठावे और स्वयं दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके बैठे। फिर कुशोंपर कच्चा अन्न रखकर ब्राह्मणके आगे इस प्रकार कहे—'इस उत्तम तीर्थके प्रभावसे अमुक प्रेतको श्रेष्ठ लोककी प्राप्ति हो। मेरा पाप नष्ट हो जाय, शुभ कर्मकी सदा वृद्धि हो, मेरे कुल और कुटुम्बका भी सर्वदा अभ्युदय हो।' ऐसा कहकर पराशर-आश्रममें ब्राह्मणको दान दे। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस प्रसंगको सुनता है वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
तदनन्तर सब पापोंका नाश करनेवाले भीमेश्वरतीर्थको जाय, जो भयानक व्रत धारण करनेवाले ऋषियोंके समुदायसे सेवित है। जो उस तीर्थमें स्नान और उपवास करके इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए सूर्यकी ओर दोनों हाथ उठाकर एकाक्षर मन्त्र प्रणवका जप करता है उसका जन्मभरका पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है और गायत्री-मन्त्रका जप करनेसे सात जन्मोंका संचित पाप निश्चय ही नाशको प्राप्त होता है। दस बार गायत्री जपनेसे एक जन्मका, सौ बार जपनेसे पूर्वजन्मका और सहस्र बार जपनेसे तीन जन्मोंके पापोंका गायत्री देवी नाश करती हैं। राजन्! वहाँ जप किया हुआ वैदिक या लौकिक मन्त्र सब पापोंको तत्काल जला देता है। परंतु यदि कोई इसीके भरोसे पाप करे तो उसको वह फल कभी नहीं मिलता।
वहाँसे उत्तम नारदेश्वरतीर्थको जाय, जिसकी स्थापना स्वयं देवर्षि नारदजीने की है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीके पुत्र देवर्षि नारदजीने नर्मदाके उत्तर तटपर तपस्या की। वे नवों इन्द्रियछिद्रोंको रोककर काष्ठकी-सी दशाको प्राप्त हो गये। ऐसा कठोर तप करके उन्होंने महादेवजीको सन्तुष्ट किया। तब महादेवजी प्रत्यक्ष होकर बोले—'देवर्षे! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।'
नारदजीने कहा—देव! आपके प्रसादसे मेरा योग सिद्ध हो जाय।
महादेवजीने कहा—तुम्हारा योग सिद्ध हो और मुझमें सदा तुम्हारी भक्ति बनी रहे। तुम स्वर्ग, पाताल अथवा मर्त्यलोकमें अपनी इच्छाके अनुसार भ्रमण करो। कभी कोई तुम्हें रोक नहीं सकता। सात स्वर, तीन ग्राम और इक्कीस मूर्छनाओंके साथ दिव्य नृत्य एवं संगीतकलाका तुम्हें ज्ञान होगा, जो मुझे