भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1080
  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०५१

तदनन्तर भगवान् जनार्दनने अपने हाथमें शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष लेकर गरुड़पर सवार हो उस दानवका वध करनेके लिये प्रस्थान किया। जगत्के स्वामी श्रीहरि गिरिराज हिमालयपर गये और उसके नगरके निकट पहुँचकर उन्होंने अपना पांचजन्य शंख बजाया। उसकी ध्वनि सुनकर नलमेघको बड़ा क्रोध हुआ और वह अपने रथपर आरूढ़ हो नगरसे बाहर निकला। इतनेमें ही शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णुपर उसकी दृष्टि पड़ी।

तब नलमेघ बोला—दानवो! यह वही विष्णु है, जिसने दानव धुन्धुमारका वध किया है, इसे मार डालो।

ऐसा कहकर दानव नलमेघ अपने बाणोंसे भगवान् विष्णुपर आघात करने लगा। किंतु श्रीहरिने उसके सभी बाण काट डाले और उस दानवपर दुगुने बाणोंकी बौछार की। तब दानवने भी दूने-से-दूना करके विष्णुपर बाणोंकी वर्षा की। तब भगवान्ने नारसिंह बाण चलाया। उसे देखकर नलमेघ शीघ्रतापूर्वक रथसे उतर गया और हाथमें तलवार लेकर भगवान्को मारनेके लिये दौड़ा। यह देख श्रीहरिने अपना अमोघ चक्र लेकर उस दानवका मस्तक काट गिराया। तदनन्तर देवताओंने भगवान् विष्णुपर फूलोंकी वर्षा की। नलमेघके मारे जानेपर देवगण अपने-अपने स्थानको चले गये और भगवान् विष्णु नर्मदाके जलमें लीन हो गये। तबसे इस लोकमें वह स्थान जलशायी तीर्थ कहलाता है। वह अनेक पापोंका नाश करनेवाला है। कुछ लोग उसे चक्रतीर्थ भी कहते हैं। युधिष्ठिर! भारतवर्षमें नर्मदाके तटपर यह तीर्थ प्रसिद्ध है। मार्गशीर्ष मासमें शुक्ल पक्षकी एकादशी तिथिको शुभ दिनमें वहाँ जाकर जो मनुष्य काम और क्रोधसे रहित हो शेषशय्यापर शयन करनेवाले भगवान् लक्ष्मीपतिको स्नान कराते हैं, तथा जो लोग मधु, दूध, घी और गुड़ मिले हुए जलसे नहलाये जाते हुए श्रीविष्णुका भक्तिभावसे दर्शन करते हैं, वे पापरहित हो भगवान्के देव-दानववन्दित परम धामको जाते हैं। जो श्रेष्ठ मानव वहाँ भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुकी कथा सुनते हैं, वे ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। जो जलशायी भगवान् जगद्गुरु विष्णुकी प्रदक्षिणा करते हैं, उनके द्वारा सम्पूर्ण जम्बूद्वीपकी परिक्रमा हो जाती है। तदनन्तर निर्मल प्रातःकाल होनेपर यत्नपूर्वक पितरोंका तर्पण करके पूज्य ब्राह्मणोंके द्वारा श्राद्ध करावे। जो ब्राह्मण वेदका विद्वान् नहीं है, मादक वस्तुओंके सेवनसे उन्मत्त रहता है, मित्रद्रोही, कृतघ्न और व्रतहीन है, उसे दान नहीं देना चाहिये। जो वेदान्तको पढ़कर उसके तत्त्वको जानता हो, उसे गोदान देना चाहिये। जो सर्वाङ्गसुन्दर, पवित्र और प्रिय वचन बोलनेवाला हो, ऐसे ही ब्राह्मणको गौ देनी चाहिये।


प्रभासेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, संकर्षण, मन्मथेश्वर तथा एरण्डीसंगममें पुत्रप्राप्तिपदतीर्थकी महिमा, अनसूयाजीके पुत्ररूपसे ब्रह्मा, शिव और विष्णुका अवतार

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! सूर्यदेवकी स्त्री प्रभाने पूर्वकालमें उग्र तपस्याके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना की। वह उन्हींके ध्यानमें तत्पर हो एक वर्षतक केवल वायु पीकर रही। इससे सन्तुष्ट होकर महादेवजीने प्रभासे कहा—'बाले! तू क्यों कष्ट उठा रही है? अपना मनोरथ प्रकट कर।'

**प्रभा बोली—**शम्भो! स्त्रीके लिये पतिके सिवा दूसरा कोई देवता नहीं है। भले ही पति कभी पत्नीका पोषण न करता हो, गुणवान् हो या गुणहीन, धनवान् हो या निर्धन, प्रेमी हो या द्वेषपात्र, किंतु स्त्रीके लिये तो पति ही उसका देवता है। महेश्वर! मैं पतिसे सुख नहीं पा रही हूँ। इसीलिये क्लेश उठाती हूँ।