भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1081

१०५२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

महादेवजीने कहा—देवि! तू मेरे प्रभावसे सूर्यदेवकी प्रियतमा होगी।

महादेवजीका वरदान पाकर प्रभाने वहाँ उनकी स्थापना की और इस प्रकार बोली—भगवन्! आप अपने अंशसे यहाँ निवास करें और इस तीर्थको प्रकाशमें लावें।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! प्रभाद्वारा स्थापित शिवलिंग ही प्रभासेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह सम्पूर्ण लोकमें दुर्लभ है। माघमासकी सप्तमीको यह विशेष फलद होता है। जो उस तीर्थमें भक्तिसे कन्यादान देता है अथवा कन्याके समान अवस्थावाले धनी एवं कुलीन ब्राह्मणको विवाहके लिये कन्या दिलाता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है। वहाँ कन्यादान करनेवाला पुरुष सूर्यलोकका भेदन करके कल्याणमय शिवलोकमें जाता है। युधिष्ठिर! मनुष्य तभीतक भटकता है, जबतक प्रभातीर्थमें नहीं जाता। वहाँ जानेपर अश्वमेधयज्ञका फल पाकर वह उत्तम गतिको पाता है।

तदनन्तर नर्मदाके दक्षिण तटपर उत्तम मार्कण्डेयेश्वर तीर्थमें जाय, जो देवताओंद्वारा वन्दित, कल्याणमय तथा गोपनीयसे भी गोपनीय है। उसकी स्थापना मैंने स्वयं ही की है। वह परम पवित्र तथा भोग एवं मोक्ष देनेवाला है। उसी तीर्थमें भगवान् शंकरके प्रसादसे मुझे ज्ञानकी प्राप्ति हुई है। पाण्डुनन्दन! जो वहाँ अन्यान्य सूक्तोंका चिन्तन तथा वहाँके जलमें 'द्रुपदादिव०' इत्यादि मन्त्रोंका जप करता है, वह घोर पापराशिसे मुक्त हो जाता है। जो अपनी पाँचों इन्द्रियोंको वशमें करके नर्मदाके दक्षिण तटपर बैठकर जलमें भक्तिपूर्वक पूर्वोक्त सूक्तोंका जप करता है, वह मन, वाणी और क्रियाद्वारा होनेवाले सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है, ऐसा भगवान् शंकरका कथन है। जो मार्कण्डेयेश्वरतीर्थमें भक्तिपूर्वक पितरोंका श्राद्ध करता है, उसके पितर प्रलयकालतक तृप्त रहते हैं। जो वहाँ आँवला, बेर, बेल आदि फल, अक्षत और जलसे प्रेतोंका तर्पण करते हैं, उनके द्वारा तृप्त किये हुए वे प्रेत शुभ गतिको प्राप्त होते हैं।

राजेन्द्र! उसके बाद नर्मदाके उत्तर तटपर यज्ञवाट्के मध्यमें स्थित संकर्षण नामक तीर्थमें जाय, जो सब पापोंका नाश करनेवाला और भूतलमें प्रसिद्ध है। वहाँ पूर्वकालमें बलभद्रजीने नर्मदातटपर सब प्राणियोंके उपकारके लिये तपस्या की थी। वहीं समीपमें ही देवताओं तथा भगवती उमाके साथ भगवान् शिव निवास करते हैं। जो मनुष्य वहाँ क्रोध और इन्द्रियोंको वशमें रखकर शुक्ल पक्षकी एकादशी तिथिको भक्तिभावसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक भगवान् शिवको स्नान कराता है तथा श्रद्धा-भक्तिके साथ प्रेतोंके लिये श्राद्ध एवं दान करता है, वह परम पदको प्राप्त होता है।

तत्पश्चात् मन्मथेश्वरतीर्थको जाय। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य कभी यमलोकको नहीं देखता। वहाँ स्नान करके पवित्रचित्त हो मुनिभावसे रहनेवाला जो मनुष्य उत्तम भक्तिपूर्वक उपवास करता है, उसे सहस्र गोदानका फल प्राप्त होता है।

इसके बाद एरण्डीश्वरतीर्थमे जाना चाहिये। ब्रह्माजीके मानसपुत्रोंमें एक महर्षि अत्रिके नामसे प्रसिद्ध हैं। उनकी पत्नीका नाम अनसूया है। उनमें पत्नीके सभी सद्गुण मौजूद हैं। वे पतिव्रता, पतिप्राणा और पतिके हित करनेमें सदा संलग्न रहनेवाली हैं। एक दिन वे दोनों श्रेष्ठ दम्पति अपराह्नकालमें कहीं सुखपूर्वक बैठे थे। उस समय मुनिवर अत्रिने कहा—"प्रिये! चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें तुम-जैसी पतिव्रता स्त्री दूसरी नहीं है। जो नारी अपने पति और पुत्र दोनोंको प्रिय हो तथा सुहृद्जनोंके हितमें संलग्न रहनेवाली हो, वह धन्य है। शास्त्रोंका कथन है—'पुत्रसे मनुष्य पुण्यलोकोंपर विजय पाता है, पुत्रसे उसकी परम गति होती है।' पृथ्वीपर पुत्रके सदृश कोई बन्धु नहीं देखा जाता है, जो कि घोर असिपत्रवनमें गिरते हुए पिताकी रक्षा करता है। अकालमें, दीनता आदिमें तथा बुढ़ापेमें भी पुत्र पिताका पालन करता है।"