संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1082, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०५३
अनसूया बोली—ब्रह्मन्! पतिदेव! जो नारी पतिव्रता है, वह पति और पुत्र दोनोंकी वृद्धि करनेवाली है तथा धर्म, अर्थ और काम तीनोंकी साधिका है। अतः वह सबके द्वारा पालन करने योग्य है। जप, तप, तीर्थयात्रा, पुत्रेष्टि तथा मन्त्र-साधना आदि साधन पुत्रकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं, ऐसा सभी गुरुजन कहते हैं। यदि आपकी आज्ञा हो, तो मैं पुत्रके लिये दुष्कर तपस्या करूँ।
अत्रिने कहा—महाप्राज्ञे! तुम्हें साधुवाद है। मैं आज्ञा देता हूँ, तुम पुत्रके लिये तपस्या करो।
तब अनसूयाने अपने पतिको साष्टांग प्रणाम करके कहा—विप्रवर! आपके प्रसादसे मैं सिद्धि प्राप्त करूँगी। ऐसा कहकर अनसूया नर्मदा नदीके तटपर गयी, जो सोमनाथके तुल्य महत्त्व रखनेवाला था। नर्मदाके समीप दो योजनतक वहाँ दोनों तटकी भूमि बड़ी उत्तम है। नर्मदाके उत्तर तटपर पहुँचकर अनसूया नियमपालनमें संलग्न हुई। वह पत्ते चबाकर अथवा साग खाकर रहती और उत्तम स्तोत्रोंद्वारा देवताओंकी स्तुति करती थी। तब भगवान् विष्णु, महादेवजी और ब्रह्माजी एरण्डीसंगममें आये तथा ब्राह्मणका रूप धारण करके अनसूयाके आगे खड़े होकर मन्त्रोंका उच्चारण करने लगे। अनसूयाजी अर्घ्य देकर उठीं और कहने लगीं—'आज मेरा जन्म सफल हुआ और आज मेरी तपस्या सफल हो गयी।' ऐसा कहकर उन्होंने परिक्रमा की और प्रणाम करके कहा—'विप्रवरो! आज मैं दिव्य कन्द, मूल और फल भोजन कराकर आपलोगोंको तृप्त करूँगी।'
ब्राह्मण बोले—सुव्रते! तुम्हारे दर्शनसे ही हम तृप्त हैं। बताओ, तुम किसलिये तप कर रही हो?
अनसूयाने कहा—ब्राह्मणो! तपस्यासे स्वर्गकी सिद्धि होती है, तपस्यासे उत्तम गति मिलती है और तपस्यासे ही मनुष्य सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करता है।
ब्राह्मण बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवि! वर माँगो। हम तीनों ब्रह्मा, विष्णु और महादेव हैं। लोककी दृष्टिमें हमने अपने स्वरूपको छिपा रखा है।
इतना कहकर उन्होंने अपने-अपने स्वरूपका दर्शन कराया। वे कोटि-कोटि सूर्योंके समान कान्तिमान् दिखायी देने लगे।
अनसूयाने कहा—यदि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र कृपा करके मुझपर प्रसन्न हुए हैं, तो इस समय मुझे यही वरदान दें कि मेरे पुत्र होकर उत्पन्न हों।
तब भगवान् विष्णुने कहा—कल्याणी! मैं तुम्हें देवतुल्य पराक्रमी, पिताके समान गुणवान्, सोमयाजी और बहुश्रुत पुत्र देता हूँ।
अनसूयाने कहा—भगवन्! मैंने जैसी प्रार्थना की है, उसके अनुकूल, मनोवांछित वस्तु मुझे देनी चाहिये। उसके विपरीत नहीं करना चाहिये।
तब तीनों देवता बोले—कल्याणी! हम तुम्हारे अयोनिज पुत्र होंगे, क्योंकि देवता गर्भमें निवास नहीं करते।
इतना कहकर वे तीनों देवता चले गये। नर्मदातटपर यह श्रेष्ठ वरदान पाकर अनसूया देवी महेन्द्रपर्वतपर अपने पतिके समीप गयीं। उन्हें देखकर अत्रि मुनिने कहा—'महाप्राज्ञे! धन्यवाद। तुमने वह दुर्लभ वरदान पाया है, जो सम्पूर्ण स्त्रियोंके लिये असाध्य है।'
अनसूयाने कहा—महर्षे! आपके प्रसादसे ही मुझे दुर्लभ वरकी प्राप्ति हुई है।
ऐसा कहकर हर्षमें भरी हुई महादेवी अनसूयाने अपने प्राणवल्लभ मुनिकी ओर देखा और मुनिने भी उस शुभदर्शना पत्नीकी ओर दृष्टिपात किया। परस्पर दर्शनसे ही अत्रिके ललाटमें एक शुभ्र ज्योतिर्मण्डल प्रकट हुआ। जिसकी किरणें नौ सहस्र योजनतक फैली हुई थीं। कदम्बपुष्पके समान गोल आकारवाला ब्रह्ममण्डल त्रिविध परिधिमण्डलसे घिरा हुआ था। मण्डलके मध्यभागमें दिव्य पुरुषरूपधारी देवेश्वर ब्रह्माजी प्रकट हुए, जो सुवर्णके समान कान्तिमान् और कोटि-कोटि