भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1083

१०५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सूर्योंके समान प्रभापुंजसे व्याप्त थे। ये ही अनसूयाके प्रथम पुत्र साक्षात् ब्रह्माजीके अवतार चन्द्रमा नामसे विख्यात हुए। इन्हींको सोम भी कहते हैं। ये सोलह कलाओंसे संयुक्त हो माता-पिताके श्रेष्ठ एवं प्रिय पुत्र हुए। इनकी कलाओंके नाम इस प्रकार हैं—प्रतिपत्, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा पंद्रहवीं पूर्णमासी कही गयी है। सोलहवीं कलाका नाम अमावास्या है। ये चन्द्रमा सूक्ष्म होकर चार प्रकारके जीवोंसे युक्त सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को तृप्त करते हैं। आहुतिमें दिया हुआ द्रव्य चन्द्रमामें ही स्थित होता है। अमावास्याके ये चन्द्रमा जब वनस्पतियोंमें व्याप्त रहते हैं, उस समय जो मूढ़ मानव किसी वनस्पतिको काटता है वह दुःख भोगता है और अपने किये हुए एक वर्षके पुण्यको भस्म कर देता है। इन दिव्य गुणोंसे विशिष्ट सोमरूपी ब्रह्माजी अनसूयाको आनन्द प्रदान करनेवाले प्रथम पुत्र हुए। उनके दूसरे पुत्र महाभाग दुर्वासा मुनि हैं, जो सृष्टिसंहारकारी साक्षात् महेश्वरके अवतार हैं। अनसूयाजीके तीसरे पुत्र दत्तात्रेयके नामसे विख्यात हुए, जो जगद्व्यापी जगन्नाथ साक्षात् भगवान् विष्णुके अवतार हैं। इस प्रकार ब्रह्मा और महादेवजीके साथ भगवान् विष्णुने अवतार ग्रहण किया। तभीसे नर्मदाके उत्तर तटपर अनसूयाजीके द्वारा प्रसिद्ध किया हुआ पुत्र-प्राप्तिपद नामक तीर्थ है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है।

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सौवर्णतीर्थ, करण्डेश्वरतीर्थ, भाण्डारतीर्थ, रोहिणीतीर्थ, चक्रतीर्थ तथा धूमपाततीर्थका माहात्म्य और माहात्म्य-श्रवणका फल

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर ! तदनन्तर सौवर्ण नामक उत्तम तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात और सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ संगमके समीप नर्मदास्नानका अवसर दुर्लभ है। उस पुण्यक्षेत्रमें वह पावन तीर्थ एक हाथ भूमिमें ही स्थित है। उस सुवर्णशिलकमें स्नान करके मनुष्य कल्याणमयी परम शान्तिको प्राप्त होता है। जो मनुष्य उपवास करके जितेन्द्रिय भावसे वहाँ शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको श्राद्ध करता है, वह अपने कुलकी दस पूर्व पीढ़ियोंका और दस आनेवाली पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है।

इसीके समीप करण्डेश्वर नामक उत्तम तीर्थ है, जो नर्मदाके उत्तर तटपर स्थित है। वह सब पापोंको हरनेवाला तथा सब प्रकारके दुःखोंका नाश करनेवाला है। वहाँसे परम सुन्दर सौभाग्यकरण नामक तीर्थको जाय, जो मनुष्योंके सब पापोंका नाश करनेवाला है। युधिष्ठिर ! जो भाग्यहीन स्त्री या पुरुष वहाँ स्नान करके उमा-महेश्वरका पूजन करते हैं, उन्हें सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। तृतीया तिथिको दिन-रात उपवास करके जितेन्द्रिय पुरुष सुरूपवान् सपत्नीक ब्राह्मणको निमन्त्रित करे। आनेपर पाद्य-अर्घ्य आदि देनेके पश्चात् उन्हें सुगन्धित पुष्पोंकी मालाओंसे अलंकृत करे। फिर पुष्प देकर धूपकी सुगन्धसे सुवासित करे। तत्पश्चात् भक्तिभावसे खीर अथवा खिचड़ी भोजन करावे। विधिपूर्वक भोजन कराकर ब्राह्मण-दम्पतिकी परिक्रमा करे। फिर नर्मदाके जलमें स्नान और दान करे। ऐसा करनेवाली सौभाग्यवती स्त्री कभी पतिवियोगको नहीं प्राप्त होती।

तदनन्तर भाण्डारतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ पूर्वकालमें कुबेरने तपस्या की थी, जिससे ब्रह्माजी प्रसन्न हुए थे।

उसके बाद परम उत्तम रोहिणीतीर्थ है। महाप्रलयके समय जब भयंकर एकार्णवके जलमें समस्त चराचर जगत्‌का नाश हो गया, तब जलके भीतर शयन करनेवाले देवाधिदेव भगवान्