संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1084, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०५५
विष्णुकी नाभिसे कर्णिका, केसर और दलोंसे युक्त एक महाकमल प्रकट हुआ, जो सूर्यमण्डलके समान देदीप्यमान था। उस कमलमें चार मुखारविन्दोंसे सुशोभित ब्रह्माजी उत्पन्न हुए और सोचने लगे कि 'मैं क्या करूँ?' इसी समय उनके शरीरसे भगवान् मरीचि प्रकट हुए। कुछ कालके बाद मरीचिसे कश्यप उत्पन्न हुए। उन्हीं दिनों दक्ष प्रजापतिके पचास कन्याएँ हुईं, जिनमेंसे दस धर्मको और तेरह कश्यपको ब्याह दी गयीं। सत्ताईस कन्याएँ उन्होंने चन्द्रमाको दे दीं। उन कन्याओंमें रोहिणी सबसे सुन्दरी एवं चन्द्रमाके समान मुखवाली थी। रोहिणी सभी स्त्रियोंको प्रिय लगती थी और पतिको तो वह विशेष प्रिय लगती थी। उसने तपस्या करनेका निश्चय करके नर्मदाजीके तटको प्रस्थान किया और वहाँ बड़ी कठोर तपस्या की। वह दीर्घकालतक निरन्तर महिषासुरमर्दिनी दुर्गादेवीकी आराधनामें लगी रही। प्रतिदिन नर्मदाके जलमें स्नान करके उसने व्रत और नियमोंका पालन किया। इससे प्रसन्न होकर भगवती नारायणीने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया और इस प्रकार कहा—'महाभागे! तुम मनोवांछित वर माँगो।' रोहिणीने कहा—'देवि! मैं अपनी सपत्नियोंके बीचमें सबसे अधिक पतिकी प्यारी होऊँ। मेरी यह इच्छा शीघ्र पूर्ण हो, ऐसी कृपा करें।'
तब 'एवमस्तु' कहकर भगवती महालक्ष्मी भक्तिपरायण देवताओंकी स्तुति सुनती हुई वहाँसे अन्तर्धान हो गयीं। तबसे रोहिणी देवी चन्द्रमाको अधिक प्रिय हुई और सम्पूर्ण लोकोंको भी वह प्यारी लगने लगी। उस तीर्थमें जो स्त्री और पुरुष भक्तिपूर्वक स्नान करते हैं, उनमेंसे स्त्री अपने पतिको तथा पति अपनी स्त्रीको अधिक प्रिय होते हैं।
तदनन्तर सब पापोंका नाश करनेवाले परम उत्तम चक्रतीर्थमें जाय, जो सेनापुरके नामसे विख्यात है। यहीं देवाधिदेव चक्रधारी भगवान् विष्णुने स्वामिकार्तिकेयका सेनापतिके पदपर अभिषेक किया था। जो क्रोधको जीतकर भगवान् विष्णुके प्रिय चक्रतीर्थमें जाता है, वह पापोंसे मुक्त होता और भयंकर यमराजको नहीं देखता है। वहाँ रात्रिमें जागरण करके भगवान् विष्णुके लिये दीपदान करे और एकाग्रचित्त हो उन्हींकी कथा-वार्ता सुने। जो उस तीर्थमें भीमव्रत, पराक, कृच्छ्र, चान्द्रायण, त्रिरात्र आदिका अनुष्ठान करता है, वह अन्तमें वैतरणीनदीको तर जाता है और दिन-रात चलते हुए भीमचक्र, कूटशाल्मलि आदि नरकोंकी यातना कभी नहीं देखता है।
महाबाहो! इस प्रकार लोकपावनी नर्मदा तीनों लोकोंके लिये पूजनीय हैं। उनका अनुपम माहात्म्य मैंने तुम्हें सुनाया है। महाभाग! इसे भक्तिपूर्वक सुनकर मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
इस खण्डके आदि, मध्य और अन्तमें नर्मदा नदीका उत्तम माहात्म्य बताया गया है। जो कोई भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करता है, उसे मनोवांछित फलकी प्राप्ति होती है। जो मनुष्य जितेन्द्रियभावसे इस अनुपम माहात्म्यको सुनकर दान करता है, उसके सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है। धूप, दीप और चन्दन आदिसे पुस्तककी पूजा करके इसका दान करना चाहिये। ब्राह्मणोंकी भी पूजा करनी चाहिये। इस माहात्म्यके श्रवण और दानसे नर्मदा देवी अत्यन्त प्रसन्न होती हैं। प्रत्येक तीर्थमें पवित्र माहात्म्य सुनकर दान करना चाहिये, तभी तीर्थसेवन सफल होता है।
इस प्रकार नर्मदाजीका माहात्म्य सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने नर्मदातटवर्ती तीर्थोंकी यात्रा की।
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