भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1085, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1085

१०५६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


श्रीसत्यनारायण-व्रतकी विधि, ब्राह्मण और लकड़हारेकी कथा

ऋषियोंने सूतजीसे पूछा—महामुने ! किस व्रत या तपसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है? हम सुनना चाहते हैं, कृपया बताइये।

सूतजी बोले—देवर्षि नारदने यही बात भगवान् कमलाकान्तसे पूछी थी, उन्होंने जो उसका उत्तर दिया था, उसीको आप सुनिये। एक दिन दूसरोंपर अनुग्रह करनेवाले योगी नारदजी विविध लोकोंमें घूमते हुए मर्त्यलोकमें आये। उन्होंने देखा, यहाँके सभी मनुष्य भाँति-भाँतिके दुःखोंसे पीड़ित हैं और अपने-अपने कर्मके फलस्वरूप विविध योनियोंमें जन्म लेकर क्लेश पा रहे हैं। वे सोचने लगे—'किस उपायसे इनका दुःख निश्चितरूपसे दूर हो सकता है।' मन-ही-मन इस प्रकार सोचकर वे विष्णुलोकमें गये और वहाँ जाकर उन्होंने शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी, वनमालासे विभूषित, शुक्लवर्ण चतुर्भुज देवदेवेश्वर भगवान् नारायणको देखकर कुछ कहना चाहा।

नारदजी बोले—आप मन और वाणीसे अतीत अनन्तशक्ति हैं। आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, निर्गुण हैं, गुणात्मा हैं, सबके आदिभूत हैं और भक्तोंके दुःखका नाश करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है।

भगवान् विष्णुने नारदका स्तवन सुनकर उत्तर दिया—

श्रीभगवान् बोले—महाभाग ! तुम किस लिये यहाँ आये हो और तुम्हारे मनमें क्या अभिलाषा है? बताओ, मैं तुम्हारी सब बातोंका उत्तर दूँगा।

नारदजी बोले—मर्त्यलोकमें मनुष्य पापकर्मवश विविध योनियोंमें जन्म लेकर नाना प्रकारसे क्लेश पा रहे हैं और अपने-अपने पापोंका फल भोग रहे हैं। हे नाथ! उनके वे सारे क्लेश सहजमें ही कैसे दूर हो सकते हैं? यदि मुझपर आपकी कृपा है तो वह उपाय बताइये। उसीको सुननेकी मेरी इच्छा है।

श्रीभगवान्ने कहा—वत्स ! लोगोंके प्रति अनुग्रहकामी होकर तुमने बड़ी अच्छी बात पूछी। जिसके करनेसे मनुष्य मोहसे मुक्त होता है, वह मैं तुमसे कह रहा हूँ, सुनो।

एक अत्यन्त पवित्र व्रत है, जो स्वर्ग या पृथ्वीपर अति दुर्लभ है। मैं स्नेहवश, हे विप्र! आज उसीको प्रकट कर रहा हूँ। इस व्रतका नाम सत्यनारायण-व्रत है। इसको भलीभाँति विधानपूर्वक बतलाता हूँ। इस व्रतका सम्यक्-रूपसे अनुष्ठान किये जानेपर इस लोकमें सुख भोगकर मनुष्य परलोकमें मोक्षको प्राप्त करता है।

भगवान्‌की इस बातको सुनकर नारदजीने फिर कहा—इस व्रतका क्या फल है, इसकी क्या विधि है और किसने यह व्रत किया था तथा कब किया था? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये।

श्रीभगवान् बोले—इस व्रतसे दुःख-शोकादिका नाश होता है, धन-धान्यकी वृद्धि होती है और यह व्रत सौभाग्य, सन्तति तथा सर्वत्र विजय प्रदान करता है। मनुष्य भक्ति-श्रद्धाके साथ जिस किसी दिन यह व्रत कर सकता है। परंतु सत्यनारायणदेव निशामुख अर्थात् सन्ध्याके समय पूजे जानेपर सन्तुष्ट होते हैं। धर्मपरायण मनुष्य ब्राह्मण और बन्धु-बान्धवोंके साथ यह व्रत करे। भक्तिके द्वारा भोग लगावे। भोग उत्तम पदार्थोंका होना चाहिये। भोग सवाके हिसाबसे (जैसे सवा छटाक, सवा पाव, सवा सेर आदि) होना चाहिये। केला, घी, दूध, गेहूँ, गेहूँका आटा, गेहूँका आटा न मिलनेपर चावलका आटा और चीनी अथवा गुड़‌का भोग लगाना चाहिये। ये सभी चीजें परिमाणमें सवाके हिसाबसे होनी

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