भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1086

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०५७

चाहिये और सबको एकत्रकर निवेदन करना चाहिये। तदनन्तर घरके लोगोंके साथ कथा सुनकर ब्राह्मणको दक्षिणा देनी चाहिये। इसके बाद ब्राह्मणोंको प्रसाद खिलाकर अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ भक्तिपूर्वक स्वयं प्रसाद ग्रहण करना चाहिये और भगवान्‌के सामने (प्रेमपरवश होकर) नाचना और गाना चाहिये। इसके बाद स्तुति करके सत्यनारायण भगवान्‌का स्मरण करते हुए घर जाना चाहिये। इस प्रकार करनेपर मनुष्योंको निश्चय ही मनोवांछित फल प्राप्त होगा। विशेषकर इस कलियुगमें तो सत्यनारायण-व्रतके अतिरिक्त पृथ्वीपर अभीष्टसिद्धिका और कोई उपाय ही नहीं है।

पूर्वकालमें एक ब्राह्मण इस व्रतको करके कृतकृत्य हो गये थे। अब उनकी कथा कहता हूँ। काशीपुर ग्राममें एक निर्धन ब्राह्मण रहते थे। वे भूख-प्याससे व्याकुल होकर सदा पृथ्वीपर भटका करते। ब्राह्मणको दुःखी देखकर ब्राह्मणप्रिय भगवान् वृद्ध ब्राह्मणका रूप बनाकर उनके पास आये और उन्होंने आदरके साथ पूछा—‘ब्राह्मण देवता! आप किसलिये अत्यन्त दुःखित होकर सारी पृथ्वीपर भटक रहे हैं। यदि आपकी अभिरुचि हो तो सारी बात मुझसे कहिये। मैं सुनना चाहता हूँ।’

ब्राह्मणने कहा—मैं बड़ा गरीब हूँ और भीख माँगनेके लिये ही इस प्रकार भटकता रहता हूँ। आप कोई उपाय जानते हों, तो हे प्रभो! कृपापूर्वक मुझे बताइये।

वृद्ध ब्राह्मणने कहा—सत्यनारायण विष्णु-भगवान् मनचाहा फल देते हैं। द्विजश्रेष्ठ! आप सत्यनारायणका उत्तम व्रत करें। मनुष्य इस व्रतको करके सब दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।

श्रीभगवान् बोले—वृद्ध बने हुए सत्यनारायण ब्राह्मणको आदरपूर्वक व्रतकी पूरी विधि बताकर वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर वे ब्राह्मण मन-ही-मन भगवान्‌का चिन्तन करते हुए घर लौटे। उन्होंने समझा कि ‘नारायणने ही मुझको यह व्रत बतलाया है, अतएव मैं इस व्रतको करूँगा’ ब्राह्मण इसी सोच-विचारमें रहे। उनको रात्रिमें नींद नहीं आयी। प्रातःकाल उठते ही ‘मैं सत्यनारायण-व्रत करूँगा’ यह संकल्प करके ब्राह्मण भिक्षाके लिये चले। उस दिन ब्राह्मणको भिक्षामें प्रचुर द्रव्यकी प्राप्ति हुई। उसके द्वारा उन्होंने बन्धु-बान्धवोंके साथ सत्यनारायणका व्रत किया और उस व्रतके प्रभावसे वे श्रेष्ठ ब्राह्मण समस्त दुःखोंसे छूटकर सम्पूर्ण सम्पत्तिसे सम्पन्न हो गये। तबसे वे प्रतिमास सत्यनारायण-व्रत करने लगे।

श्रीभगवान्‌ने कहा—वे उत्तम ब्राह्मण वृद्धरूपधारी नारायणके द्वारा व्रतको जानकर सारे पापोंसे मुक्त हो गये और उन्होंने दुर्लभ मोक्षकी प्राप्ति की। नारद! जिस समय इस व्रतका पृथ्वीमें प्रचार होगा, उसी समय मनुष्योंके समस्त दुःख नष्ट हो जायँगे।

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! नारायणने महात्मा नारदको जैसा कहा था, ठीक वैसा ही मैंने आपलोगोंसे कह दिया। अब और क्या कहूँ।

ऋषियोंने पूछा—इसके बाद पृथ्वीपर इस व्रतका अनुष्ठान किस मनुष्यने किया था? हे मुने! यह सब हम सुनना चाहते हैं। इस विषयमें हमारे मनमें बड़ी श्रद्धा उत्पन्न हो गयी।

सूतजी बोले—मुनियो! उसके बाद पृथ्वीपर किसने यह व्रत किया था, सो सुनो। एक दिन वे श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ अपने वैभवके अनुरूप व्रत कर रहे थे। इसी समय वहाँ एक लकड़हारा आया। लकड़हारेने लकड़ी बाहर रख दी और वह ब्राह्मणके घरके अंदर चला गया। उस समय वह प्याससे पीड़ित था। उन ब्राह्मणको कार्यमें लगे देखकर प्रणाम करके उसने पूछा—‘महाराज! आप यह क्या कर रहे हैं?’

ब्राह्मणने कहा—यह सत्यनारायण-व्रत है।