भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1087

१०५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


यह व्रत दुःख-दारिद्र्यका नाश करता है, सब प्रकारकी इच्छित वस्तुओंको देता है और पुत्र-पौत्रादिकी वृद्धि करता है। इस व्रतके प्रभावसे ही धन-धान्यादि महान् समृद्धिसे मेरा घर भर गया है। ब्राह्मणकी इस बातको सुनकर लकड़हारेको बड़ा हर्ष हुआ। वह जल पीकर और प्रसाद लेकर स्थिर मनसे सत्यनारायणदेवका चिन्तन करता हुआ नगरमें गया। उसने मन-ही-मन कहा कि 'आज लकड़ियोंके बेचनेपर जो कुछ मिलेगा, उसीके द्वारा मैं सत्यदेवका उत्तम व्रत करूँगा।' इस प्रकार मनमें विचारकर वह लकड़ियोंके बोझेको सिरपर उठा नगरमें धनियोंके रमणीय स्थानमें पहुँचा। आज लकड़हारेको लकड़ियोंका दूना मूल्य मिला। उसका हृदय प्रसन्न हो गया। वह पके हुए केले, चीनी, घी, दूध और गेहूँका आटा—सब वस्तुएँ सवाये हिसाबसे लेकर घर पहुँचा। तदनन्तर बन्धु-बान्धवोंको निमन्त्रण देकर उसने विधिपूर्वक व्रत किया। उस व्रतके प्रभावसे वह लकड़हारा धन और पुत्रसे सम्पन्न हो गया तथा इहलोकमें सुख भोगकर अन्तमें सत्यपुरको प्राप्त हुआ।

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सत्यनारायण-व्रतकी महिमा, राजा उल्कामुख, साधु वणिक् और राजा वंशध्वजकी कथा

सूतजीने कहा— एक घटना और कहता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें उल्कामुख नामक एक जितेन्द्रिय, सत्यवादी, प्रबल पराक्रमी राजा थे। वे बुद्धिमान् राजा प्रतिदिन भगवान्‌के मन्दिरमें जाते और धन देकर ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट करते। उनकी पत्नीका नाम था भद्रशीला। वह सरोजवदना, प्रमुग्धा और पतिपरायणा सती थी। राजा रानीके साथ समुद्रके तीरपर जाकर सत्यनारायणका व्रत किया करते थे। एक दिन जब राजा व्रत कर रहे थे, एक साधु नामक वणिक् वहाँ आया। वह व्यापारके लिये नाना प्रकारके रत्नादि पदार्थोंको नौकामें भरकर लाया था। वणिक् समुद्रके किनारे नावको खड़ी करके तटके ऊपर आया और व्रत करते हुए राजाको देखकर उसने विनयपूर्वक पूछा।

साधुने कहा— राजन्! भक्तियुक्त चित्तसे आप यह क्या अनुष्ठान कर रहे हैं? इस समय मेरी इसे जाननेकी इच्छा है। अतएव आप समझाकर कहें।

राजा बोले— साधो! मैं अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ अतुलनीय तेजयुक्त भगवान् विष्णुकी पूजा कर रहा हूँ। मेरा यह व्रत पुत्रादिकी प्राप्तिके लिये है।

तदनन्तर साधुने राजाको आदरपूर्वक प्रणामकर कहा— राजन्! इस व्रतकी सांगोपांग विधि आप मुझे बतलावें; क्योंकि मैं भी यह व्रत करूँगा। मेरे भी सन्तान नहीं है। इस व्रतसे मुझे निश्चय ही सन्तानकी प्राप्ति होगी।

इतना कहकर वणिक्ने उन राजासे व्रतकी विधि अच्छी तरह पूछकर वहाँसे प्रस्थान किया और अपने वाणिज्यका काम पूरा करके वह आनन्दके साथ घर लौट आया। कुछ ही दिनोंके बाद उसकी पतिव्रता पत्नी गर्भवती हुई और समयपर उसने एक अति सुन्दरी कन्याको जन्म दिया। कन्या शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिनोंदिन बढ़ने लगी। वणिक्ने उसका जातकर्मादि संस्कार करवाकर उसका नाम रखा कलावती। तदनन्तर वणिक्पत्नी लीलावतीने मधुर वचनोंमें पतिसे कहा— 'स्वामी! आपने पूर्वमें जो (सत्यनारायण-व्रत करनेकी) प्रतिज्ञा की थी, उसे अब पूरी क्यों नहीं कर रहे हैं?'

साधुने उत्तर दिया— प्रिये! मैं कलावतीके विवाहके समय सत्यनारायणका व्रत करूँगा।