संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1088, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०५९
पत्नीको इस प्रकार आश्वासन देकर साधु-वणिक् समुद्रके तटकी ओर चला गया। इधर पिताके घरमें कलावती बढ़ने लगी। इसके बाद धर्मके जाननेवाले पिताने जब अपनी पुत्रीको विवाहके योग्य देखा, तब अपने बन्धु-बान्धवोंसे परामर्श करके साधुने वर ढूँढ़नेके लिये दूतको भेजा। दूत साधुका आदेश पाकर कांचननगर गया और वहाँ कलावतीके योग्य एक उत्तम वरकी खोज करके वहाँसे उस वणिक्-पुत्रको साथ लेकर लौट आया।
साधु वणिक् उस सुन्दर और सद्गुणी वणिक् कुमारको देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और अपने जाति-बन्धुओंके साथ मिलकर प्रसन्नतापूर्वक यथाविधि अपनी कन्याको उसके अर्पण कर दिया।
दुर्भाग्यवश कलावतीके विवाहके समय भी वणिक् उस उत्तम व्रतकी बात भूल गया। इससे भगवान् उसपर रुष्ट हो गये। कुछ दिनोंके बाद वह व्यापारमें निपुण वणिक् अपने श्रीमान् जामाताको साथ लेकर व्यापारके लिये बाहर गया और राजा चन्द्रकेतुके राज्यमें समुद्रके समीप रमणीय रत्नसार नगरमें जा पहुँचा। वहाँ एक पुरी बनाकर वह अपना व्यापार करने लगा। उसी समय प्रभु सत्यनारायणने साधुको मिथ्यावादी जानकर उसे शाप देते हुए कहा—'आजसे कुछ ही दिनोंमें यहीं तुम दुःखको प्राप्त होओगे।' इधर उसी दिन एक चोरने राजमहलमें धन चुराया। चोर धनको लेकर साधुके मकानके बगलके रास्तेसे जा रहा था। उसने घूमकर पीछेकी ओर देखा, राजाके दूत उसके पीछे-पीछे दौड़े आ रहे थे। वह डर गया और चुराये हुए धनको वहीं छोड़कर जल्दीसे भाग निकला। दूतोंने आकर देखा, साधु वणिक्के घरके पास राजाका धन पड़ा है। तब उन्होंने जामाताके साथ साधुको पकड़ लिया और उन्हें बाँधकर प्रसन्न मनसे तुरंत राजाके समीप ले जाकर कहा—'प्रभो! दोनों चोर पकड़कर आ गये हैं। इनको देखिये और आज्ञा दीजिये कि क्या किया जाय?' तत्पश्चात् राजाकी आज्ञासे दूतोंने दोनों वणिकोंको अच्छी तरह बाँधकर बड़े कठिन कारागारमें डाल दिया।
उस समय उनके सम्बन्धमें कोई भी विचार नहीं किया गया। उन दोनोंने बहुत कुछ कहा; परंतु सत्यनारायणदेवकी मायासे किसीने उनकी एक भी नहीं सुनी। इसके बाद राजा चन्द्रकेतुने उनकी सारी धन-सम्पत्ति छीन ली। इधर सत्यदेवके शापसे घरमें लीलावती और कलावतीपर भी दुःख आ पड़ा। घरमें जो कुछ भी धन-सम्पत्ति थी, चोरोंने सारी अपहरण कर ली। लीलावती मानसिक और शारीरिक व्याधिसे तथा भूख-प्याससे पीड़ित हो दाने-दानेकी चिन्तामें नगरमें घर-घर भटकने लगी। इस प्रकार कलावती भी प्रतिदिन अन्नके लिये भटकने लगी। एक दिन भूखसे व्याकुल कलावती घरसे निकलकर किसी ब्राह्मणके घर पहुँची। उसने देखा, वहाँ सत्यनारायणका व्रत हो रहा है। वह वहाँ बैठ गयी और कथा सुनकर उसने भगवान्से मनोरथपूर्तिके लिये प्रार्थना की। इसके बाद प्रसाद लेकर उसी रातको वह अपने घर लौट आयी।
लीलावतीने कन्याको बहुत डाँटकर कहा—बेटी! तू इतनी राततक कहाँ थी? तेरे मनमें क्या है?
कलावतीने उत्तर दिया—माता! ब्राह्मणके घर सत्यनारायण भगवान्का व्रत था। मैं उसीको देख रही थी। सत्यनारायणका व्रत मनोरथ पूर्ण करनेवाला है।
कन्याकी यह बात सुनकर लीलावती व्रत करनेको तैयार हुई और उस साध्वी साधुपत्नीने अपने सुहृद्-बन्धुओंके साथ सत्यनारायण-व्रत किया। 'मेरे स्वामी और जामाता शीघ्र घर लौट आवें'—सत्यनारायणदेवसे उसने बार-बार इस वरके लिये प्रार्थना की और कहा, 'प्रभो! मेरे