भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1089

१०६० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पति और दामादका अपराध क्षमा कीजिये।' वणिक्पत्नीके व्रतसे प्रभु सत्यनारायण प्रसन्न हो गये और उन्होंने श्रेष्ठ राजा चन्द्रकेतुको स्वप्नमें दर्शन देकर कहा, 'राजन्! सबेरा होते ही दोनों वणिकोंको छोड़ देना और उनका जो धन छीना है, उससे दुगुना उन्हें दे देना। नहीं तो मैं राज्य, धन और पुत्रके साथ तुम्हारा विनाश कर दूँगा।' राजाको इतना कहकर प्रभु अन्तर्धान हो गये। प्रातःकाल होते ही राजा सभामें गये और स्वजनोंके साथ वहाँ बैठकर उन्होंने दूतोंको आज्ञा दी कि 'अभी जाकर दोनों बन्दी महाजनोंको तुरंत कैदसे छोड़ दो।'

राजाकी आज्ञा पाकर दूतोंने दोनों महाजनोंको मुक्त कर दिया और उन्हें साथ लेकर विनयपूर्वक राजासे कहा, 'दोनों वणिकोंकी हथकड़ी-बेड़ी खोलकर हम उन्हें यहाँ ले आये हैं।' इसी समय उन दोनोंके मनमें पुरानी बातका स्मरण हुआ और भगवान् सत्यनारायणकी महिमाको याद करके वे विस्मय और भयसे विह्वल हो गये। उन्होंने राजा चन्द्रकेतुको प्रणाम किया। राजाने भी उनको देखकर आदरपूर्वक कहा, 'दैवात् तुम्हें यह महान् कष्ट भोगना पड़ा। अब तुम्हें कोई भय नहीं है। तुम मुक्त हो, जाओ, क्षौर करा लो।' तदनन्तर श्रीमान् राजा चन्द्रकेतुने सोने और रत्नोंसे बने हुए गहनोंके द्वारा दोनों वणिकोंको अलंकृत किया। बड़ी मीठी वाणीसे उनको अति सुख पहुँचाया और छीने हुए धनसे दूना धन देकर उनसे कहा, 'साधो! अपने घर जाओ।'

साधुने राजाको प्रणाम करके कहा—आपकी कृपासे ही मैं घर जानेमें समर्थ हो सका हूँ। उस समय साधुने मंगलाचार करते हुए यात्रा की। ब्राह्मणोंको धनका दान किया और अपने नगरकी ओर दोनों चले।

कुछ ही दूर आगे बढ़नेपर प्रभु सत्यनारायणने दण्डीके वेशमें आकर उनसे पूछा—बताओ तो तुम्हारी नावमें क्या है? तब महाजनने प्रमत्त-से होकर बड़ी अवहेलनाके साथ हँसी उड़ाते हुए कहा, 'दण्डी! क्यों पूछ रहे हो? तुम्हें रुपये चाहिये क्या? मेरी नावमें तो लता-पत्र भरे हैं।'

दण्डीके वेशमें आये हुए सत्यनारायण भगवान्ने साधुके निष्ठुर वचन सुनकर कहा, 'तुम्हारे वचन सत्य हों।' और यह कहकर वे तुरंत वहाँसे चल दिये। दण्डीके कुछ दूर चले जानेपर साधु भी समुद्रके किनारे पहुँचा और नित्य-क्रियादि करके नावपर गया तो देखा, नावमें लता-पत्र भरे पड़े हैं। यह देखकर उसे बड़ा विस्मय हुआ और वह मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। थोड़ी देरके बाद चेत होनेपर वह बड़ी चिन्तामें डूब गया। श्वशुरकी यह दशा देखकर जामाताने उनसे कहा, 'आप किसलिये शोक कर रहे हैं? यह सब दण्डीके शापका फल है। वे सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। वे ही हर्ता-कर्ता हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं। हमलोग उन्हींकी शरण लें, तो हमारा मनोरथ पूर्ण हो जायगा।'

जामाताकी यह बात सुनकर साधु दौड़कर दण्डीके पास पहुँचा और उनके दर्शन करके भक्तिपूर्वक नमस्कार कर उनसे बोला—मैं बड़ा दुरात्मा हूँ। आपकी मायासे मुग्ध होकर मैंने जो कुछ कह दिया है, उसके लिये क्षमा करें। मैंने आपके सामने दुष्ट वाक्योंका प्रयोग किया है। हे नाथ! मुझे इसके लिये क्षमा करें। क्षमा ही साधुओंका धन है। साधु तो दूसरेका उपकार करनेमें ही लगे रहते हैं। यों कहकर शोक-विकल वणिक् बार-बार प्रणाम करने लगा और रोने लगा।

साधु वणिक्को विलाप करते देखकर दण्डीने कहा—रोओ मत, मेरी बात सुनो। दुर्मते! तुम मेरा अपमान करके मेरी पूजासे विमुख हो गये थे। उसीके फलस्वरूप बार-बार दुःखको प्राप्त होते हो।

भगवान्के इस प्रकारके वचनोंको सुनकर साधुने भगवान्की स्तुति की। साधु बोला—