भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1090, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1090
  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०६१

प्रभो! ब्रह्मादि स्वर्गवासी देवता आपकी मायासे मोहित होकर आपके आश्चर्यमय रूप और गुणोंको नहीं जान पाते। मैं भी आपकी मायासे मुग्ध हूँ, अतएव आपको कैसे जान सकूँगा। आप प्रसन्न हों। मैं अपने वैभवके अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मैं आपके शरणागत हूँ। मुझे पुत्र और वित्त दीजिये। मेरी रक्षा कीजिये।

साधुके इस प्रकारके भक्तियुक्त वचनोंको सुनकर भगवान् जनार्दन परितुष्ट हो गये और साधुको मनचाहा वर देकर वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर साधुने नावपर चढ़कर देखा, नाव रत्नादिसे भरी है। 'सत्यदेवकी दयासे मुझे वांछित फल मिल गया।' यों कहकर साधुने अपने मित्रोंके साथ विधिवत् सत्यनारायणकी पूजा की और बड़े हर्षके साथ यात्रा आरम्भ की। नौका बड़े वेगसे चलने लगी। दोनों अपने देशमें आ पहुँचे। साधुने जामातासे कहा—'वत्स ! वह देखो, मेरी पुरी दिखायी दे रही है।' तत्पश्चात् साधुने अपने धनके रखवाले दूतको नगरमें भेजा। दूतने साधुकी पत्नी लीलावतीके समीप जाकर हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कहा, 'आपके पतिदेव नाना प्रकारके धन-रत्नोंके साथ अपने जामाता और सुहृद्-मित्रोंसे घिरे हुए आ रहे हैं।' साध्वी वणिक्-पत्नी दूतके मुखसे स्वामी और जामाताके आनेका समाचार सुनकर बड़ी हर्षित हुई और सत्यदेवकी पूजा करके उसने अपनी लड़कीसे कहा, 'मैं पतिकी अगवानीके लिये जाऊँगी, तुम भी तुरंत मेरे साथ चलो।' माताकी बात सुनकर कलावतीने सत्यनारायणका व्रत किया; परंतु प्रसाद लिये बिना ही वह पतिके सामने चल पड़ी। इससे सत्यनारायणदेव रुष्ट हो गये। धन-रत्न और जँवाईको लेकर नौका जलमें अदृश्य हो गयी। कलावतीने जब पतिको नहीं देखा, तब वह शोकसे अत्यन्त व्याकुल होकर रोती हुई जमीनपर गिर पड़ी। वह अपने पति और नावके न दीखनेसे अत्यन्त शोकातुर थी। कन्याकी इस दशाको देखकर साधु बहुत डर गया। उसने सोचा, यह क्या आश्चर्य हो गया ! नाव खेनेवाले भी बड़ी चिन्ता करने लगे। यह सब देखकर पतिव्रता लीलावती अत्यन्त दुःखसे विह्वल होकर विलाप करती हुई स्वामीसे बोली, 'मैंने अभी-अभी जँवाईको देखा था। क्षणमात्रमें ही नौकाके साथ जामाता अदृश्य हो गये। अब वे कहीं नहीं दीख रहे हैं। पता नहीं, किस देवताने उन्हें इस प्रकार हरण कर लिया। आप क्या भगवान् सत्यदेवके प्रभावको नहीं जानते ?' लीलावती इस प्रकार कहकर विलाप करने लगी। उसीके साथ सारे बन्धु-बान्धव भी रोने लगे। लीलावती अपनी कन्याको गोदमें लेकर रुदन करने लगी। कन्या कलावतीने स्वामीको डूबा हुआ जानकर दुःखित हृदयसे पतिकी पादुकाको लेकर सती होनेका निश्चय किया। धर्मको जाननेवाला साधु वणिक् कन्याकी यह स्थिति देखकर अपनी पत्नीके साथ शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो उठा और उसने मन-ही-मन सोचा—'निश्चय ही सत्यदेवकी मायाके द्वारा ही मेरे जामाता हरे गये हैं। मैं अपने वैभवके अनुसार भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करूँगा।'

साधुने वहाँ सब लोगोंको बुलाकर यह बात कही और अपना मनोरथ व्यक्त करते हुए पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर वह बार-बार भगवान् सत्यदेवको प्रणाम करने लगा। इससे सत्यदेव प्रसन्न हो गये। उन्होंने आकाशसे ही साधुके प्रति कहा—'साधो ! तुम्हारी कन्या मेरे भोगका तिरस्कार करके पतिको देखनेके लिये आ गयी। इसीलिये उसका पति अदृश्य हो गया। अब वह घर जाय। प्रसाद लेकर लौटकर आवे, तब अवश्य ही उसे स्वामीका सुख प्राप्त होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है।'

वणिक्-नन्दिनी कलावतीने गगनमण्डलसे यह प्राणदान करनेवाली वाणी सुनी और सुनकर