भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1091

१०६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तुरंत ही वह घर चली गयी। वहाँ जाकर उसने प्रसाद लिया। तदनन्तर जब वह लौटकर आयी, तब अपने पतिको, नावको और समस्त बन्धुओंको देखकर अत्यन्त सुखी हुई। उसने पितासे कहा— 'पिताजी! आइये, हमलोग घर चलें। अब देर क्यों कर रहे हैं।' कन्याकी इस बातको सुनकर वणिक् प्रसन्न हो गया और विधि-विधानके साथ भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करके धन-रत्न और बन्धुओंके साथ वह अपने घर पहुँचा। तदनन्तर प्रत्येक संक्रान्ति और पूर्णिमाको यथाविधि सत्यनारायणकी पूजा करता हुआ वह इस लोकमें सुखी होकर अन्तमें सत्यपुरको प्राप्त हो गया।

सूतजी बोले—श्रेष्ठ मुनियो! एक उपाख्यान और सुनिये। पूर्वकालमें वंशध्वज नामक एक प्रजापालनमें तत्पर राजा थे। उन्होंने सत्यदेवके प्रसादका परित्याग किया था। इसलिये वे दुःखको प्राप्त हुए। एक दिन राजाने वनमें जाकर विविध प्रकारके मृगोंका शिकार किया। फिर जब विश्रामके लिये वे बरगदके वृक्षके नीचे आये, तब उन्होंने देखा, ग्वाले लोग बड़े सन्तुष्ट-मनसे मित्रोंको साथ लेकर भक्तिपूर्वक सत्यनारायणदेवकी पूजा कर रहे हैं। राजाने सत्यनारायणकी पूजा होती देखी, पर घमण्डके कारण न तो वे वहाँ गये और न प्रणाम ही किया। ग्वाले राजाके पास प्रसाद रख आये और पूजाकी जगह आकर प्रसाद लेकर अपने घरोंको चले गये। राजाने प्रसाद नहीं लिया। इसीलिये वे बड़े दुःखमें पड़े। उनके सौ पुत्र मर गये। धन-धान्यादि समस्त सम्पत्ति नष्ट हो गयी। तब उन्होंने सोचा, 'सत्यदेवने ही मेरा सब कुछ नष्ट कर दिया है, इसलिये जिस स्थानपर ग्वाले पूजा कर रहे थे, मैं वहाँ जाऊँगा।' राजाने मन-ही-मन ऐसा निश्चय किया और ग्वालोंके पास जाकर उनके साथ भक्ति-श्रद्धापूर्वक यथाविधि सत्यदेवकी पूजा की। तब सत्यदेवकी कृपासे वे धन-पुत्रादिसे सम्पन्न हो गये और इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें विष्णुपुरमें जा पहुँचे।

जो मनुष्य इस परम दुर्लभ सत्यनारायण-व्रतका आचरण करता है, भुक्ति-मुक्तिदायिनी इस पवित्र कथाका श्रवण करता है, वह भगवान् सत्यदेवके प्रसादसे धन-धान्यादि समृद्धिको प्राप्त होता है। इससे दरिद्र धन पाता है, बन्दी बन्धनसे छूटता है, भयभीत भयसे छुटकारा पाता है और मनुष्य इस लोकमें मनोवांछित फलको पाकर अन्तमें सत्यपुरमें गमन करता है। यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं।

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! आपलोगोंको मैंने श्रीसत्यनारायण-व्रत सुनाया। इस व्रतका आचरण करके मनुष्य सारे दुःखोंसे छूट जाता है। विशेषतः कलिकालमें सत्यपूजा महान् फल देनेवाली है। इन देवको कोई 'सत्यनारायण' कहते हैं और कोई-कोई 'सत्यदेव' कहते हैं। ये नाना रूप धारण करके सबके मनोरथको प्रदान करते हैं। ये सनातन सत्यदेव कलियुगमें सत्यव्रतके रूपमें अवतीर्ण होंगे।

श्रेष्ठ मुनियो! जो मनुष्य नित्य इसका पठन या श्रवण करता है, सत्यदेवके प्रसादसे उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं*।

रेवा-खण्ड सम्पूर्ण

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आवन्त्यखण्ड समाप्त

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* यह सत्यनारायण-व्रत-कथा बंगवासी प्रेस, कलकत्तासे प्रकाशित बंगला संस्करणके रेवाखण्डसे अनुवादित है।