भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1092

ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः

संक्षिप्त श्रीस्कन्दमहापुराण

नागरखण्ड (पूर्वार्ध)

राजा त्रिशंकुका वसिष्ठपुत्रोंके शापसे चाण्डाल होकर विश्वामित्र-मुनिकी शरणमें जाना, तीर्थसेवनसे राजाका उद्धार और विश्वामित्रजीके द्वारा उनसे यज्ञ करानेका उद्योग

स धूर्जटिजटाजूटो जायतां विजयाय वः।<br>यत्रैकपलितभ्रान्तिं करोत्यद्यापि जाह्नवी॥*<br><br>सूतजी बोले—पूर्वकालमें त्रिशंकु नामसे प्रसिद्ध एक सूर्यवंशी राजा थे। वे महर्षि वसिष्ठके शिष्य थे और सदा यज्ञ-याग आदि किया करते थे। उन्होंने प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन किया था। एक दिन राजसभामें बैठे हुए मुनिवर वसिष्ठजीसे राजाने विनयपूर्वक कहा—'भगवन्! अब मैं ऐसे यज्ञके द्वारा भगवान्‌की आराधना करना चाहता हूँ, जिससे इस शरीरके साथ ही स्वर्गलोकमें शीघ्र जाना सम्भव हो सके।'<br><br>वसिष्ठजीने कहा—राजन्! ऐसा कोई यज्ञ नहीं है जिसके द्वारा इसी शरीरसे मनुष्य स्वर्गमें जा सके। स्वयम्भू ब्रह्माजीने जिन अग्निष्टोम आदि यज्ञोंका प्रतिपादन किया है, उनके करनेपर भी दूसरे ही शरीरसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है।<br><br>त्रिशंकु बोले—प्रभो! यदि इसी शरीरसे स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला यज्ञ आप मुझसे नहीं करा सकते तो मैं किसी दूसरे ब्राह्मणको आचार्य बनाकर उस यज्ञका अनुष्ठान करूँगा।<br><br>सूतजी कहते हैं—त्रिशंकुका यह वचन सुनकर महर्षि वसिष्ठने हँसते हुए कहा—'पृथ्वीनाथ! आज ही वैसा यज्ञ कीजिये (मुझे कोई आपत्ति नहीं है)।' तब राजा वसिष्ठ मुनिको प्रणामकरके उस स्थानपर गये जहाँ उनके सौ पुत्र रहते थे। उनके सामने भी राजाने अपना वही प्रयोजन रखा। तब उन्होंने भी वही उत्तर दिया जो वसिष्ठजीने कहा था। यह सुनकर राजाने पुनः उनसे कहा—'गुरुपुत्रो! आपके पिताजी इस समय मुझे सशरीर स्वर्ग भेजनेमें असमर्थ हो गये हैं, अतः मैंने उनको छोड़ दिया है। अब मेरे पुरोहित वे नहीं रहे। यदि आपलोग भी मुझसे वैसा यज्ञ नहीं करवायेंगे तो आपको भी छोड़कर मैं शीघ्र दूसरे पुरोहितका वरण करूँगा।' यह सुनकर वे सभी गुरुपुत्र कुपित हो उठे और कठोर वाणीमें बोले—'पापी! तूने हितैषी गुरुका त्याग किया है, इसलिये तू सब लोगोंके द्वारा निन्दित चाण्डाल हो जा।' उनका यह वाक्य पूरा होते ही राजा त्रिशंकु उसी क्षण विकृत एवं विकराल शरीरधारी चाण्डाल हो गये। अपनेको विकृत चाण्डालके रूपमें देखकर राजाको बड़ी लज्जा हुई। वे बहुत दुःखी होकर इधर-उधर घूमने लगे। सोचने लगे—'क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, किस प्रकार मुझे शान्ति मिलेगी? मैं जलती हुई आगमें समा जाऊँ अथवा विष खा लूँ? किस उपायसे आज मेरी मृत्यु हो जाय। ऐसे घृणित शरीरके द्वारा उन स्त्रियोंको मैं कैसे देखूँगा, जिनके साथ वैसे दिव्य शरीरसे क्रीड़ा की है।'<br><br>इस प्रकार शोक करते हुए राजाने रात्रिके

* भगवान् शंकरका वह जटा-जूट आपलोगोंको विजय देनेवाला हो, जिसके एक भागमें आज भी श्रीगंगाजी उसके पके होनेका भ्रम उत्पन्न करती है।