संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1093, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
समय अपने नगरमें प्रवेश किया तथा राजद्वारपर ठहरकर मन्त्रियोंसहित पुत्रको बुलाकर शापसम्बन्धी सब बातें बतायीं। दूर खड़े हुए राजाका यह वचन सुनकर वे मन्त्री और पुत्र भी शोकमग्न हो रोने लगे। तब राजाने मन्त्रियोंसे कहा—'यदि मेरे प्रति तुम्हारे हृदयमें अविचल भक्तिभाव हो तो अब मेरे पुत्रका मन्त्रित्व स्वीकार करो। मेरा ज्येष्ठ पुत्र हरिश्चन्द्र मुझे बहुत ही प्रिय है, अतः शान्तचित्त होकर इसीको मेरे स्थानपर यथासम्भव शीघ्र राजा बनाओ। मैं तो अब अपने संकल्पको पूरा करूँगा। या तो इसी प्रयत्नमें प्राण दे दूँगा या सदेह स्वर्गलोकमें जाऊँगा।' ऐसा कहकर त्रिशंकु वनमें चले गये और मन्त्रियोंने उनके पुत्रको राजसिंहासनपर बिठा दिया।
सूतजी कहते हैं—तदनन्तर त्रिशंकुने यह निश्चय किया कि इस समय त्रिलोकीमें विश्वामित्र मुनिको छोड़कर दूसरा कोई ऐसा नहीं है जो मुझे इस भयंकर दुःखसे बचावे। ऐसा विचारकर उन्होंने कुरुक्षेत्रको प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर वे विश्वामित्रका आश्रम ढूँढ़ने लगे। इतनेमें ही दूरसे उन्हें काले धूएँका पुंज दिखायी दिया और जलका स्पर्श करके आती हुई शीतल वायुने उनकी सारी थकावट दूर कर दी। इससे जलाशय और आश्रमका अनुमान करके वे जल्दी-जल्दी चलने लगे। थोड़ी ही देरमें नदीके तटपर एक मनोहर आश्रम दृष्टिगोचर हुआ, जो सब ओरसे फूले-फले वृक्षोंद्वारा घिरा था। वहाँ नेवले सर्पोंके, उल्लू कौवोंके, बिलाव चूहोंके और व्याघ्र नाना प्रकारके मृगोंके साथ खेल रहे थे। उस आश्रमपर पहुँचकर त्रिशंकुने तपस्याके निधान विश्वामित्र मुनिको देखा। उनका दर्शन करके दूर खड़े हो अपने नामका परिचय देते हुए उन्होंने मुनिको साष्टांग प्रणाम किया और कहा—'विप्रवर! मैं शापसे छूटनेके लिये सम्पूर्ण जगत्के मित्र महर्षि विश्वामित्रकी शरणमें आया हूँ।'
विश्वामित्रजी बोले—नृपश्रेष्ठ! तुम तो वसिष्ठजीके यजमान हो, वसिष्ठ अथवा उनके पुत्रोंको ही तुम्हारा यज्ञ कराना चाहिये; फिर उन्होंने तुम्हें शाप क्यों दिया ? तुमने उनका क्या अपराध किया था?
त्रिशंकुने कहा—मुने! मैंने वसिष्ठजीसे ऐसा यज्ञ करानेके लिये प्रार्थना की थी, जिसके द्वारा मेरा इसी शरीरसे स्वर्गलोकमें जाना हो सके। मेरी प्रार्थना सुनकर उन्होंने उत्तर दिया—'राजन्! ऐसा कोई यज्ञ नहीं है, जिससे देहान्तर ग्रहण किये बिना इसी शरीरसे स्वर्गलोकमें जाया जा सके।' इसपर मैंने उनसे कहा—'यदि आप किसी उत्तम यज्ञके प्रभावसे मुझे इस शरीरके साथ ही स्वर्गलोकमें नहीं पहुँचायेंगे तो मैं आज ही अपने इस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये किसी दूसरे ब्राह्मणको अपना पुरोहित बनाऊँगा।' मेरा यह विचार जानकर वे बोले—'जिससे तुम्हारा भला हो, वह करो।' तब मैंने उनके पुत्रोंके पास जाकर वसिष्ठजीके साथ की हुई सारी बातें कह सुनायीं। इसपर उन सबने मुझे शाप देकर चाण्डालकी दशामें पहुँचा दिया। मुनीश्वर! तब मैंने मन-ही-मन आपका स्मरण किया और बहुत दूरसे बड़ी भारी आशा लगाकर आपके पास यहाँ कुरुक्षेत्रमें आया हूँ। मुने! आपके लिये त्रिलोकीमें कुछ भी असाध्य नहीं है। अतः आप मुझ दुखियाके दुःख-निवारणका कोई उपाय करें।'
त्रिशंकुकी यह बात सुनकर विश्वामित्रजीने कहा—राजन्! मैं तुमसे वैसा यज्ञ कराऊँगा जिससे क्षणभरमें तुम स्वर्गलोकमें चले जाओगे। आओ, मेरे साथ तीर्थयात्राके लिये चलो, जिससे चाण्डालतासे मुक्त होकर यज्ञ करनेके योग्य हो जाओ। यों कहकर विश्वामित्रजी त्रिशंकुको अपने पीछे-पीछे आनेका आदेश दे तीर्थयात्राके लिये चल दिये। उन महात्माके साथ तीर्थोंमें विचरते हुए त्रिशंकुका बहुत समय बीत गया, किंतु वे पाप और चाण्डालत्वसे छुटकारा न पा सके। क्रमशः यात्रा करते हुए वे दोनों अर्बुदाचल (आबू)-