संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1094, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १०६५ ---|---
के समीप आये। उस पर्वतपर चढ़कर उन्होंने पापनाशक अचलेश्वरका दर्शन किया। मन्दिरसे निकलनेपर वहीं मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेयजीसे भेंट हो गयी। विश्वामित्रजीको देखकर मार्कण्डेयजीने पूछा—'मुनीश्वर! इस समय आप कहाँसे आ रहे हैं और आपके पीछे यह कौन दिखायी देता है?'
विश्वामित्रजी बोले—मुने! ये राजाओंमें श्रेष्ठ त्रिशंकु हैं। वसिष्ठके पुत्रोंने क्रोध करके इन्हें चाण्डालकी दशाको पहुँचा दिया है। मैंने इनसे प्रतिज्ञा की है कि जबतक तुम पवित्र नहीं हो जाओगे तबतक मैं तुम्हारे साथ सब तीर्थोंमें भ्रमण करूँगा। मैंने पृथ्वीके सभी तीर्थों और मन्दिरोंमें भ्रमण कर लिया। परंतु ये अभीतक पवित्र न हो सके। अतः अब मैं इस पृथ्वीको त्यागकर कहीं अन्यत्र चला जाऊँगा।
मार्कण्डेयजीने कहा—मुने! यदि ऐसा है तो आप इस पृथ्वीको त्यागकर कहीं न जाइये। इस पर्वतसे नैर्ऋत्यकोणमें आनर्त देशके भीतर एक स्थान है, जहाँ श्रेष्ठ देवताओंने पहले सुवर्णमय शिवलिंगकी स्थापना की थी। पातालमें जो हाटकेश्वर लिंग प्रसिद्ध है उसीके नामपर इस शिवलिंगको भी लोकमें हाटकेश्वर कहते हैं। द्विज श्रेष्ठ! वहीं पातालगंगाका जल है जो रसातलसे प्रकट हुआ है। उसीके द्वारा यत्नपूर्वक पातालमें प्रवेश करके श्रद्धापूर्वक आपलोग पातालगंगाके जलमें स्नान करें। तत्पश्चात् ये त्रिशंकु हाटकेश्वरका दर्शन करके चाण्डालत्वसे मुक्त एवं शुद्ध हो जायँगे। | मार्कण्डेयजीका यह वचन सुनकर विश्वामित्र मुनि त्रिशंकुको साथ लेकर वहाँ गये और पातालमें प्रवेश करके राजाको पातालगंगाके जलमें नहलाया। स्नानके पश्चात् हाटकेश्वरका दर्शन करके वे चाण्डालत्वसे मुक्त होकर सूर्यके समान तेजस्वी हो गये। निष्पाप होकर त्रिशंकुने मुनिवर विश्वामित्रको प्रणाम किया। मुनि बोले—'राजेन्द्र! सौभाग्यकी बात है, जो तुम इस समय चाण्डालत्वसे छुटकारा पा गये। मित्र! तुम्हारे लिये मैं स्वयं ब्रह्माजीके पास जाकर प्रार्थना करूँगा कि वे तुम्हारे यज्ञमें यज्ञभाग ग्रहण करें। अतः जबतक मैं ब्रह्मलोकसे आता हूँ, तबतक तुम यज्ञके सब सामान यहीं मँगाओ।' राजाने 'बहुत अच्छा' कहकर मुनिकी आज्ञा स्वीकार की। तब वे ब्रह्माजीके समीप जा उन्हें प्रणाम करके बोले—'प्रपितामह! मैं राजा त्रिशंकुके द्वारा इस संकल्पसे यज्ञ कराऊँगा कि वे मनुष्य-शरीरसे ही आपके लोकमें जा सकें। अतः आप शिव, विष्णु आदि सब देवताओंके साथ यज्ञमण्डपमें पधारें।'
ब्रह्माजीने कहा—ब्रह्मन्! देहान्तर ग्रहण किये बिना केवल यज्ञकर्मसे स्वर्गकी प्राप्ति नहीं हो सकती। हम सब देवताओंके मुख अग्नि हैं। वेदोक्त विधिसे भलीभाँति आहुति देनेपर हम सब लोग यज्ञमें अपना भाग ग्रहण करेंगे। अतः राजा अग्निमुखमें ही आहुति दें। फिर उस यज्ञके प्रसादसे देहत्यागके पश्चात् वे अवश्य स्वर्ग प्राप्त करेंगे।
~~ o ~~
विश्वामित्रजीके द्वारा त्रिशंकुका यज्ञ पूरा करके नूतन सृष्टि-रचनाका उद्योग, त्रिशंकुका ब्रह्माजीके साथ स्वर्गगमन
सूतजी कहते हैं—ब्रह्माजीका वचन सुनकर विश्वामित्रजी बोले—'अच्छा तो आप मेरी तपस्याका बल देखिये। मैं त्रिशंकुसे विधिवत् दक्षिणायुक्त यज्ञ कराकर उसीके द्वारा उन्हें यहाँ ले आऊँगा।' ऐसा कहकर विश्वामित्रजी पृथ्वीपर | लौट गये और महात्मा त्रिशंकुके यज्ञको सम्पन्न करनेकी चेष्टामें संलग्न हो गये। यज्ञ-प्रारम्भके लिये योग्य शुभ समय आनेपर उसी श्रेष्ठ वनमें उन्होंने वेदोंके पारंगत ब्राह्मणोंको बुलाकर राजाको यज्ञकी दीक्षा दी। उस यज्ञमें वे स्वयं ही अध्वर्यु