भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1095, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1095

१०६६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

(यजुर्वेदपाठी) हुए। शाण्डिल्य मुनि होता (ऋग्वेदी)-के पदपर प्रतिष्ठित हुए, महर्षि गौतमको ब्रह्माका पद प्राप्त हुआ, मित्रावरुण कर्ममें महर्षि च्यवन आग्नीध्र बनाये गये। याज्ञवल्क्य उद्गाता (सामवेदी), जैमिनि प्रतिहर्ता, शंकुकर्ण प्रस्तोता, गालव उन्नेता, पुलस्त्यजी उच्छंसी तथा मुनीश्वर गर्ग होता हुए। अत्रि नेष्टा तथा भृगुजी अच्छावाक बनाये गये। श्रद्धालु त्रिशंकुने इन सबको ऋत्विज बनाया और स्वयं बाल कटवाकर मृगचर्म धारण किया। हाथमें हरिणका सींग लिया और दूध पीकर रहने लगे। उपर्युक्त सब महर्षियोंको वरण करके उन्हें यज्ञकर्ममें लगाया। इस प्रकार दीर्घकालतक चालू रहनेवाले उस यज्ञके आरम्भ होनेपर सब दिशाओंसे वेद-वेदांगोंके पारगामी ब्राह्मण वहाँ आने लगे। बहुत-से दीन, अन्ध, कृपण (कंगाल) गृहस्थ आये। वहाँ सब ओर अन्नमय पर्वत खड़े किये गये थे और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान देनेके लिये अनेक प्रकारकी असंख्य वस्तुएँ संग्रह की गयी थीं। देवता अग्निमुखसे राजाके हविष्यको ग्रहण करते रहे। इस प्रकार यज्ञ करते हुए राजाके बारह वर्ष व्यतीत हो गये, किंतु उन्हें अभीष्ट फलकी प्राप्ति नहीं हुई। तत्पश्चात् उन्होंने यज्ञान्त-स्नान किया तथा ऋत्विजोंको यथायोग्य दक्षिणाएँ देकर तृप्त किया। ब्राह्मणोंको विदा करनेके पश्चात् राजा त्रिशंकुने वहाँ आये हुए अन्य सम्बन्धियों और मित्रोंको भी विदा किया। तदनन्तर वे विश्वामित्रजीसे बोले—'ब्रह्मन्! आपके प्रसादसे मुझे दुर्लभ फलकी प्राप्ति हुई। चाण्डालता भी नष्ट हो गयी, परंतु इसी शरीरसे स्वर्गलोक नहीं मिला। केवल यही एक दुःख मेरे हृदयमें काँटेकी तरह चुभ रहा है। मुने! अब वसिष्ठके पुत्र यह सब बात सुनकर मेरा उपहास करेंगे। अतः अब मैं वनमें रहकर तपस्या करूँगा। राज्य नहीं करूँगा।'

त्रिशंकुकी यह बात सुनकर विश्वामित्रजी बोले—राजन्! खेद न करो, मैं तुम्हें इसी शरीरसे स्वर्गलोकमें भेजूँगा। इतना कहकर विश्वामित्रने चन्द्रशेखर भगवान् शंकरका दर्शन किया और इस प्रकार उनकी स्तुति की—

विश्वामित्रजी बोले—अचिन्त्य महादेव! आपकी जय हो। पार्वतीवल्लभ! आपकी जय हो। कृष्ण! जगन्नाथ! कृष्ण! जगद्गुरो! आपकी जय हो। अचिन्त्य! अमेय! अनन्त! अच्युत! आपकी जय हो। अमर! अजेय! अव्यय! सुरेश्वर! आपकी जय हो। सर्वव्यापक! सर्वेश्वर! सर्वदेवाश्रय! सबके ध्यान करनेयोग्य शिव! आपकी जय हो। सर्वपापनाशन! आप ही धाता, विधाता, कर्ता और रक्षक हैं। देवेश! चार प्रकारके प्राणियोंका कल्याण करनेवाले भी आप ही हैं। जैसे तिलमें तेल और दहीमें घी व्याप्त रहता है, उसी प्रकार समस्त संसार आपसे व्याप्त है। आप ही ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और अग्नि हैं। आप ही वषट्कार, यज्ञ तथा सूर्य हैं। अथवा बहुत कहने या स्तुति करनेकी क्या आवश्यकता है, प्रभो! मैं आपकी वेदवर्णित विभूतिको बहुत संक्षेपमें बतला रहा हूँ। भगवन्! तीनों लोकोंमें चर और अचर जो कुछ दिखायी देता है, सबमें आप व्याप्त हैं। ठीक उसी तरह, जैसे काष्ठमें अग्नि व्याप्त रहती है।

श्रीभगवान् बोले—मुने! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।

विश्वामित्रजीने कहा—महेश्वर! आपकी कृपासे मुझमें संसारकी सृष्टि करनेका सामर्थ्य हो जाय।

'एवमस्तु' कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये और विश्वामित्रजी वहीं स्थित हो ध्यानपूर्वक चार प्रकारकी सृष्टि रचने लगे। इस प्रकार जलमें प्रवेश करके सृष्टिचिन्तन करनेवाले विश्वामित्रने जिन-जिन वस्तुओंकी सृष्टि की, वे सब आज भी दृष्टिगोचर होती हैं। उन्होंने समस्त देवगण, नक्षत्र, ग्रह, मनुष्य, नाग, राक्षस, वृक्षयुक्त लता, सप्तर्षि और ध्रुव आदि सबकी रचना की तथा उन सबको अपने-अपने कर्तव्यकर्मोंमें नियुक्त किया। तब आकाशमें एक ही साथ दो सूर्य और दो चन्द्रमा उदित हुए तथा अन्यान्य ग्रह भी दुगुने उत्पन्न हो गये। सप्तर्षियोंसहित सम्पूर्ण नक्षत्र भी