भारतकोश
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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

१०६६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

(यजुर्वेदपाठी) हुए। शाण्डिल्य मुनि होता (ऋग्वेदी)-के पदपर प्रतिष्ठित हुए, महर्षि गौतमको ब्रह्माका पद प्राप्त हुआ, मित्रावरुण कर्ममें महर्षि च्यवन आग्नीध्र बनाये गये। याज्ञवल्क्य उद्गाता (सामवेदी), जैमिनि प्रतिहर्ता, शंकुकर्ण प्रस्तोता, गालव उन्नेता, पुलस्त्यजी उच्छंसी तथा मुनीश्वर गर्ग होता हुए। अत्रि नेष्टा तथा भृगुजी अच्छावाक बनाये गये। श्रद्धालु त्रिशंकुने इन सबको ऋत्विज बनाया और स्वयं बाल कटवाकर मृगचर्म धारण किया। हाथमें हरिणका सींग लिया और दूध पीकर रहने लगे। उपर्युक्त सब महर्षियोंको वरण करके उन्हें यज्ञकर्ममें लगाया। इस प्रकार दीर्घकालतक चालू रहनेवाले उस यज्ञके आरम्भ होनेपर सब दिशाओंसे वेद-वेदांगोंके पारगामी ब्राह्मण वहाँ आने लगे। बहुत-से दीन, अन्ध, कृपण (कंगाल) गृहस्थ आये। वहाँ सब ओर अन्नमय पर्वत खड़े किये गये थे और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान देनेके लिये अनेक प्रकारकी असंख्य वस्तुएँ संग्रह की गयी थीं। देवता अग्निमुखसे राजाके हविष्यको ग्रहण करते रहे। इस प्रकार यज्ञ करते हुए राजाके बारह वर्ष व्यतीत हो गये, किंतु उन्हें अभीष्ट फलकी प्राप्ति नहीं हुई। तत्पश्चात् उन्होंने यज्ञान्त-स्नान किया तथा ऋत्विजोंको यथायोग्य दक्षिणाएँ देकर तृप्त किया। ब्राह्मणोंको विदा करनेके पश्चात् राजा त्रिशंकुने वहाँ आये हुए अन्य सम्बन्धियों और मित्रोंको भी विदा किया। तदनन्तर वे विश्वामित्रजीसे बोले—'ब्रह्मन्! आपके प्रसादसे मुझे दुर्लभ फलकी प्राप्ति हुई। चाण्डालता भी नष्ट हो गयी, परंतु इसी शरीरसे स्वर्गलोक नहीं मिला। केवल यही एक दुःख मेरे हृदयमें काँटेकी तरह चुभ रहा है। मुने! अब वसिष्ठके पुत्र यह सब बात सुनकर मेरा उपहास करेंगे। अतः अब मैं वनमें रहकर तपस्या करूँगा। राज्य नहीं करूँगा।'

त्रिशंकुकी यह बात सुनकर विश्वामित्रजी बोले—राजन्! खेद न करो, मैं तुम्हें इसी शरीरसे स्वर्गलोकमें भेजूँगा। इतना कहकर विश्वामित्रने चन्द्रशेखर भगवान् शंकरका दर्शन किया और इस प्रकार उनकी स्तुति की—

विश्वामित्रजी बोले—अचिन्त्य महादेव! आपकी जय हो। पार्वतीवल्लभ! आपकी जय हो। कृष्ण! जगन्नाथ! कृष्ण! जगद्गुरो! आपकी जय हो। अचिन्त्य! अमेय! अनन्त! अच्युत! आपकी जय हो। अमर! अजेय! अव्यय! सुरेश्वर! आपकी जय हो। सर्वव्यापक! सर्वेश्वर! सर्वदेवाश्रय! सबके ध्यान करनेयोग्य शिव! आपकी जय हो। सर्वपापनाशन! आप ही धाता, विधाता, कर्ता और रक्षक हैं। देवेश! चार प्रकारके प्राणियोंका कल्याण करनेवाले भी आप ही हैं। जैसे तिलमें तेल और दहीमें घी व्याप्त रहता है, उसी प्रकार समस्त संसार आपसे व्याप्त है। आप ही ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और अग्नि हैं। आप ही वषट्कार, यज्ञ तथा सूर्य हैं। अथवा बहुत कहने या स्तुति करनेकी क्या आवश्यकता है, प्रभो! मैं आपकी वेदवर्णित विभूतिको बहुत संक्षेपमें बतला रहा हूँ। भगवन्! तीनों लोकोंमें चर और अचर जो कुछ दिखायी देता है, सबमें आप व्याप्त हैं। ठीक उसी तरह, जैसे काष्ठमें अग्नि व्याप्त रहती है।

श्रीभगवान् बोले—मुने! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।

विश्वामित्रजीने कहा—महेश्वर! आपकी कृपासे मुझमें संसारकी सृष्टि करनेका सामर्थ्य हो जाय।

'एवमस्तु' कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये और विश्वामित्रजी वहीं स्थित हो ध्यानपूर्वक चार प्रकारकी सृष्टि रचने लगे। इस प्रकार जलमें प्रवेश करके सृष्टिचिन्तन करनेवाले विश्वामित्रने जिन-जिन वस्तुओंकी सृष्टि की, वे सब आज भी दृष्टिगोचर होती हैं। उन्होंने समस्त देवगण, नक्षत्र, ग्रह, मनुष्य, नाग, राक्षस, वृक्षयुक्त लता, सप्तर्षि और ध्रुव आदि सबकी रचना की तथा उन सबको अपने-अपने कर्तव्यकर्मोंमें नियुक्त किया। तब आकाशमें एक ही साथ दो सूर्य और दो चन्द्रमा उदित हुए तथा अन्यान्य ग्रह भी दुगुने उत्पन्न हो गये। सप्तर्षियोंसहित सम्पूर्ण नक्षत्र भी

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०६७


दुगुने भासित होने लगे। इस प्रकार आकाशमें सभी ग्रह, नक्षत्र द्विगुण हो एक-दूसरेसे स्पर्धा रखकर लोगोंके मनमें भ्रम उत्पन्न करने लगे। यह देख इन्द्र सब देवताओंके साथ ब्रह्माजीके पास गये और प्रणाम करके बोले—‘सुरश्रेष्ठ! इस समय विश्वामित्रजीने सृष्टिरचना प्रारम्भ की है। अतः जबतक उनकी सृष्टिसे यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त न हो जाय, तबतक ही आप स्वयं जाकर उन्हें रोकिये।’ तब ब्रह्माजी मुनिवर विश्वामित्रके पास गये और इस प्रकार बोले—‘ब्रह्मर्षे! तुम मेरे कहनेसे सृष्टि-रचनाका कार्य बंद करो।’

विश्वामित्रजी बोले—यदि नृपश्रेष्ठ त्रिशंकु इसी शरीरसे आपके लोकमें चले जायें, तो मैं नयी सृष्टि नहीं करूँगा।

ब्रह्माजीने कहा—मुनीश्वर! मुझे स्वीकार है, ये राजा त्रिशंकु इसी शरीरसे मेरे साथ स्वर्गलोकमें चलें। तुम सृष्टिरचनासे मुक्त हो जाओ।

ऐसा कहकर ब्रह्माजी त्रिशंकुको साथ लेकर चले गये और महर्षि विश्वामित्र हर्षमें भरकर वहीं टिके रहे।

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नागबिलका महत्त्व, इन्द्रकी ब्रह्महत्यासे मुक्ति, रक्तशृंग-पर्वतके द्वारा नागबिलका भरा जाना और मृगीके शापसे राजा चमत्कारका कोढ़ी होना

सूतजी कहते हैं—तबसे लेकर स्थान तीनों लोकोंमें उत्तम तीर्थके रूपमें विख्यात हुआ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पदार्थोंके देनेवाला है। जो मनुष्य श्रद्धायुक्त चित्तसे वहाँ रहकर मृत्युको प्राप्त होता है, वह पापाचारी हो तो भी मोक्षको प्राप्त होता है। कीट, पक्षी, पतंग, पशु और मृग आदि जितने जन्तु हैं, वे भी वहाँ मरनेपर निश्चय ही भगवान् शिवके लोकमें जाते हैं। जो श्रद्धासे पवित्र किये हुए मनके द्वारा वहाँ स्नान करते हैं वे स्वर्गलोकमें जाते हैं। तदनन्तर विश्वामित्र मुनिने उस तीर्थका उत्तम माहात्म्य देखकर कुरुक्षेत्र छोड़कर वहीं निवास किया तथा अन्यान्य शान्त स्वभाववाले मुनि भी दूसरे तीर्थोंको त्यागकर बहुत दूर-दूरसे वहाँ आ गये और वहीं आश्रम बनाकर रहने लगे। इस प्रकार उस तीर्थके प्रभावसे सब मनुष्य स्वर्गको जाने लगे। तब कोई भी न यज्ञ करता था, न व्रत; न दान देता और न दूसरे किसी तीर्थका सेवन ही करता था। केवल उसी तीर्थमें एकाग्रचित्त होकर लोग स्नान करते और उत्तम विमानपर चढ़कर स्वर्गलोकमें चले जाते थे। उस समय स्वर्गलोक मनुष्योंसे भर गया। श्रेष्ठ देवताओंसे स्पर्धा करनेवाले मनुष्योंद्वारा स्वर्गको भरपूर हुआ देख संवर्तक वायुने इन्द्रकी आज्ञा पाकर पृथ्वीतलपर स्थित उस हाटकेश्वर-क्षेत्रको चारों ओरसे धूलसे आच्छादित कर दिया। इस प्रकार वह तीर्थभूमि केवल स्थलमात्र रह गयी। उसके बाद सर्वत्र यज्ञादि सत्कर्म होने लगे।

तदनन्तर पातालसे नागलोग बिलके मार्गसे मर्त्यलोकमें आते, पृथ्वीपर सब ओर घूमते और यहाँके भोगोंका इच्छानुसार उपभोग करके फिर उसी मार्गसे अपने निवासस्थानको लौट जाते थे। इससे वह स्थान इस पृथ्वीपर नागबिलके नामसे विख्यात हुआ।

एक समय वज्रके द्वारा वृत्रासुरका वध करनेसे इन्द्रको ब्रह्महत्या लग गयी थी, तब उनको इसका बड़ा दुःख हुआ। इस प्रकार दुःखको प्राप्त हुए इन्द्र एक पर्वतपर चढ़कर मृत्युका निश्चय करके वहाँसे अपने शरीरको नीचे गिराना ही चाहते थे कि आकाशवाणी सुनायी दी—‘इन्द्र! ऐसा दुःसाहस न करो, इस पातकसे शुद्ध होनेके लिये सावधान होकर उपाय सुनो। हाटकेश्वरक्षेत्रमें, जहाँ भगवान् शिव स्वयं विराजमान हैं, जाओ

१०६८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


और वहाँ जिस बिलके मार्गसे नागलोग इस पृथ्वीपर आते-जाते हैं उसी मार्गसे तुम भी पातालमें प्रवेश करो और वहाँ पातालगंगामें स्नान करके हाटकेश्वर महादेवकी पूजा करो। इससे तुम अवश्य ही पापसे मुक्त हो जाओगे।'

यह आकाशवाणी सुनकर इन्द्र शीघ्र ही उस क्षेत्रमें गये और नागबिलके मार्गसे पातालमें प्रवेश करके वहाँकी गंगामें स्नान किया। स्नानके पश्चात् हाटकेश्वर लिंगका पूजन किया। इससे क्षणमात्रमें उनका शरीर निर्मल हो गया और तेज बढ़ गया। इसी समय ब्रह्मा-विष्णु आदि सब देवता वहाँ आये और अत्यन्त प्रसन्न हो पापमुक्त इन्द्रसे इस प्रकार बोले—'देवराज! तुम ब्रह्महत्यासे मुक्त होकर परम पवित्र हो गये हो। अतः आओ, हम साथ ही स्वर्गलोकको चलें।' तदनन्तर सब देवता स्वर्गलोकको चले गये। इन्द्रको पुनः देवताओंका राज्य प्राप्त हुआ और स्वर्गमें वृत्रासुरके मारे जानेसे बड़ा भारी उत्सव मनाया गया।

जो कोई मनुष्य एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक इस प्रसंगका कीर्तन और श्रवण करता है वह जरा-मृत्युसे रहित परमधामको प्राप्त होता है।

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर देवगुरु बृहस्पतिजीने इन्द्रसे कहा—'देवराज! पृथ्वीपर हिमालय नामसे विख्यात एक पर्वत है। उसके तीन पुत्र हैं—मैनाक, नन्दिवर्धन और रक्तशृंग। उनमेंसे तीसरे पुत्र रक्तशृंगको ले आओ और उसीके द्वारा नागलोकके इस बिलको भर दो।'

बृहस्पतिजीका यह वचन सुनकर इन्द्र हिमालय पर्वतपर गये। वहाँ उन्होंने हिमाचलसे उनके पुत्रको माँगा। हिमाचलने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और पुत्रको उनके साथ जानेकी आज्ञा दे दी। तब रक्तशृंग बोला—'पिताजी! मेरे दोनों पंख इन्हीं इन्द्रने काट डाले हैं। अतः अब मुझमें यहाँसे जानेकी शक्ति नहीं है। ये मुझे ले जानेका विचार छोड़कर कोई दूसरा उपाय सोचें।'

इन्द्र बोले—रक्तशृंग! मैं तुम्हें अपने हाथपर रखकर ले चलूँगा। वहाँ भी तुम्हारे ऊपर हरे-भरे शोभासम्पन्न वृक्ष उत्पन्न होंगे। तुम्हारे सब ओर पुण्यतीर्थ एवं देवमन्दिर बनेंगे। मुनियोंके आश्रम बनेंगे। उस भूमिमें पापी पुरुष भी तुम्हारा दर्शन पाकर तृप्त हो जायेंगे। इसलिये तुम मेरे साथ शीघ्र चले चलो। यदि आनाकानी करोगे तो इस वज्रसे तुम्हारे सैकड़ों टुकड़े कर दूँगा।

इन्द्रकी यह बात सुनकर रक्तशृंग डर गया और सहसा वहाँ जाकर उस नागबिलमें घुस गया। इस प्रकार हिमवान्कुमार रक्तशृंगको उस बिलपर बिठाकर इन्द्रने कहा—'तुम मुझसे कोई वर ग्रहण करो।'

पर्वत बोला—देवेश! मेरे लिये यही वरदान है कि मुझपर आप सन्तुष्ट हैं। मैं आपके प्रसादसे सुखी हूँ।

इन्द्र बोले—स्वप्नावस्थामें भी मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं जाता, फिर साक्षात् दर्शन होनेपर कैसे निरर्थक होगा।

रक्तशृंगने कहा—देवराज! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं तो यही वर दें कि मेरा सम्पूर्ण ऐश्वर्य सदा ब्राह्मणोंके ही काम आये।

इन्द्र बोले—चमत्कार नामसे विख्यात एक राजा होंगे, जो तुम्हारे शिखरपर ब्राह्मणोंके रहनेके लिये एक नगर स्थापित करेंगे। उस नगरमें वेद-वेदांगोंके पारगामी विद्वान् (नागर) ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक रहकर तुम्हारे सम्पूर्ण ऐश्वर्यका उपभोग करेंगे तथा चैत्र कृष्णा चतुर्दशीको मैं स्वयं तुम्हारे शिखरपर आकर हाटकेश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिवकी पूजा करूँगा। इससे त्रिलोकमें तुम्हारे प्रभावका विस्तार होगा। अच्छा, अब मैं स्वर्गको जाऊँगा। तुम्हारा कल्याण हो।

ऐसा कहकर देवराज इन्द्र स्वर्गमें चले आये तथा रक्तशृंग उस नागबिलको ढककर स्थित हुआ। उसके शिखरपर मुख्य-मुख्य तीर्थ और मन्दिर स्थापित हो गये और मुनियोंके भी बहुत-से आश्रम बन गये।

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०६९

इसी समय आनर्तदेशके राजा चमत्कार वहाँ वनमें दुष्ट मृगोंका शिकार खेलनेके लिये आये। उन्होंने देखा, कुछ दूरपर एक वृक्षके नीचे एक मृगी स्थिर होकर खड़ी है और निर्भय होकर अपने बच्चेको दूध पिला रही है। उसे देखकर राजाने कानतक धनुषको खींचा और उसके मर्मस्थानपर बाणका प्रहार किया। उस बाणसे घायल होकर वह मृगी व्यथासे पीड़ित हो चारों ओर देखने लगी। इतनेमें ही थोड़ी दूरपर धनुष धारण किये राजाको देखकर उसने कहा—‘राजन्! यह तुमने बड़ा अनुचित कार्य किया, जो कि छोटे बच्चेकी माता मुझ दीन हरिणीका वध किया। मैं अपनी मृत्युके लिये उतना शोक नहीं करती, जैसा कि इस दूध पीते दीन मृगछौनेके लिये मुझे दुःख हो रहा है। तुमने बड़ा निर्दय कर्म किया है, इसलिये तुम इसी समय कोढ़ी हो जाओ।’

राजा बोले—शिकार खेलना तो राजाओंका धर्म है, अतः अपने धर्ममें तत्पर हुए मुझ निर्दोषको तुझे शाप नहीं देना चाहिये।

मृगी बोली—भूपाल! तुम्हारा कहना ठीक है, परंतु शिकारमें भी क्षत्रियोंके लिये यह विधान है कि जो सोया हो, मैथुनमें आसक्त हो, बच्चेको दूध पिला रहा हो या स्वयं जल पीता हो—ऐसे हिंसक पशुका वध न करे उसका वध करनेपर मनुष्य पापसे लिप्त होता है। इसीलिये मैंने तुझे शाप दिया है।

ऐसा कहकर व्यथासे पीड़ित हुई मृगीने अपने प्राणोंको त्याग दिया और राजा चमत्कार भी कोढ़ी हो गये। अपने शरीरको कोढ़युक्त देखकर दुःखी हुए राजाने सेवकोंको बुलाकर कहा—‘अब मैं तबतक तपस्या और भगवान् शिवकी पूजा करूँगा जबतक कि मेरे इस कुष्ठरोगका सर्वथा नाश न हो जाय।’ ऐसा कहकर उन्होंने अपने सभी सेवकोंको विदा कर दिया।

~~ ० ~~

शंखतीर्थकी उत्पत्ति, उसमें स्नानसे राजा चमत्कारके कुष्ठरोगकी निवृत्ति और राजाका ब्राह्मणोंके लिये श्रेष्ठ नगर निर्माण कराकर दान देना

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर राजा चमत्कार तपस्यामें तत्पर हो भिक्षान्नका नियमित आहार करते हुए प्रभास आदि सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें भ्रमण करने लगे, परंतु उन्हें कहीं कोई ऐसा मन्त्र, ओषधि या तीर्थ नहीं प्राप्त हुआ जिससे उनके रोगका भलीभाँति निवारण हो जाय। इससे राजाके मनमें बड़ा वैराग्य हुआ और वे अपने मन और बुद्धिको वशमें करके उस पुण्यक्षेत्रमें अकेले रहने लगे। वे अपने-आप गिरे हुए सूखे पत्ते चबाते और रातमें भूमिपर सोते थे। मद और अहंकार तो उन्हें छू भी नहीं गये थे। तदनन्तर कुछ कालके बाद उन्होंने तीर्थयात्राके लिये जानेवाले बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको देखा और उन सबको विनीत भावसे प्रणाम करके कहा—‘विप्रवरो! मैं आनर्तदेशका सूर्यवंशी राजा हूँ। मेरा नाम चमत्कार है। इस समय मेरे सारे शरीरमें कोढ़ फैल गयी है। क्या यहाँ ऐसा कोई दैव या मानवी उपाय है जिससे मेरा कुष्ठरोग शान्त हो जाय? यदि है तो आपलोग मुझपर कृपा करके बतावें।’

तब उन दयालु ब्राह्मणोंने कहा—नृपश्रेष्ठ! यहाँसे थोड़ी ही दूरपर सुप्रसिद्ध शंखतीर्थ है, जो सब रोगोंका नाश करनेवाला है। जो मनुष्य रोगग्रस्त, काने, अन्धे, मूर्ख, किसी अंगसे हीन या अधिक अंगवाले कुरूप और विकृत मुखवाले हैं, वे भी चैत्रमासके कृष्णपक्षकी* आदितिथि (चैत्रपूर्णिमा)—को चित्रा नक्षत्रके योगमें वहाँ स्नान करके उपवास


* यहाँ शुक्लपक्षसे मासका आरम्भ और अमावास्याको मासकी समाप्ति समझनी चाहिये। अतः जहाँ कृष्ण पक्षसे मासका आरम्भ माना जाता है, उनकी दृष्टिसे यह चैत्रका कृष्णपक्ष वास्तवमें वैशाखका कृष्णपक्ष है।

१०७०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करनेपर उसी क्षण रोगसे रहित हो जाते हैं।

राजाने पूछा— विप्रवरो! शंखतीर्थका ज्ञान मुझे जैसे हो और उसकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई है। यह सब आपलोग विस्तारपूर्वक बतावें।

ब्राह्मण बोले— राजन्! पूर्वकालमें इस पृथ्वीपर लिखित नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ मुनि रहते थे। वे शिण्डिलमुनिके पुत्र थे। उनके छोटे भाईका नाम शंख था। शंख भी अपने बड़े भाईकी भाँति धर्मशास्त्रके ज्ञाता थे और कन्द, मूल, फलका आहार करते हुए सदैव तपस्यामें संलग्न रहते थे। एक दिन शंख भूखसे अत्यन्त पीड़ित होकर लिखितके आश्रमपर गये। महात्मा लिखितका आश्रम सूना था तो भी 'ये फल अपने ही हैं' ऐसा मानकर शंखने बहुत-से फल तोड़ लिये और उन्हें खा लिया। इसी समय लिखित अपने शिष्यके साथ वहाँ आये और शंखको फल लिये हुए देखकर क्रोधपूर्वक बोले—'तुमने मेरे दिये बिना ही ये फल कैसे ले लिये? क्या तुम यह नहीं समझते कि इस प्रकार बिना पूछे लेनेसे चोरीरूप दोषसे बँध जाना पड़ता है?'

शंख बोले— द्विजश्रेष्ठ! आपने जो कुछ कहा है, वह सत्य है। मैंने आपके सूने आश्रममें ये फल लिये हैं, अतः मेरे लिये चोरीका उचित दण्ड दीजिये जिससे मेरा इहलोक और परलोक दोनों सुखद हो।

तब लिखितने उसी क्षण अपने भाई शंखके दोनों हाथ कटवा दिये। हाथ कट जानेपर शंख अपने आश्रममें लौट आये। वहाँ उन्होंने पुनः बड़ी घोर तपस्या की। इससे सन्तुष्ट होकर महादेवजीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'ब्रह्मन्! तुम मनोवांछित वर माँगो।'

शंख बोले— देव! मेरे दोनों हाथ पुनः पूर्ववत् हो जायें और यह तीर्थ मेरे नामसे प्रसिद्ध हो। जो कोई अंगहीन, अधिकांग अथवा रोगग्रस्त यहाँ स्नान करे वह शीघ्र ही फिरसे नवीन हो जाय—नूतन निर्दोष शरीर प्राप्त कर ले।

भगवान् शिवने कहा— विप्रेन्द्र! आजसे यह तीर्थ तुम्हारे नामसे विख्यात होगा। चैत्रमासके शुक्लपक्षमें जब चन्द्रमा चित्रा नक्षत्रपर स्थित हों, उस समय जो कोई न्यूनांग या अधिकांग मनुष्य भी यहाँ स्नान करेगा, वह सुवर्णके समान गौर और सर्वांगसुन्दर हो जायगा। उस दिन वहाँ श्राद्ध करनेसे पितरलोग उत्तम तृप्तिको प्राप्त होंगे। विप्रवर! आज चैत्रमासका शुक्लपक्ष है। आज तीसरे पहर चन्द्रमाका चित्रा नक्षत्रसे योग हो जायगा। उस समय उपवासपूर्वक भलीभाँति स्नान करनेपर तुम्हारे दोनों हाथ तत्काल पूर्ववत् सुन्दररूपसे युक्त हो जायेंगे।

ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये और शंखमुनिने कुतप काल (दिनके तीसरे पहर)-में स्नान किया। स्नान करते ही उनके दोनों हाथ पूर्ववत् हो गये।

नृपश्रेष्ठ! इसलिये तुम भी चैत्र शुक्लपक्षमें, जब चन्द्रमा चित्रा नक्षत्रपर स्थित हों, उस तीर्थमें स्नान करो। इससे तुम सब रोगोंसे मुक्त हो जाओगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इस तीर्थके लिये जो समय और योग बताया गया है, उसके प्राप्त होनेपर हम साथ चलकर तुमको उस तीर्थका दर्शन करायेंगे।

सूतजी कहते हैं— तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद चैत्र शुक्लपक्ष आया और चित्रानक्षत्रमें चन्द्रमाके योगसे युक्त चतुर्दशी तिथि प्राप्त हुई तब वे राजाके हितैषी ब्राह्मण उन्हें साथ लेकर उसी समय शंखतीर्थमें गये। वहाँ राजाने अपने मनमें कुष्ठरोगके नाशका संकल्प लेकर बड़ी श्रद्धा-भक्तिसे विधिपूर्वक स्नान किया। स्नान करते ही वे कुष्ठरोगसे मुक्त एवं तेजस्वी हो गये और बड़े हर्षके साथ तीर्थके जलसे बाहर निकले, फिर उन ब्राह्मणोंको प्रणाम करके राजाने हाथ जोड़कर कहा—'विप्रवरो! आपलोगोंके प्रसादसे ही मैं इस कुष्ठरोगसे मुक्त हुआ हूँ। अब मैं राज्य नहीं करूँगा। इसी तीर्थमें रहकर सदा उत्तम तप करूँगा।

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०७१

यह राज्य, देश, हाथी, घोड़ा तथा और जो भी कुछ वैभव मेरे अधीन है, वह सब मुझपर अनुग्रह करनेके लिये ही कृपापूर्वक आपलोग ग्रहण करें।'

ब्राह्मण बोले—नृपश्रेष्ठ! हमलोग राज्यकी रक्षा करनेमें असमर्थ हैं। फिर उसे लेनेसे क्या लाभ हुआ, जिससे राज्यमें बड़ा भारी विप्लव मच जाय। पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुरामने इक्कीस बार इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे हीन करके हम ब्राह्मणोंको सौंप दिया था, परंतु बलवान् क्षत्रियोंने फिर समस्त ब्राह्मणोंका तिरस्कार करके अनायास ही बार-बार इसे छीन लिया था।

राजाने कहा—विप्रवरो! मैं तपस्यामें स्थित होकर भी आपलोगोंकी रक्षा करता रहूँगा, अतः इस कार्यमें आप लोगोंको किसी प्रकार भय नहीं मानना चाहिये।

ब्राह्मण बोले—यदि आपके मनमें हमें कुछ देनेकी दृढ़ श्रद्धा है, तो इस महापुण्यमय क्षेत्रमें एक श्रेष्ठ नगरका निर्माण कराके उसे दे दें। वह श्रेष्ठ नगर चहारदीवारी और खाईसे घिरा हुआ हो, जिससे हम वहाँ सुखपूर्वक रहें और तीर्थस्नान किया करें। हम सब लोग सदा वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर और गृहस्थधर्मका पालन करनेवाले हैं, अतः हमें गृहकी आवश्यकता है।

यह सुनकर राजाने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और उस स्थानमें एक बहुत बड़े नगरका निर्माण कराया। नगरके चारों ओर ऊँची-ऊँची चहारदीवारी और गहरी खाई तैयार करायी गयी। उस मनोहर नगरकी लंबाई और चौड़ाई एक कोसकी थी। इस प्रकार उत्तम नगरका निर्माण हो जानेपर उन राजाने ब्राह्मणोंके पैर धोये और जो जैसी-जैसी योग्यतावाले थे, उन्हें वैसे ही गृह शास्त्रोक्तविधिसे दान किये।

~~ ० ~~

राजा चमत्कारकी तपस्यासे सन्तुष्ट हुए शिवका अचलेश्वररूपसे निवास और रक्तशृंग पर्वतकी परिक्रमा आदिका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको वह उत्तम नगर दान करके राजा चमत्कार कृतकृत्य हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने अपने पुत्र-पौत्र तथा सेवकोंको बुलाकर कहा—'मैंने यह नगर बनवाकर ब्राह्मणोंको निवेदन किया है। अतः तुमलोगोंको मेरी आज्ञासे इस नगरकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये, जिससे सब ब्राह्मण यहाँ सन्तुष्टचित्त एवं सुखी रह सकें। जो राजा भक्तियुक्त होकर इन सब ब्राह्मणोंका पालन करेगा, वह इस भूतलपर महान् तेज प्राप्त करेगा। ब्राह्मणोंके प्रसादसे और मेरे वचनसे वह दीर्घायु एवं नीरोग रहेगा। इसके विपरीत जो कोई इनके प्रति द्वेष रखकर इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको कष्ट पहुँचायेगा, वह निश्चय ही नरकमें पड़ेगा।' ऐसा कहकर राजा चमत्कार तपस्यामें तत्पर हो गये। उनके पुत्र-पौत्र आदिने भी उनकी दी हुई शिक्षाके अनुसार ही बर्ताव किया।

पुत्रोंको राज्य और ब्राह्मणोंको नगर देकर राजाने अपने लिये शंखतीर्थमें आश्रम बनाया और वहीं रहकर बड़ी श्रद्धाके साथ देवाधिदेव महेश्वरकी आराधना की। उनकी आराधनासे प्रसन्न होकर महादेवजीने प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'राजन्! मुझसे मनोवांछित वर माँगो।'

राजा बोले—प्रभो! अनेक तीर्थोंका आश्रयभूत यह पुण्यतम क्षेत्र आप भगवान् हाटकेश्वरके माहात्म्यसे सब पापोंको नाश करनेवाला है। सम्पूर्ण देवताओंके अधीश्वर! मैंने श्रद्धायुक्त पवित्रचित्तसे इस उत्तम नगरका निर्माण कराके इसे ब्राह्मणोंकी सेवामें समर्पित किया है। इस नगरमें आप अपने समस्त पार्षदगणोंके साथ सदा अचलरूपसे निवास करें।

भगवान् शिवने कहा—राजन्! मैं इस नगरमें अचल होकर निवास करूँगा, अतएव तीनों लोकोंमें अचलेश्वर नामसे मेरी ख्याति होगी। जो मनुष्य यहाँ स्थित हुए मेरे स्वरूपका भक्तिपूर्वक दर्शन करेगा, उसके यहाँ सम्पूर्ण देवताओंकी विभूतियाँ अविचलरूपसे निवास करेंगी। जो माघमासके

१०७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

शुक्लपक्षकी चतुर्दशीमें श्रद्धापूर्वक मेरे लिंगमय विग्रहको घृतसे स्नान करायेगा उसका समस्त पाप सूर्योदयसे अन्धकारकी भाँति नष्ट हो जायगा। अतः भूपाल! तुम यहीं मेरे लिंगमय स्वरूपकी स्थापना करो, मैं यहाँ अचलरूपसे निवास करूँगा।

ऐसा कहकर देवेश्वर शिव अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर राजाने शीघ्रतापूर्वक एक परम मनोहर मन्दिर तैयार कराया और उसमें शिवलिंगको स्थापित किया। उसके दर्शन, स्पर्श, ध्यान और पूजनसे मनुष्य जन्मसे लेकर मृत्युतकके पापोंसे मुक्त हो जाता है। शिवलिंगकी स्थापना हो जानेपर आकाशवाणी हुई, 'नृपश्रेष्ठ! मैं इस लिंगमें नित्य, निरन्तर निवास करूँगा। मेरे इस विग्रहकी छाया सदा अचल होगी। वह केवल पृष्ठभागकी ओर रहेगी, दूसरी किसी दिशामें स्थित न होगी।'

तत्पश्चात् राजाने सब दिशाओंमें सूर्यके स्थित होनेपर उस शिवलिंगकी छायाको सदा एक ही रूपसे अविचल देखा। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने भूमिमें मस्तक रखकर उस शिवलिंगको प्रणाम करके अपने-आपको कृतार्थ माना।

सूतजी कहते हैं—'महर्षियो! आज भी उस शिवलिंगकी छाया वैसी ही दिखायी देती है जो सबको विस्मयमें डालनेवाली है। जिसकी मृत्यु छः महीनेके भीतर ही होनेवाली है। वह उस छायाको नहीं देख पाता। उस क्षेत्रमें रहनेवाले सब मनुष्य भगवान् अचलेश्वरके माहात्म्यसे सम्पूर्ण मनोवांछित फलको पाते हैं।'

महर्षियो! उस तीर्थमें चैत्र कृष्ण चतुर्दशीको ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सब देवता, सम्पूर्ण तीर्थ, सभी मन्दिर, नदी और समुद्र आदि जो भी पवित्र करनेवाली शक्तियाँ हैं वे सब उपस्थित होती हैं। जिस समय इन्द्र रक्तश्रृंग पर्वतको उस प्रदेशमें ले आये थे उसी समय उन्होंने यह कह दिया था कि तुम्हारे समीप सब देवता आवेंगे; इसलिये उस समय एक बार उस पर्वतकी प्रदक्षिणा कर लेनेपर उत्तम कल्याणकी प्राप्ति होती है। उस दिन वहाँ जो कुछ भी आदरपूर्वक दान किया जाता है, वह सूर्य और चन्द्रमाके स्थितिकालतक अक्षय पुण्य देनेवाला होता है। जो कोई मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक उत्तम अन्नसे ब्राह्मणोंको भोजन कराता है उसे गयातीर्थका फल प्राप्त होता है। जो जिस कामनाका चिन्तन करते हुए उस पर्वतकी परिक्रमा करता है वह उसी कामनाको पाता है और जो निष्कामभावसे परिक्रमा करता है वह मोक्षका भागी होता है। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि वे सब कार्य छोड़कर प्रयत्नपूर्वक रक्तश्रृंग पर्वतके समीपकी भूमिका सेवन करें। ब्राह्मणो! भगवान् हाटकेश्वरका वह क्षेत्र स्मरण करनेसे भी मनुष्यको पवित्र कर देता है; फिर दर्शन और स्पर्शसे पवित्र कर दे इसके लिये तो कहना ही क्या है?


## चमत्कारपुरमें गयाशीर्षतीर्थकी महिमा—राजा विदूरथके द्वारा तीन प्रेतोंका उद्धार

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! उस क्षेत्रकी लंबाई-चौड़ाई पाँच कोसकी है। उसके पूर्वमें गयाशीर्ष, पश्चिममें नृसिंहजीका स्थान और दक्षिण तथा उत्तरमें गोकर्णेश्वर शिव हैं। पहले वह हाटकेश्वरक्षेत्र कहलाता था। आगे चलकर वही संसारमें सर्वपातकनाशक उत्तम तीर्थके रूपमें विख्यात हुआ। राजा चमत्कारने जबसे वह स्थान ब्राह्मणोंको दे दिया, तबसे उन्हींके नामसे उसकी प्रसिद्धि हुई—लोग उसे चमत्कारपुर कहने लगे।

पूर्वकालमें विदूरथ नामसे प्रसिद्ध एक हैहयवंशी राजा हो गये हैं, जो बड़े-बड़े यज्ञ करनेवाले, दानपति तथा प्रत्येक कार्यमें दक्ष थे। एक समय
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १०७३ ---|---

राजा विदूरथ अपनी सेनाके साथ हिंसक पशुओंसे भरे हुए वनमें शिकार खेलनेके लिये गये। वहाँ उन्होंने सर्पोंके समान विषैले बाणोंसे कितने ही चीता, शम्बर तथा व्याघ्र और सिंह आदि पशुओंको मारा। उन वन-जन्तुओंमेंसे एक पशु उनके बाणसे घायल होकर भी धरतीपर नहीं गिरा। बाण लिये जोरसे भागा। राजाने भी कौतूहलवश उसके पीछे अपना घोड़ा दौड़ाया। इस प्रकार वे अपनी सेनाको छोड़कर दूसरे घोर वनमें जा पहुँचे जो मनमें भय उत्पन्न करनेवाला था। उसमें प्रायः काँटेदार वृक्ष भरे हुए थे। वहाँकी सारी भूमि रूखी, पथरीली तथा जलसे हीन थी। उस वनमें जाकर राजा विदूरथ भूख और प्याससे व्याकुल हो गये और उस दुर्गम वनका अन्त ढूँढ़ते हुए अपने घोड़ेको कोड़ेसे पीट-पीटकर हाँकने लगे। घोड़ा हवासे बाते करने लगा और उसने राजाको सब जन्तुओंसे रहित दूरस्थ दुर्गम मार्गमें पहुँचा दिया। अन्तमें वह अश्व भी भूमिपर गिर पड़ा।

तदनन्तर भूख-प्याससे व्याकुल राजा उस वनके भीतर पैदल ही चलने लगे और एक जगह लड़खड़ाकर गिर पड़े। इतनेमें ही उन्होंने आकाशमें अत्यन्त भयंकर तीन प्रेत देखे। उन्हें देखकर वे भयसे थर्रा उठे और जीवनसे निराश होकर बड़े क्लेशसे बोले—'तुमलोग कौन हो। मैं भूख-प्याससे पीड़ित राजा विदूरथ हूँ। शिकारके पीछे जीव-जन्तुओंसे रहित इस वनमें आ पहुँचा हूँ।'

तब उन तीनों प्रेतोंमें जो सबसे ज्येष्ठ था, उसने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा—महाराज! हम तीनों प्रेत हैं और इसी वनमें रहते हैं। अपने कर्मजनित दोषसे हमलोग महान् दुःख उठा रहे हैं। मेरा नाम मांसाद है, यह दूसरा मेरा साथी विदैवत है और तीसरा कृतघ्न है, जो हम सबमें बढ़कर पापात्मा है। हमें जिस-जिस कर्मके द्वारा यहाँ एक ही साथ प्रेतयोनिकी प्राप्ति हुई है, वह सुनो। राजन्! हम तीनों वैदेशपुरमें देवरात नामक महात्मा ब्राह्मणके घरमें उत्पन्न हुए थे। हमने नास्तिक होकर धर्म-मर्यादाका उल्लंघन किया और हमलोग सदा परायी स्त्रियोंके मोहमें फँसे रहे। मैंने जिह्वाकी लोलुपताके कारण सदा मांस ही भोजन किया है, अतः मुझे अपने कर्मके अनुसार ही मांसाद नाम प्राप्त हुआ है। महाराज! यह दूसरा जो तुम्हारे सामने खड़ा है, इसने देवताओंका पूजन किये बिना ही सदा अन्न ग्रहण किया है, उसी कर्मके फलसे इसे प्रेत-योनिमें आना पड़ा है और देवताओंके विपरीत चलनेके कारण इसका नाम विदैवत हुआ है और जिस पापीने सदा दूसरोंके साथ कृतघ्नता—विश्वासघात किया है वही अपने कर्मके अनुसार कृतघ्न कहलाता है।

राजाने पूछा—इस मनुष्यलोकमें सब प्राणी आहारसे ही जीवन धारण करते हैं। यहाँ तुमलोगोंको कौन-सा आहार प्राप्त होता है, सो मुझे बताओ।

मांसाद बोला—जिस घरमें भोजनके समय स्त्रियोंमें युद्ध होता है, वहाँ प्रेत भोजन करते हैं। राजन्! जहाँ बलिवैश्वदेव किये बिना और भोजनमेंसे पहले अग्राशन—गोग्रास आदि दिये बिना भोजन किया जाता है, उस घरमें भी प्रेत भोजन करते हैं। जिस घरमें कभी झाड़ू नहीं लगता, जो कभी गोबर आदिसे लीपा नहीं जाता है तथा जहाँ मांगलिक कार्य और अतिथि आदिके सत्कार नहीं होते, उसमें भी प्रेत भोजन करते हैं। जिस घरमें फूटे बर्तनका त्याग नहीं किया जाता तथा वेदमन्त्रोंकी ध्वनि नहीं होती, वहाँ प्रेत आहार करते हैं। जो श्राद्ध दक्षिणासे रहित और शास्त्रोक्त विधिसे हीन होता है तथा जिसपर रजस्वला स्त्रीकी दृष्टि पड़ जाती है, वह श्राद्ध एवं भोजन हमारे अधिकारमें आ जाता है। जो अन्न केश, मूत्र, हड्डी और कफ आदिसे संयुक्त हो गया है और जिसे हीनजातिके मनुष्योंने छू दिया है, उसपर भी हमारा अधिकार हो जाता है। जो मनुष्य असहिष्णु, चुगली खानेवाला, दूसरोंका कष्ट देखकर प्रसन्न होनेवाला, कृतघ्न तथा गुरुकी

१०७४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

शय्यापर सोनेवाला है और जो वेदों एवं ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है, ब्राह्मणकुलमें पैदा होकर मांस खाता है और सदा प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह प्रेत होता है। जो परायी स्त्रीमें आसक्त, दूसरेका धन हड़प लेनेवाला तथा परायी निन्दासे सन्तुष्ट होनेवाला है और जो धनकी इच्छासे नीच एवं वृद्ध पुरुषके साथ अपनी कन्याका व्याह कर देता है, वह प्रेत होता है। जो मनुष्य उत्तम कुलमें उत्पन्न, विनयशील और दोषरहित धर्मपत्नीका त्याग करता है, जो देवता, स्त्री और गुरुका धन लेकर उसे लौटा नहीं देता है तथा जो ब्राह्मणोंके लिये धनका दान होता देख उसमें विघ्न डालता है, वह प्रेत होता है।

राजाने पूछा—मांसाद! अब यह बताओ कि कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्य प्रेत नहीं होता है?

मांसाद बोला—जो परायी स्त्रियोंको माताके समान, दूसरोंके धनको मिट्टीके ढेलेके समान तथा सब प्राणियोंको अपने समान देखता है, वह प्रेत नहीं होता। जो सदा अन्नदानमें तत्पर, विशेषतः अतिथि-सत्कारमें प्रेम रखनेवाला, स्वाध्यायशील और व्रतपरायण होता है, वह प्रेत नहीं होता। जो शत्रु और मित्रमें समभाव रखनेवाला और मान तथा अपमानमें भी समताका त्याग न करनेवाला है, वह प्रेत नहीं होता। जो धर्ममें लगे हुए तथा धर्ममार्गपर चलनेवाले मनुष्योंका उत्साह बढ़ाता है, वह भी प्रेत नहीं होता। जो सदा यज्ञकर्ममें तत्पर, सदैव तीर्थयात्रापरायण तथा सर्वदा शास्त्र-श्रवण करनेवाला है, वह मनुष्य प्रेत नहीं होता। जो बावली, कुआँ और पोखरा बनवाता, बगीचे लगाता और पौंसले (प्याऊ) चलाता है, वह प्रेत नहीं होता। राजन्! हम इस प्रेतयोनिसे बहुत कष्ट पा रहे हैं। तुम हमारा उद्धार करनेवाले हो जाओ। गयाशीर्ष नामक पवित्र तीर्थमें जाकर तुम हम तीनोंके लिये पृथक्-पृथक् श्राद्ध करो, जिससे हमारी यह प्रेतयोनि निवृत्त हो जाय।

राजा बोले—जिस योनिमें इस प्रकार पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण होता है, आकाशमें भी चलनेकी शक्ति प्राप्त है और धर्म तथा अधर्मका सम्यक् ज्ञान है, उसकी तुम निन्दा क्यों करते हो?

मांसादने कहा—राजन्! यह प्रेतयोनि अधम देवयोनि कहलाती है। इसमें केवल तीन ही गुण हैं—पूर्वजन्मका स्मरण, आकाशगमनकी शक्ति तथा धर्म और अधर्मका निश्चय। इसके सिवा इसमें सब दोष-ही-दोष भरे हैं। यदि हमलोग इस वनकी सीमासे बाहर जाते हैं तो हमारे ऊपर बिना देखे हुए मुद्गरोंकी मार पड़ती है। इसके सिवा समस्त धार्मिक क्रियाओंका अनुष्ठान केवल मनुष्यके लिये विहित है, प्रेतयोनि अथवा देवयोनिमें गये हुए जीवोंके लिये नहीं। राजन्! जब सूर्य वृष राशिपर स्थित होते हैं तब ज्येष्ठकी चिलचिलाती हुई धूपमें हम प्याससे व्याकुल होकर दूरसे ही जलसे भरे हुए जलाशयोंको देखते हैं। यदि उनके समीप चले जायें तो हमारे ऊपर अदृष्ट मुद्गरोंकी मार पड़ती है। इसी प्रकार हम दूरसे देखते हैं, गृहस्थोंके घरोंमें नाना प्रकारकी रसोई तैयार करके रखी हुई है। हम भूखसे व्याकुल रहते हैं किंतु उस रसोईको ले नहीं सकते। अच्छे फलवाले वृक्षोंको हम देखते हैं, किंतु उन्हें सेवनका अवसर नहीं पाते। अधिक क्या कहूँ, जो-जो घृणित एवं क्लेशदायक कर्म हैं, सब हमारे पास स्वतः उपस्थित हो जाते हैं। बिना किसी दोषके हमारी प्राणयात्रा नहीं चलती। जल, छाया, अन्न और सवारी—ये सब हमारे लिये नहीं हैं। इसीलिये प्रदोषकाल आनेपर हम सदा छिद्र ढूँढ़ते हुए घूमते रहते हैं। हमारे आकाशगमनकी शक्तिकी बात जो तुमने कही है, वह भी व्यर्थ है। उस आकाशगमनकी शक्तिसे, धर्माधर्म-विवेकसे और पूर्वजन्मकी स्मृतिसे भी क्या लाभ है, जिसके द्वारा मोक्षकी सिद्धि नहीं हो सकती?* अतः राजन्! यद्यपि ये आकाशगमन आदि प्रेतोंके गुण बताये जाते हैं


* क्रियते खेचरत्वेन किं किं धर्मविनिश्चयैः। यया न सिद्ध्यते मोक्षो याति स्मृत्या हि किं तया॥ (स्क० पु०, ना० १८।६७)

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०७५

तथापि इनके द्वारा कोई सिद्धि नहीं मिलती। उलटे इन गुणोंके कारण खेद ही अधिक होता है, क्योंकि प्रेतयोनियाँ किसी भी शुभ कर्मके करनेमें समर्थ नहीं हैं।

राजा बोले—यदि मैं इस महान् वनसे घरको लौट जाऊँगा तो निश्चय ही तुम सब लोगोंके लिये गयाश्राद्ध करूँगा और यत्नपूर्वक सब उपायोंसे तुम्हारा उद्धार करूँगा। इस समय तुम मुझे मनुष्योंसे सेवित कोई जलाशय बतलाओ जिससे जल प्राप्त करके मैं तुम्हारा उपकार करूँ।

मांसादने कहा—महाराज! इस स्थानसे थोड़ी ही दूरपर एक जलाशय है, जो नाना प्रकारके वृक्षोंसे घिरा हुआ और चित्तको आह्लाद प्रदान करनेवाला है। तुम यहाँसे सीधे उत्तरकी ओर चले जाओ।

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर राजा विदूरथ धीरे-धीरे उत्तर दिशाकी ओर चले। थोड़ी ही दूरपर हरे-भरे वृक्षोंका समुदाय दिखायी दिया। वहाँ हंस, बक तथा सारस आदि पक्षी उड़ रहे थे। वहाँ पहुँचकर राजाने सौम्य प्राणियोंसे सुसेवित एक मनोहर आश्रम देखा। वहाँ एक वृक्षके नीचे तपस्वीजनोंसे सेवित मुनिश्रेष्ठ जैमिनि विराजमान थे। उनके समीप जाकर महाराजने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और भूमिपर बैठे हुए मुनिके शिष्योंको भी प्रणाम किया। उन सबने राजाको देखकर पूछा—'महाराज! इन निर्जन वनमें तुम कहाँसे आये हो?'

राजाने कहा—इस समय मुझे प्यास सता रही है, अतः पहले पानी पीकर पीछे मैं अपना सब हाल बताऊँगा।

तब उन्होंने राजाको जल दिखा दिया। राजाने उसमें प्रवेश करके जल पीकर प्यास बुझायी और नीचे गिरे हुए वृक्षोंके फल लेकर इच्छापूर्वक भोजन किया। पूर्णतः तृप्त होनेपर वे पुनः महर्षि जैमिनिके समीप आये और प्रणाम करके बैठ गये। तदनन्तर अपना वृत्तान्त कहना प्रारम्भ किया—

‘मुनिवरो! मैं विदूरथ नामसे प्रसिद्ध राजा हूँ। माहिष्मती पुरीमें मेरा निवासस्थान है। मैंने अपनी सेना साथ लेकर इस भयंकर वनमें प्रवेश किया था। मेरे सब सैनिक लताओं और झाड़ियोंकी आड़में छिपकर मुझसे अदृश्य हो गये। पता नहीं उन सैनिकोंका क्या हाल है। मेरा घोड़ा भी एक स्थानपर गिर गया। मेरी आयु शेष थी कि मैं घूमता हुआ यहाँ आ पहुँचा। मुनिवरो! अब सन्ध्याका समय आ गया है। अतः हम सब लोगोंको यथायोग्य सन्ध्योपासन आदि विधि करनी चाहिये।'

तत्पश्चात् मुनियों तथा राजाने सन्ध्योपासना की। धीरे-धीरे रात्रि हो गयी। इसी समय राजाकी सेनाके कुछ मनुष्य उन्हें ढूँढ़ते हुए वहाँ आ पहुँचे और उन्हें देखकर बड़े आदरसे बोले—'अहोभाग्य! जो महाराज मिल गये।' यों कहकर वे राजाके चरणोंमें गिर गये। फिर उठकर उन्होंने राजासे सैनिकोंके कष्ट, जो देखे और सुने थे, बतलाये। तदनन्तर उन सब सेवकोंके साथ राजा वृक्षके नीचे पत्ते बिछाकर सो रहे। प्रातःकाल उठकर उन्होंने पूर्वाह्निककृत्य—स्नान, सन्ध्योपासन आदि पूरा किया। तत्पश्चात् मुनिवर जैमिनिको प्रणाम करके उनकी आज्ञा ले अपने सेवकोंके साथ माहिष्मती पुरीकी ओर प्रस्थान किया। मार्ग पूछते हुए धीरे-धीरे चलकर राजा कुछ कालमें अपने निवासस्थानपर जा पहुँचे और कुछ समय विश्राम करके उन्होंने शीघ्र ही गयाशीर्षकी यात्रा कर दी। समयानुसार वहाँ पहुँचकर राजाने स्नान किया और धुले हुए वस्त्र पहनकर पवित्र हो श्रद्धायुक्त हृदयसे पहले मांसादका श्राद्ध किया। तदनन्तर रातमें सोते समय स्वप्नमें उन्होंने देखा, मांसाद दिव्य माला और वस्त्र धारण किये दिव्य विमानपर आरूढ़ है। उस समय मांसादने राजासे कहा—'भूपाल! तुम्हारे प्रसादसे मैं प्रेतयोनिसे मुक्त हो गया हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, मैं स्वर्गलोकको जाऊँगा।'

तब प्रातःकाल उठकर हर्षमें भरे हुए राजा

१०७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

विदूरथने विदैवतके लिये यथायोग्य श्राद्ध किया। फिर वह भी उसी प्रकार राजाको स्वप्नमें दिखायी दिया और मांसादकी ही भाँति कृतज्ञता प्रकट करके स्वर्गलोकमें चला गया। फिर तीसरे दिन राजाने पूर्ववत् श्रद्धापूर्ण हृदयसे कृतघ्नके लिये श्राद्ध किया। रातको उसने भी स्वप्नमें दर्शन दिया, किंतु वह उसी प्रेतरूपमें आया था और बड़े दुःखसे घिरा हुआ था।

कृतघ्न बोला—महाराज ! तड़ागके लिये नियत धनकी जिसने चोरी की है और जो सदा कृतघ्न रहा है—ऐसे मुझ पापात्माकी अभीतक मुक्ति नहीं हुई। अतः जिस प्रकार मुझे भी इस दुःखसे छुटकारा मिल जाय, वैसा कोई उपाय करो और अपनी की हुई सत्यप्रतिज्ञा पूरी करो। सत्य ही परब्रह्म है, सत्य ही परम तप है, सत्य ही परम ज्ञान है और सत्य ही परम शास्त्र है। सत्यके बलसे वायु चलती है। सत्यसे सूर्य तप रहा है और सत्य वचनसे ही समुद्र अपनी मर्यादाका लंघन नहीं करता। सत्यहीन मनुष्यके द्वारा किये हुए तीर्थ-सेवन, तप, दान, स्वाध्याय और गुरुसेवा—ये सब धर्म व्यर्थ हो जाते हैं। एक समय देवताओंद्वारा कौतूहलवश अपनी तुलापर एक ओर तो सम्पूर्ण धर्मोंको रखा और दूसरी ओर केवल सत्यको, परंतु सत्यका ही पलड़ा भारी रहा।^* इसलिये महामते ! तुम भी सत्यको ही आगे रखकर मेरा उद्धार करो। यह पुण्य तुम्हारे लिये तपस्यासे भी बढ़कर कल्याणका साधक होगा।

राजा विदूरथने पूछा—प्रेत ! तुम्हारी मुक्ति किस उपायसे हो सकती है, शीघ्र बताओ। दुष्कर होनेपर भी मैं उसे अवश्य करूँगा।

प्रेतने कहा—राजन् ! चमत्कारपुरमें जो हाटकेश्वरक्षेत्र है, वहीं कलियुगसे डरा हुआ गयाशीर्षतीर्थ प्लक्ष (पाकड़) नामक वृक्षके नीचे धूलमें छिपा हुआ है। उसके चारों ओर समयोचित शाक, कुशा और जंगली तिलके पौधे हैं। वहीं जाकर तुम तिल, अन्न, शाक और कुश आदि सामग्रियोंके द्वारा मेरे लिये श्राद्ध करो। ऐसा करनेपर शीघ्र मेरी मुक्ति हो जायगी।

प्रेतकी यह बात सुनकर दयालु राजा वहाँ गये और उसके बताये अनुसार उन्होंने सब कुछ किया। पहले जलके लिये वहाँ एक छोटा-सा कुआँ खोदा। फिर वेदोंके पारंगत श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बुलाकर कृतघ्नके उद्देश्यसे शास्त्रोक्तविधिके अनुसार श्राद्ध किया। उस श्राद्धके पूर्ण होते ही कृतघ्न दिव्यरूपधारी पुरुष होकर श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हुआ और विदूरथसे बोला—'प्रभो ! तुम्हारे प्रसादसे मैं इस भयंकर प्रेतशरीरसे मुक्त हो गया। अब मैं स्वर्गको जा रहा हूँ।'

सूतजी कहते हैं—तबसे लेकर गयाशीर्षक्षेत्रमें वह 'लघुकूप' प्रसिद्ध हो गया। वह उस क्षेत्रमें पितरोंको पुष्टि देनेवाला है। जो आश्विनमासमें पितृपक्षकी अमावास्याको वहाँ कालशाक, जंगली तिल, तैयार किये हुए अन्न तथा कुशा आदिके द्वारा श्रद्धापूर्वक पितरोंका श्राद्ध करता है वह उत्तम फलका भागी होता है। अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, आज्यप और सोमप—ये पितृगण वहाँ सदा निवास करते हैं; अतः उस तीर्थमें जाकर समय या असमयमें सदा ही प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिये।


^* सत्यमेव परं ब्रह्म सत्यमेव परं तपः। सत्यमेव परं ज्ञानं सत्यमेव परं श्रुतम्॥
सत्येन वायुर्वहति सत्येन तपते रविः। सागरः सत्यवाक्येन मर्यादां न विलङ्घयेत्॥
तीर्थसेवा तपो दानं स्वाध्यायो गुरुसेवनम्। सर्वं सत्यविहीनस्य व्यर्थं सञ्जायते यतः॥
सर्वे धर्मा धृताः पूर्वमेकतोऽन्यत्र वै ऋतम्। तुलाया कौतुकाद्देवैर्जातं तत्र ऋतं गुरु॥
(स्क० पु०, ना० १९। २०—२३)

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध *१०७७

मार्कण्डेय मुनिको अमरत्वकी प्राप्ति, ब्रह्माजीकी स्थापना, बालसख्यतीर्थकी महिमा

सूतजी कहते हैं—चमत्कारपुरके समीप मृकण्ड नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ द्विज थे, जो वेदवेत्ता विद्वानोंमें अग्रगण्य माने जाते थे। वे वानप्रस्थ-आश्रममें स्थित थे। वहाँ उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की थी। जिस समय वे गृहस्थ थे, तभी ढलती अवस्थामें उनके एक सर्वशुभ-लक्षणसम्पन्न पुत्र हुआ था। पिताने उसका नाम ‘मार्कण्ड’ रखा था। वानप्रस्थी पिताके आश्रममें ही बालकका लालन-पालन हुआ और वह जल्दी बढ़ गया। धीरे-धीरे उसकी अवस्था पाँच वर्षकी हो गयी। एक दिन जब वह पिताकी गोदमें बैठकर खेल रहा था, उसी समय वहाँ कोई सामुद्रिक शास्त्रका विद्वान् आया। उसने नखसे लेकर शिखातक उस बालककी ओर देखा। देखकर उसके नेत्र आश्चर्यसे चकित हो गये। फिर वह किंचित् मुसकराया।

मृकण्ड मुनिने उसे हँसते देख विनीतभावसे पूछा—'विप्रवर! मेरे इस पुत्रकी ओर देखकर आप चकित क्यों हो गये थे और फिर हँसे क्यों?' उनके बारंबार इस प्रकार पूछनेपर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने कहा—'मुने! इस शिशुके जो लक्षण देखे जाते हैं, वे यदि किसी मनुष्यके शरीरमें हों तो वह अजर-अमर होता है। परंतु इसमें जो एक विशेष लक्षण है उससे सूचित होता है कि आजके दिनसे छः महीने पूरे होते ही इसकी मृत्यु हो जायगी। ऐसा जानकर आप आजसे इसके लिये लोक-परलोकमें हितकर कार्य कीजिये।'

यों कहकर वह उत्तम ब्राह्मण अपनी अभीष्ट दिशाको चला गया। तब मृकण्ड मुनिने मन-ही-मन कुछ सोच-विचारकर उचित समयसे पहले ही बालकका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। फिर उसे कर्तव्यका उपदेश देते हुए कहा—'बेटा! तुम जिस किसी भी ब्राह्मणको देखना उसे अवश्य विनयपूर्वक प्रणाम करना।' इस प्रकार व्रतमें स्थित हुए उस बालकके छः महीने पूर्ण होनेमें केवल तीन दिन शेष रह गये। वह सदा प्रत्येक ब्राह्मणको प्रणाम करता रहा। इसी बीचमें तीर्थयात्रापरायण सप्तर्षिगण उधर आ निकले, जहाँ वह मेखलाधारी मार्कण्ड खड़ा था। उसने उन सब मुनियोंको बारी-बारीसे प्रणाम किया और सबने पृथक्-पृथक् उसे ‘दीर्घायु’ होनेका आशीर्वाद दिया। तदनन्तर मुनिवर वसिष्ठने उस बालब्रह्मचारीकी ओर देखते हुए कहा—'हम सबने इस शिशुको दीर्घायु होनेका आशीर्वाद दिया है, परंतु यह तो आजके तीसरे ही दिन प्राण त्याग देगा; अतः हमलोगोंके वचनका इस प्रकार असत्य होना कदापि उचित नहीं है। इसलिये ऐसा कोई उपाय किया जाय जिससे यह बालक चिरंजीवी हो जाय।'

तदनन्तर वे सब महर्षि परस्पर विचार करके इस निश्चय पर पहुँचे कि 'ब्रह्माजीको छोड़कर दूसरा कोई इसके जीवनका उपाय नहीं है। अतः इस बालकको उनके आगे ले जाकर उन्हींकी आज्ञासे इसे चिरंजीवी बनाना चाहिये।' ऐसा निर्णय करके तीर्थभ्रमणका कार्य रोककर उस ब्रह्मचारीको साथ ले वे शीघ्र ही ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे। वहाँ ब्रह्माजीको प्रणाम करके वेदोक्त स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करनेके पश्चात् सब मुनि बैठे। इसके बाद उस बालकने भी ब्रह्माजीको प्रणाम किया और ब्रह्माजीने भी उसे दीर्घायु होनेका आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् ब्रह्माजीने सप्तर्षियोंसे पूछा—'तुमलोग कहाँसे और किसलिये इस समय यहाँ आये हो और यह उत्तम व्रत धारण करनेवाला बालक कौन है?'

सप्तर्षि बोले—पितामह! हमलोग तीर्थयात्राके प्रसंगसे पृथ्वीपर सब ओर घूमते हुए चमत्कारपुरके समीपतक गये थे। वहाँ इस बालकने हम सबको प्रणाम किया और क्रमशः हम सबने इसे दीर्घायु

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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


होनेका आशीर्वाद दिया। परंतु इसकी आयु तो तीन दिन ही शेष रह गयी है, इसीलिये हम बहुत लज्जित हैं और इसे लेकर आपके पास आये हैं। यहाँ आनेपर आपने भी इस बालकको दीर्घायु होनेका आशीर्वाद दिया है। अतः आप और हम सब लोग सत्यवादी बने रहें, इसके लिये कोई उपाय आप करें।

मुनियोंका यह वचन सुनकर ब्रह्माजीने हँसते हुए कहा—यह बालक मेरे प्रसादसे वेद-विद्यामें प्रवीण तथा जरामृत्युसे रहित होगा। इसमें सन्देह नहीं है। अतः अब इसे शीघ्र भूतलपर ले जाकर इसके घर पहुँचा दो। यह सुनकर सप्तर्षि उस बालकको लेकर उसके पिताके आश्रमके समीप आये और अग्नितीर्थमें छोड़कर स्वयं तीर्थस्नानके लिये चले गये। इधर पुत्र-स्नेही मृकण्ड मुनि अपने पुत्रको न देख दुःखी हो विलाप करते थे, इतनेमें ही बालक मार्कण्डेय पिता-माताके निकट आ गया। उसे आते देख ब्राह्मण और ब्राह्मणी दोनों उसकी ओर दौड़े और बार-बार हृदयसे लगाकर पूछने लगे—'बेटा! अपनी मातासहित मुझको शोकके समुद्रमें डालकर तुम आश्रमसे कहाँ चले गये थे और अब कहाँसे आये हो? फिर कभी ऐसा न करना।'

मार्कण्डेयजी बोले—पिताजी! आज यहाँ मुनिलोग पधारे थे। मैंने आपकी आज्ञाका स्मरण रखते हुए बारी-बारीसे उन सबको विनयपूर्वक प्रणाम किया और उन्होंने मुझे दीर्घायु होनेका आशीर्वाद दिया। तब उनमेंसे वसिष्ठजीने हँसकर कहा—'मुनियो! आपने जिस बालकको 'दीर्घायु' कहा है, वह आजसे तीसरे ही दिन मृत्युको प्राप्त होनेवाला है।' तब असत्यसे डरे हुए उन महर्षियोंने तत्क्षण मुझे ब्रह्मलोकमें पहुँचा दिया। वहाँ जानेपर मैंने ब्रह्माजीको प्रणाम किया तब उन्होंने भी 'दीर्घायु' होनेका आशीर्वाद दिया। तब उन मुनियोंने मुझे आशीर्वाद देनेका सब वृत्तान्त कहा और यह अनुरोध किया कि 'पितामह! आपके प्रसादसे यह बालक जिस प्रकार दीर्घायु हो सके वैसा यत्न कीजिये।' तब ब्रह्माजीने मुझे अजर-अमर बना दिया और तुरंत उन सप्तर्षियोंके साथ घरको भेज दिया। वे मुनि मुझे आश्रमके समीप छोड़कर कुण्डमें स्नान करनेके लिये चले गये हैं।

मार्कण्डेयकी यह बात सुनकर मृकण्ड मुनिको बड़ा हर्ष हुआ। वे तुरंत उस स्थानपर गये जहाँ मुनिलोग स्थित थे। उन सबको प्रणाम करके वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये और बोले—'मुनिवरो! आपलोगोंके प्रसादसे आज मेरे कुलकी वृद्धि हुई। किन्हीं आचार्योंने यह बहुत उत्तम बात कही है कि साधुपुरुषोंकी सेवा करके मनुष्य तीनों लोकोंमें ख्याति लाभ करता है। साधुजनोंका दर्शन पवित्र है, क्योंकि साधुपुरुष तीर्थस्वरूप हैं। तीर्थ तो कुछ समयके बाद ही फलता है; परंतु साधुपुरुषोंका समागम तत्काल फल देता है*। अतः आज आप सब लोग मेरे घर अतिथिरूपसे आये हैं; बताइये मैं किस प्रकार आपका आतिथ्य करूँ।'

ऋषि बोले—मुने! हमारे लिये तो यही करोड़ों आतिथ्यके तुल्य है कि आपका अल्पायु बालक भी अमर हो गया।

मृकण्डने कहा—मुनीश्वरो! जिसे मृत्युने गलेसे लगा लिया था, मेरे उस बालककी रक्षा करके आपने समस्त कुलका उद्धार कर दिया है। ब्रह्मघाती, शराबी, चोर तथा व्रतको भंग करनेवाले पापीके लिये सत्पुरुषोंने प्रायश्चित्त बताया है; परंतु कृतघ्नके उद्धारका कोई उपाय नहीं है। अतः मुनीश्वरो! मुझपर कृतघ्नताका दोष न आवे, ऐसा उपाय आपको करना चाहिये।

ऋषि बोले—द्विजश्रेष्ठ! यदि आप कोई प्रत्युपकार करना ही चाहते हैं तो हमारे कहनेसे यहाँ ब्रह्माजीके लिये, जिन्होंने आपके पुत्रको अमर बनाया है, एक मन्दिर बनवाइये और इस तीर्थमें ब्रह्माजीकी स्थापना कीजिये। तत्पश्चात् स्वयं भी


* साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधवः। तीर्थं फलति कालेन सद्यः साधुसमागमः॥ (स्क० पु०, ना० २१। ६८)

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०७९

आप पुत्रके साथ यहाँ रहकर दिन-रात उनकी आराधना करें। हम और दूसरे ब्राह्मण भी आपके साथ रहकर नित्यप्रति पितामहका पूजन करेंगे। यहाँ आपके बालकके साथ हमारा सख्यसम्बन्ध स्थापित हुआ है, इसलिये यह तीर्थ 'बालसख्य' के नामसे प्रसिद्ध होगा। हमारे वचनसे यह तीर्थ सदा रोगी और भयभीत पुरुषोंको रोग एवं भयसे मुक्त करेगा। जो लोग इस तीर्थमें अपने रोगार्त, भयार्त अथवा ग्रहपीड़ित बालकोंको स्नान करायेंगे, उनके वे बालक सब दोषोंसे रहित हो जायँगे। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक निष्कामभावसे इस तीर्थमें स्नान करेंगे वे उत्तम गतिको प्राप्त होंगे।

ऐसा कहकर वे सभी मुनीश्वर मृकण्ड मुनिकी अनुमति ले अन्य तीर्थोंमें चले गये। तत्पश्चात् पुत्रसहित मृकण्ड मुनिने ज्येष्ठमासकी पूर्णिमाको ज्येष्ठा नक्षत्रमें चन्द्रमाके स्थित होनेपर ब्रह्माजीकी स्थापना की और आलस्य छोड़कर वे दिन-रात श्रद्धापूर्वक उनकी आराधनामें लगे रहे। इससे उन्हें उत्तम गतिकी प्राप्ति हुई। ब्राह्मणो! जो बालक ज्येष्ठमासके ज्येष्ठा नक्षत्रमें वहाँ स्नान करता है, वह एक वर्षतक ग्रहादिजनित पीड़ाका अनुभव नहीं करता है।


मृगपदतीर्थ और विष्णुपदतीर्थका प्रादुर्भाव तथा माहात्म्य, विष्णुपदीमें स्नान और विष्णुपदके स्पर्श आदिका महत्त्व

सूतजी कहते हैं—उसी तीर्थके पश्चिम भागमें परम उत्तम एवं अतिशय पवित्र मृगतीर्थ है, जो समस्त भूतलमें विख्यात है। जो मानव उस तीर्थमें पूर्ण श्रद्धाके साथ चैत्र शुक्ला चतुर्दशीको मध्याह्नकालमें स्नान करते हैं वे समस्त दोषों और पापोंसे युक्त होनेपर भी किसी प्रकार पशु-पक्षियोंकी योनिमें नहीं जाते। जो कृतघ्न, नास्तिक, चोर तथा राजनिन्दक हैं वे भी वहाँ स्नान करके परम गतिको प्राप्त होते हैं।

ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन! उस क्षेत्रमें मृगतीर्थका आविर्भाव कैसे हुआ?

सूतजीने कहा—महर्षियो! पूर्वकालमें उस विशाल वनके भीतर एक दिन बहुत-से महाभयंकर व्याध अपने हाथोंमें धनुष लिये आ पहुँचे। उस समय एक वृक्षके नीचे मृगोंका झुंड विश्वस्त होकर बैठा था। व्याधोंकी दृष्टि उनके ऊपर पड़ी। मृग भी उन व्याधोंको दूरसे ही देखकर भयसे व्याकुल हो भाग चले और पास ही गहरे जलाशयको देख उसीमें समा गये। जलके भीतर प्रवेश करते ही वे सब मृग उसी तीर्थके प्रभावसे मानव-शरीरको प्राप्त हो गये। तब उनसे व्याधोंने पूछा—'भद्रपुरुषो! इस मार्गसे अभी-अभी मृगोंका झुंड आया है, बताइये वह किस मार्गसे निकला है?'

वे मनुष्य बोले—हमलोग ही वे मृग हैं। इस तीर्थके प्रभावसे हमने दुर्लभ मानव-शरीर प्राप्त कर लिया है।

यह सुनकर सब व्याध बड़े विस्मयमें पड़े और उन्होंने भी धनुष-बाण फेंककर उस तीर्थमें स्नान किया। स्नान करते ही वे दिव्य शरीरसे युक्त श्रेष्ठ राजा हो गये। प्राचीन कालमें जहाँ स्नान करके राजा त्रिशंकु उत्तम शरीरको प्राप्त हुए थे, उसी जलाशयमें स्नान करनेके कारण वे वधिक सब पापोंसे मुक्त होकर उत्तम शरीरको प्राप्त हुए।

उस शुभ तीर्थमें विष्णुपद नामसे प्रसिद्ध एक अन्य तीर्थ भी है जो समस्त पातकोंका नाश करनेवाला है। दक्षिणायन आरम्भ होनेपर मनुष्य एकाग्रचित्त हो वहाँ विष्णुपदका पूजन करे और श्रद्धापूर्वक भगवान्‌को आत्मनिवेदन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष दक्षिणायनमें मरनेपर भी भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त होता है, इसमें सन्देह

१०८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नहीं है। इसी प्रकार उत्तरायण आरम्भ होनेपर भी विधिपूर्वक विष्णुपदका पूजन करके एकाग्रचित्त हो भक्तिभावसे आत्मनिवेदन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष भी भगवान् विष्णुके पुण्यधामको प्राप्त होकर सुखी होता है।

ऋषियोंने पूछा—भगवान् विष्णुका चरण उस तीर्थमें कैसे प्राप्त हुआ और वहाँ किस प्रकार आत्मनिवेदन किया जाता है?

सूतजीने कहा—सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने जिस समय बलिको बाँधा था, उस समय अपने तीन पगोंसे चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंको नाप लिया था। भगवान्के उन तीन पगोंमेंसे पहला पग इसी हाटकेश्वरक्षेत्रमें पड़ा था। दूसरा पग उन्होंने महर्लोकमें रखा। फिर भगवान् चक्रपाणिने जब तीसरा पग रखनेका उद्योग किया तब उनके अंगुष्ठके अग्रभागसे ब्रह्माण्ड फूट गया और अत्यन्त लघुताको प्राप्त हो गया। फूटे ब्रह्माण्डके उस छिद्रसे निकला हुआ वह जल भगवान्के अंगुष्ठाग्रसे होता हुआ क्रमशः पृथ्वीतलपर आया। चन्द्रमाके समान उज्ज्वल जलसे विभूषित उस तीर्थको लोकमें विष्णुपदी गंगा कहते हैं। इस प्रकार उस क्षेत्रमें जब भगवान् विष्णुका चरण प्राप्त हुआ तब प्राणियोंके सब पापोंका नाश करनेवाली विष्णुपदी नामक एक नदी प्रकट हुई। जो उसमें श्रद्धापूर्वक स्नान करके भगवान् विष्णुके चरणका स्पर्श करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। जो उत्तम श्रद्धासे युक्त हो विष्णुपदीके तटपर श्राद्ध करता है, वह गयामें श्राद्ध करनेका फल पाता है। जो मनुष्य सदा माघमासमें प्रातःकाल उठकर स्नान करता है, वह प्रयागमें स्नानका फल पाता है। जो एक वर्षतक वहाँ निवास करके भक्तिपूर्वक उसमें स्नान करता है, वह मनुष्य मोक्षका भागी होता है। जिसकी हड्डियाँ उस तीर्थके जलमें डाल दी जाती हैं, वह परम गतिको प्राप्त होता है। जो प्याससे पीड़ित होकर बिना भक्तिके भी उस तीर्थके जलमें प्रवेश करते हैं, वे भी पापमुक्त हो शरीरका अन्त होनेके पश्चात् भगवान् विष्णुके जरा-मृत्यु-रहित परम धाममें जाते हैं। फिर जो पर्वकाल उपस्थित होनेपर श्रद्धापूर्वक स्नान करके वेदके ज्ञाता श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान देते हैं, उनके लिये क्या कहना है! इसलिये जो मनुष्य अपने कल्याणकी इच्छा रखता है, वह प्रयत्न-पूर्वक विष्णुपदीके जलमें स्नान तथा विष्णुपदका स्पर्श करे।

दक्षिणायन अथवा उत्तरायण प्राप्त होनेपर श्रीविष्णुपदका पूजन करके इस मन्त्रका उच्चारण करे—

षण्मासाभ्यन्तरे मृत्युर्यद्यकस्माद् भवेन्मम।
तत्ते पदं गतिर्मे स्यात् स्यामहं भृत्यतां गतः॥

'भगवान्! यदि छः महीनेके भीतर मेरी अकस्मात् मृत्यु हो जाय तो आपके चरणोंमें ही मुझे आश्रय मिले और मैं आपका सेवक (पार्षद) होऊँ।'

श्रीहरिसे ऐसा कहकर तत्पश्चात् ब्राह्मणोंका पूजन करे और उन्हींके साथ भोजन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष उत्तम गतिको प्राप्त होता है।


विष्णुपदीकी अद्भुत महिमा, चण्डशर्माकी शुद्धि

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! पूर्वकालकी बात है। चमत्कारपुरमें उत्तम व्रतका पालन करनेवाले चण्डशर्मा नामसे विख्यात एक ब्राह्मण हो गये हैं, जो रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न थे। वे जब युवावस्थामें पहुँचे तब किसी वेश्यामें आसक्त हो गये। एक समय आधी रातमें वे प्याससे व्याकुल होकर उठे तो उस वेश्यासे बोले—'प्रिये! मैं पानी पीना चाहता हूँ।' तब उस वेश्याने पानीके भ्रमसे उन निद्राकुल ब्राह्मणको मदिरासे भरा हुआ पुरवा लाकर दे दिया। मुखमें मदिरा जाते ही ब्राह्मण कुपित हो उठे और उस वेश्याको बार-बार धिक्कारते हुए कड़ी फटकार

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०८१

सुनाने लगे—‘अरी पापिनी! तूने यह क्या किया। आज मदिरा पीनेसे मेरी ब्राह्मणता निश्चय ही नष्ट हो गयी; अतः मैं आत्मशुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करूँगा।’ ऐसा कहकर वे दुःखपूर्वक घरसे बाहर निकले और निर्जन वनमें जाकर करुणस्वरमें विलाप करने लगे। तत्पश्चात् प्रातःकाल होनेपर उन्होंने अपने शरीरके सब बाल बनवाकर वस्त्रसहित स्नान किया। तदनन्तर वे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी सभामें गये और उन्हें प्रणाम करके बोले—‘ब्राह्मणो! मैंने जलके धोखेसे मदिरा पी ली है, मुझे दण्ड दीजिये।’ तब उन ब्राह्मणोंने बार-बार धर्मशास्त्रका विचार करके कहा—‘ब्राह्मण यदि ज्ञान अथवा अज्ञानसे भी मदिरा पी ले तो मदिराके बराबर ही खौलता हुआ घी पी लेनेपर उसकी शुद्धि होती है; अतः यदि तुम आत्मशुद्धि चाहते हो तो यही प्रायश्चित्त करो।’ ‘बहुत अच्छा, ऐसा ही करूँगा’ ऐसी प्रतिज्ञा करके ब्राह्मणने तत्काल घी लेकर उसे पीनेके लिये आगपर तपाया। इतनेमें ही यह समाचार सुनकर उनके पिता-माता भी आ पहुँचे और बोले—‘यह क्या, यह क्या बेटा! तुम यह क्या करते हो?’

तब पुत्रने नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए रातकी सब घटना कह सुनायी। यह सब सुनकर ब्राह्मण-दम्पतिने उन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे प्रार्थना की, ‘मेरे इस पुत्रको धर्मशास्त्रका विचार करके कोई दूसरा प्रायश्चित्त बताइये।’ तब उन ब्राह्मणोंने पुनः आदरपूर्वक धर्मशास्त्रका विचार किया और इस प्रकार कहा—‘ब्रह्मन्! धर्मशास्त्रमें तो कोई दूसरा उपाय नहीं है। तुम्हें जो उचित प्रतीत हो सो करो।’ तब ब्राह्मणने पुत्रसे कहा—‘बेटा! तीर्थयात्रा करो, फिर क्रमशः अनेक प्रकारका व्रत करनेसे पवित्रताको प्राप्त होओगे।’

पुत्र बोला—महाभाग! क्या ब्राह्मणोंका बताया हुआ प्रायश्चित्त पवित्रताके लिये पर्याप्त नहीं है, जो आप व्रत आदिका उपदेश करते हैं?

पुत्रका यह निश्चय जानकर पुत्रवत्सला पिता तथा उनकी सती पत्नीने भी मृत्युका निश्चय करके प्रसन्नतापूर्वक अपना सब कुछ ब्राह्मणोंको दान कर दिया। तब माताने कहा—‘बेटा! जब हम दोनों अग्निमें प्रवेश कर जायँ उसके बाद तुम मोंजीहोम (मरणान्त प्रायश्चित्त) करना।’ ऐसा कहकर वे दम्पति प्रसन्नतापूर्वक मृत्युके लिये अग्निके समीप गये। उनके साथ ही उनका पुत्र भी था। इतनेमें ही वेदोंके पारंगत विद्वान् शाण्डिल्य मुनि तीर्थ-यात्राके प्रसंगसे उस स्थानपर आ पहुँचे और सारी बात सुनकर उन सब ब्राह्मणोंको फटकारते हुए बोले—‘अहो! तुम सब लोग अत्यन्त मूढ़ हो; क्योंकि तुम्हारे कारण सुगम प्रायश्चित्तके होते हुए भी आज ये तीन ब्राह्मण व्यर्थ ही मृत्युको प्राप्त हो रहे हैं। कृच्छ्र और चान्द्रायण आदि प्रायश्चित वहाँ दिये जाते हैं, जहाँ श्रीगंगाजी उपलब्ध न हों। यहाँ तो साक्षात् विष्णुपदी गंगा विद्यमान हैं; उसीमें यह स्नान करे तो पापसे शुद्ध हो जायगा।’

तब सब ब्राह्मणोंने शाण्डिल्य मुनिको साधुवाद देते हुए कहा—‘मुने! आपका कथन सत्य है।’ इसके बाद वे सब लोग ब्राह्मणको समझा-बुझाकर विष्णुपदी गंगाके तटपर ले गये। वहाँ ब्राह्मणने ज्यों-ही मुखमें गंगाजल डालकर कुल्ला किया, त्यों-ही वह शुद्ध हो गया। फिर जब वे उस शोभायमान जलमें स्नान करने लगे, उस समय स्पष्ट स्वरमें आकाशवाणी हुई—‘विष्णुपदीका सम्पर्क होनेसे तथा उसके जलमें स्नान और आचमन करनेसे ब्राह्मणदेवता शुद्ध हो गये हैं; अतः अब वे अपने घर लौट जायँ।’ यह सुनकर सब लोग हर्ष प्रकट करते हुए अपने-अपने घर चले गये।

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! ऐसे प्रभावशाली विष्णुपदी गंगा उस क्षेत्रकी पश्चिम सीमापर विद्यमान हैं, जो सब पापोंका नाश करनेवाली हैं।

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१०८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

हाटकेश्वर-क्षेत्रकी दक्षिणोत्तर सीमाके गोकर्णोंका परिचय, गोकर्ण और यमका संवाद, नरकवर्णन, क्षेत्रसेवनका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं— महर्षियो ! भूतलपर यमुना नदीके किनारे मथुरा नामसे विख्यात एक महापुरी है, जो अनेक ब्राह्मणोंसे भरी हुई है। वहीं पूर्वकालमें गोकर्ण नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण रहते थे, जो वेदाध्ययनसे सम्पन्न और सब शास्त्रोंके पण्डित थे। वहीं उसी नामका और उसी अवस्थाका एक दूसरा ब्राह्मण भी रहता था, जो सब विद्याओंमें पारंगत था। एक दिन यमराजने अपने दूतसे कहा—'दूत!' तुम शीघ्र मथुरा जाओ और वहाँके गोकर्ण नामक श्रेष्ठ ब्राह्मणको यहाँ ले आओ। आज दोपहरके समय उनकी आयु समाप्त हो जायगी। देखना, उसी पुरीमें उस नामके एक दूसरे ब्राह्मण भी हैं, जो दीर्घजीवी हैं; कहीं भूलसे उनको न ले आना।'

यमराजकी आज्ञासे दूत बड़े वेगसे मथुरापुरीमें पहुँचा; परंतु भ्रम हो जानेसे वह दीर्घजीवी गोकर्णको ही पकड़ लाया। तब यमराजने कुपित होकर अपने सेवकसे कहा—'पापी! तुझे धिक्कार है। तू इन दीर्घायु महात्माको ले आया! तूने यह क्या किया। इन्हें शीघ्र ही ले जाकर वहाँ पहुँचा दे; अन्यथा भय है कि बन्धु-बान्धव इनकी देहका दाह-संस्कार न कर दें।'

ब्राह्मण बोले— मैं सौभाग्यवश आपके समीप आ गया हूँ। अब वहाँ लौटकर नहीं जाऊँगा। मैं तो दरिद्रतासे कष्ट पाकर स्वयं ही सदा मृत्युकी इच्छा रखता था।

यमराजने कहा— विप्रवर! यदि पलभर भी आयु शेष हो तो मैं किसी मनुष्यको पृथ्वीसे यहाँ नहीं बुलाता, इसीलिये लोग मुझे धर्मराज कहते हैं। मैं सब प्राणियोंपर पक्षपात छोड़कर समान भाव रखता हूँ। तुम मुझसे कोई वर माँगो। किसी भी देहधारीको मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं होता।

ब्राह्मण बोले— देव! यदि मुझे अवश्य ही घर लौटकर जाना है तो मैं पूछता हूँ, उसको बताइये। वही मेरे लिये श्रेष्ठ वर होगा। पापकमी मनुष्य, जो इन भयंकर नरकोंका सेवन कर रहे हैं, इनमेंसे किस कर्मसे किसको कौन-सा नरक प्राप्त होता है?

यमराजने कहा— विप्रवर ! नरक असंख्य हैं पर उनमेंसे जो मुख्य हैं, केवल उन्हींका परिचय मैं तुम्हें कराऊँगा। यहाँ मुख्य इक्कीस नरक हैं। उनमेंसे पहला रौरव नरक है, जिसमें अत्यन्त तप्त तेलसे भरे हुए कुण्डोंमें प्राणी पकाये जा रहे हैं। इसमें दूसरोंका धन हड़पनेवाले क्षुद्र मनुष्य यातना भोगते हैं। दूसरेका नाम है महारौरव, जिसमें कृतघ्न और गुरुशय्यागामी पापात्मा दाहसे पीड़ित होकर तथा तीखी धारवाले शस्त्रोंसे छिन्न-भिन्न होकर आर्तनाद करते हैं। तीसरे भयदायक नरकका नाम अन्धतम है। जिन नराधमोंने परायी स्त्रियोंको दूषित दृष्टि देखा है, वे जब यहाँ आते हैं तब लोहेके समान मुखवाले पक्षी उनकी दोनों आँखें निकाल लेते हैं। चौथा नरक प्रतप्त नामसे विख्यात है। यहाँ भी पापी जीव यातना भोगकर शुद्ध होते हैं। जिन्होंने गुरुजनों, देवताओं तथा तपस्वियोंकी सदैव निन्दा की है, उन लोगोंकी जिह्वा यहाँ उखाड़ ली जाती है। पाँचवाँ सुप्रसिद्ध नरक विदारक नामवाला है। यहाँ मित्रद्रोही मनुष्य आरेसे चीरे जाते हैं। छठा निकुम्भ नामक नरक है, जो तपायी हुई बालूसे भरा हुआ है और स्वयं भी अग्नि-से तप रहा है। जिन मनुष्योंने पहले बिना किसी अपराधके दूसरे ब्राह्मणोंको प्राणान्तकारी कष्ट पहुँचाया है, वे यहाँ तपी हुई बालूमें भूने जाते हैं। सातवाँ नरक बीभत्सु कहलाता है। वह अत्यन्त गर्हित है। उसमें सब ओरसे मल-मूत्र आदि गंदी वस्तुएँ भरी हुई हैं। जिन दुरात्माओंने राजाके पास जाकर लोगोंकी चुगली खायी है, उनके मुँहमें ये गंदी वस्तुएँ भरकर उन्हें इसी नरकमें डाल दिया जाता है। आठवाँ अधम नरक

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०८३

कुत्सित नामसे प्रसिद्ध है। वह कफ और मूत्र आदि एवं दुर्गन्धयुक्त वस्तुओंसे भरा हुआ है। जिन्होंने गुरु, देवता, अतिथि और विशेषतः अपने कुटुम्बीजनों और सेवकोंको भोजन दिये बिना ही स्वयं भोजन किया है, वे लोग इसमें डाले जाते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! यह दुर्गम नामका नवाँ नरक है। यह तीखे काँटोंसे भरा हुआ है। इसके भीतर साँप और बिच्छू भी रहते हैं। जिन्होंने एक साथ यात्रा करनेवाले अपने भूखे-प्यासे कष्ट पाते हुए साथीको न देकर अकेले भोजन किया है, उन्हें इस नरकमें रखा जाता है। दसवें नरकका नाम दुस्सह है, जो सब ओरसे तप्त लोहमय खम्भोंसे घिरा हुआ है। जो पापी परायी स्त्रियोंमें तथा मांस-भोजनमें अनुरक्त होते हैं, उन मनुष्योंको यहाँ तप्त लोहमय खम्भोंका आलिंगन करना पड़ता है। ग्यारहवाँ नरक आकर्ष नामसे प्रसिद्ध है। यहाँ तपाये हुए सँड़से रखे रहते हैं। जो मनुष्य स्त्री, ब्राह्मण, गुरु और देवताका धन खाते हैं, उन्हें तपाये हुए सँड़सोंसे पकड़कर सब ओर खींचा जाता है। बारहवें नरकको सन्दंश कहते हैं। इसमें अभक्ष्य भक्षण करनेवाले नराधमोंको लोहेके समान दाँत और मुखवाले गीध नोच-नोचकर खाते हैं। तेरहवें नरकका नाम नियन्त्रक है। उसकी बड़ी ख्याति है। वह सब ओरसे कीटों तथा सुदृढ़ बन्धनोंसे व्याप्त है। जो पापी दूसरोंकी धरोहरको हड़प लेते हैं, वे यहाँ बन्धनोंसे कसकर बाँध दिये जाते हैं और कृमि, बिच्छू तथा कीट आदि उन्हें काटते और खाते हैं। चौदहवाँ नरक अधोमुख कहा गया है। इसका स्वरूप सब नरकोंसे अधिक भयंकर है। जो मनुष्य ब्राह्मणकी हत्या करते हैं, वे यहाँ एक वृक्षकी डालमें बाँधकर नीचे मुँह करके लटका दिये जाते हैं और नीचेसे आग प्रज्वलित करके उन्हें पकाया जाता है। पंद्रहवाँ भीषण नामवाला नरक है, जो जूँ और खटमल आदिसे भरा हुआ है। जो लोग झूठी गवाही देते या झूठ बोलते हैं, उनको तथा अन्य कुकर्मियोंको भी मैंने यहीं स्थान दे रखा है। यह सोलहवाँ नरक क्षुद्दद कहा गया है, जो चारों ओर क्षुधातुर मनुष्योंसे व्याप्त है। जिन द्विजोंने मांस भोजन किये हैं, वे यहाँ भूखसे पीड़ित होकर अपने ही शरीरको काट-काटकर खाते हैं। सत्रहवाँ क्षार नरक है, जो नमकसे भरा हुआ है। यह सब प्राणियोंके लिये बड़ा भयंकर है। जो मनुष्य व्रत भंग करनेवाले तथा पाखण्डी हैं, वे यहाँ आनेपर तीखे शस्त्रोंसे पीस डाले जाते हैं और ऊपरसे उनपर नमक छिड़का जाता है। यह अठारहवाँ नरक निदाघ नामसे प्रसिद्ध है, जो प्रज्वलित अंगारोंसे भरा है। जो मनुष्य शास्त्र, काव्य तथा ब्राह्मण-कन्याको कलंकित करते हैं, वे यहीं अंगारोंके भीतर रखे जाते हैं। उन्नीसवाँ नरक कूटशाल्मलि कहलाता है, जो सब ओरसे तीखे काँटोंसे भरा हुआ है। जो नास्तिक, मर्यादा भंग करनेवाले तथा ब्राह्मणघाती हैं, वे सब मनुष्य यहाँ सदैव चढ़ते और गिरते रहते हैं। बीसवें नरकका नाम असिपत्र वन है। जो दूसरोंके छिद्र देखते, झूठ-कपटसे भरे हुए कार्योंमें संलग्न रहते और शास्त्र बेचते हैं, वे ही इसमें आते हैं। इक्कीसवाँ नरक वैतरणी नामवाली नदी है, जिसे धर्मात्मा और पापी सभीको पार करना पड़ता है। जो मृत्युकालके समय गायकी पूँछ हाथमें लेकर उसका दान करते हैं, वे सुखपूर्वक उस नदीको पार कर जाते हैं। जो मानव गोदान किये बिना ही मर जाते हैं, उन्हें इस दुर्गम नदीको हाथोंसे ही तैरकर पार करना पड़ता है। द्विजश्रेष्ठ ! तुमने जो कुछ पूछा है, वह सब वृत्तान्त मैंने तुमसे कह दिया। अब इच्छानुसार धन लेकर घर जाओ।

**ब्राह्मण बोले—**देव ! अब यह बताइये कि कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्य नरकमें नहीं जाता।

**यमराजने कहा—**जो सदा तीर्थयात्रामें तत्पर रहता, देवता और अतिथियोंकी पूजा करता, ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति रखता तथा शरणमें आये हुएका पालन करता है, वह कभी भी नरकमें नहीं जाता। जो सर्वदा दूसरोंकी भलाईमें संलग्न रहता, हेमन्त

१०८४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

(सर्दी)-में आग तपाता, गरमीमें जल पिलाता और वर्षांमें ठहरनेके लिये स्थान देता है, वह कभी नरकका दर्शन नहीं करता है। जो व्रत और उपवासमें तत्पर, शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी तथा सदैव भगवान्‌का ध्यान करनेवाला है, वह मनुष्य भी नरकमें नहीं जाता है। जो अन्न और तिलका दान करता, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता, वेदाध्ययन करके शास्त्रके आज्ञा-पालनमें तत्पर होता, मीठे वचन बोलता तथा सदा धार्मिक चर्चा किया करता है, वह कभी नरकको नहीं देखता।

ब्राह्मण बोले—धर्मराज! यह तो एक मूर्ख भी जानता है कि शुभ कर्ममें तत्पर रहनेवाला पुरुष नरकमें नहीं जाता और पापपरायण मनुष्य स्वर्गमें नहीं जा सकता। मुझे तो सब लोकोंको सुख पहुँचानेवाला वह श्रेष्ठ व्रत, नियम, तीर्थ, जप अथवा होम आदि उपाय बताइये, जिसको स्वल्प मात्रामें करनेपर भी पापी पुरुष भी अपने पापका नाश करके शीघ्र स्वर्गलोकमें जा सके।

यमराजने कहा—द्विजश्रेष्ठ! आनर्त देशमें परम मनोहर एवं सर्वतीर्थमय शुभ हाटकेश्वरक्षेत्र है जो महापातकोंका भी नाश करनेवाला है। जो उस क्षेत्रमें पंद्रह दिन भी भक्तिपूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करता है, वह सब पापोंसे युक्त होनेपर भी भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। अतः तुम वहीं जाकर भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी आराधना करो। इससे अपनी दस पीढ़ियोंके साथ तुम मोक्ष प्राप्त करोगे।

सूतजी कहते हैं—यह उपदेश सुनकर गोकर्णजी ज्योंही अपने घरकी ओर प्रस्थित हुए त्यों ही यमदूत दूसरे गोकर्णको भी साथ लेकर वहाँ आ पहुँचा और शीघ्र ही उसने धर्मराजके सामने उसे उपस्थित किया। तब धर्मराजने प्रसन्न होकर दूतसे कहा—'तुम समय बिताकर इन ब्राह्मण देवताको यहाँ लाये हो, अतः द्वितीय गोकर्णके साथ ही इन्हें भी जल्दी छोड़ दो।' तदनन्तर वे दोनों गोकर्ण ब्राह्मण उसी क्षण एक ही साथ छोड़ दिये गये। फिर दोनोंने सहसा अपने-अपने शरीरमें प्रवेश किया। स्वस्थ होनेपर दोनोंने हाटकेश्वरतीर्थमें यथावत् तपस्या करके भगवान् शंकरकी आराधना की और उसके प्रभावसे सशरीर स्वर्गलोकमें चले गये। जो मनुष्य निष्कामभावसे वहाँ भगवान् शिवकी आराधना करता है वह मोक्षको प्राप्त होता है।

विप्रवरो! इस प्रकार मैंने तुम्हें हाटकेश्वरक्षेत्रका प्रमाण और सीमा आदिका सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। यहाँ खेती करनेवाले किसान भी परमगतिको प्राप्त होते हैं। फिर जो अपने मनको वशमें रखनेवाले शान्त, दान्त और जितेन्द्रिय साधक हैं उनके लिये क्या कहना है। मनुष्योंकी तो बात ही क्या है, उस क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त हुए कीट, पतंग, पशु-पक्षी और मृग भी निःसन्देह स्वर्गलोकमें जाते हैं। जो भगवान् जनार्दनको अपने हृदयमें स्थापित करके श्रद्धापूर्वक वहाँ रहते हैं, उनकी सद्गतिमें सन्देह ही क्या हो सकता है; अतः पूरा प्रयत्न करके सबको उस क्षेत्रका सेवन करना चाहिये।


$\sim\sim\circ\sim\sim$

सिद्धेश्वर लिंगकी महिमा तथा वत्स मुनिके द्वारा षडक्षर-मन्त्रके माहात्म्य एवं मांसाहारकी निन्दा तथा अहिंसाकी महत्ताका वर्णन

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! हाटकेश्वरक्षेत्रमें सिद्धेश्वर नामक लिंग है। उस लिंगके रूपमें वहाँ साक्षात् भगवान् शंकर स्वयं ही प्रकट हैं। वे स्मरण और दर्शन करनेसे सदा सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाले हैं। जो मनुष्य पवित्र भावसे भक्तिपूर्वक उन सिद्धेश्वरका दर्शन या स्पर्श करता है, वह दुर्लभ मनोरथको भी शीघ्र प्राप्त कर लेता है। उस क्षेत्रमें पहले स्पर्श और दर्शन करनेसे सैकड़ों पुरुष सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं और कितने ही मनुष्य केवल प्रणाम करनेसे

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध *१०८५
सिद्धि के भागी हुए हैं। पूर्वकालमें जब मैं पिताके घरमें रहता था, मेरे सामने ही एक दिन वहाँ महातेजस्वी वत्स मुनि पधारे। उस समय उनका दर्शन करके मेरे पिताजीने भक्तिभावसे उन्हें प्रणाम किया और अर्घ्य देकर विनयपूर्वक पूछा—'विप्रवर! आपका स्वागत है। आप कहाँसे आये हैं, मेरे लिये यथोचित सेवाके निमित्त आज्ञा कीजिये।'<br><br>वत्सजी बोले—सूत! मैं तुम्हारे आश्रमपर चातुर्मास्य व्रत करना चाहता हूँ। यदि तुम मेरी सेवा-शुश्रूषा करो तो यहीं चौमासा करूँ।<br><br>लोमहर्षणजीने कहा—ब्रह्मन्! मैं निःसन्देह आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।<br><br>ऐसा कहकर मेरे पिताजी मुझसे बोले—वत्स! तुम्हें प्रतिदिन इन महर्षिकी सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिये। तब मैं विनीतभावसे उनकी सेवा-टहलके सब कार्य करने लगा। वे रातमें मुझे विचित्र-विचित्र कथाएँ सुनाया करते थे। एक समय कथाके अन्तमें मैंने पूछा—भगवन्! समुद्रसहित सम्पूर्ण धरातलको आपने थोड़ी ही अवस्थामें कैसे देखा? जिन द्वीप, समुद्र तथा पर्वतोंकी चर्चा आपने की है, वहाँतक तो मनुष्य मनके द्वारा भी किसी प्रकार नहीं जा सकते। मुनीश्वर! यह किसी तपस्याका प्रभाव है अथवा मन्त्रका पराक्रम है, जिससे आपने सम्पूर्ण भूतलको देख लिया है?<br><br>वत्स मुनिने हँसकर कहा—यह तुमने ठीक समझा है। मेरे मन्त्रका ही ऐसा पराक्रम है। मैं प्रतिदिन भगवान् शिवके समीप षडक्षर मन्त्र (ॐ नमः शिवाय) का आठ हजार जप करता हूँ, इससे तीनों कालमें मेरी युवावस्था सदा स्थिर रहती है। मुझे भूत और भविष्यका ज्ञान है और मेरा जीवन सदा सुखमय बना रहता है। मेरी आयु लाखों वर्षोंकी हो गयी है, तथापि अभी प्रथम अवस्था (किशोरावस्था) ही दिखायी देती है।<br><br>एक समय मेरी स्त्रीकी मृत्यु हो जानेपर जब मैं उसके लिये शोक कर रहा था, तब मेरे सुहृदोंने मुझसे कहा—'अरे भैया! तुम शोक क्योंकरते हो? एक दिन हम सभीकी मृत्यु होनेवाली है। इसके लिये रोना क्या है। तुमने अपनी प्रियाको पहलेसे नहीं देखा था, वह अदर्शनसे ही तुम्हें प्राप्त हुई थी और अब पुनः अदर्शनावस्थाको ही चली गयी है। न वह तुम्हारी थी, न तुम उसके। फिर व्यर्थ शोक क्यों करते हो? किसीका किसीके साथ सदा एक स्थानपर निवास नहीं होता। अपने शरीरके साथ भी मनुष्य सदा नहीं रह सकता। फिर इस शरीरसे भिन्न जो दूसरे लोग हैं, उनके साथ सदा संयोग कैसे रह सकता है। जो मरे हुए सम्बन्धी, खोयी हुई वस्तु और बीती हुई बातके लिये शोक करता है, वह दुःखसे दुःख उठाता है।' इस प्रकार वे सब सुहृद् मुझे समझा-बुझाकर घर ले आये। घर आनेपर मैंने यह प्रण किया कि 'जहाँ कहीं भी सर्पको देखूँगा, वहीं उसे डंडेसे मार डालूँगा; क्योंकि मेरी स्त्रीको सर्पने ही काट खाया है।' ऐसा निश्चय करके एक समय मैं घूमता हुआ चमत्कारपुरमें पहुँचा। वहाँ एक कुण्डसे निकलकर पड़े हुए विशाल जल-सर्पको देखा। देखते ही उसे मारनेके लिये मैंने डंडा उठाया, तब उस सर्पने कहा—'पहले मेरी बात सुन लो। फिर तुम्हें जो उचित प्रतीत हो, वह करना। ब्रह्मन्! वे सर्प दूसरे ही होते हैं, जो मनुष्योंको काटते हैं। हम तो पानीके साँप हैं, हमारा केवल रूप ही साँपका होता है, हममें विष नहीं होता।' उसके इस प्रकार कहनेपर भी मैंने डंडेका प्रहार कर ही दिया। उस डंडेका स्पर्श होते ही वह एक तेजस्वी महापुरुषके रूपमें परिणत हो गया। इस आश्चर्यको देखकर मैंने उन महापुरुषसे प्रणाम करके कहा—'प्रभो! मेरा अपराध क्षमा करें, आप कौन हैं?'<br><br>तब वे प्रसन्न होकर मुझसे बोले—मेरा वृत्तान्त सुनो। मैं पहले राजा चमत्कारके बनवाये हुए उत्तम नगरमें एक ब्राह्मण था। वहाँ भगवान् सिद्धेश्वरजीका एक उत्तम शिवालय है। किसी समय वहाँ यात्राका महोत्सव था। उस अवसरपर