भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1098

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०६९

इसी समय आनर्तदेशके राजा चमत्कार वहाँ वनमें दुष्ट मृगोंका शिकार खेलनेके लिये आये। उन्होंने देखा, कुछ दूरपर एक वृक्षके नीचे एक मृगी स्थिर होकर खड़ी है और निर्भय होकर अपने बच्चेको दूध पिला रही है। उसे देखकर राजाने कानतक धनुषको खींचा और उसके मर्मस्थानपर बाणका प्रहार किया। उस बाणसे घायल होकर वह मृगी व्यथासे पीड़ित हो चारों ओर देखने लगी। इतनेमें ही थोड़ी दूरपर धनुष धारण किये राजाको देखकर उसने कहा—‘राजन्! यह तुमने बड़ा अनुचित कार्य किया, जो कि छोटे बच्चेकी माता मुझ दीन हरिणीका वध किया। मैं अपनी मृत्युके लिये उतना शोक नहीं करती, जैसा कि इस दूध पीते दीन मृगछौनेके लिये मुझे दुःख हो रहा है। तुमने बड़ा निर्दय कर्म किया है, इसलिये तुम इसी समय कोढ़ी हो जाओ।’

राजा बोले—शिकार खेलना तो राजाओंका धर्म है, अतः अपने धर्ममें तत्पर हुए मुझ निर्दोषको तुझे शाप नहीं देना चाहिये।

मृगी बोली—भूपाल! तुम्हारा कहना ठीक है, परंतु शिकारमें भी क्षत्रियोंके लिये यह विधान है कि जो सोया हो, मैथुनमें आसक्त हो, बच्चेको दूध पिला रहा हो या स्वयं जल पीता हो—ऐसे हिंसक पशुका वध न करे उसका वध करनेपर मनुष्य पापसे लिप्त होता है। इसीलिये मैंने तुझे शाप दिया है।

ऐसा कहकर व्यथासे पीड़ित हुई मृगीने अपने प्राणोंको त्याग दिया और राजा चमत्कार भी कोढ़ी हो गये। अपने शरीरको कोढ़युक्त देखकर दुःखी हुए राजाने सेवकोंको बुलाकर कहा—‘अब मैं तबतक तपस्या और भगवान् शिवकी पूजा करूँगा जबतक कि मेरे इस कुष्ठरोगका सर्वथा नाश न हो जाय।’ ऐसा कहकर उन्होंने अपने सभी सेवकोंको विदा कर दिया।

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शंखतीर्थकी उत्पत्ति, उसमें स्नानसे राजा चमत्कारके कुष्ठरोगकी निवृत्ति और राजाका ब्राह्मणोंके लिये श्रेष्ठ नगर निर्माण कराकर दान देना

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर राजा चमत्कार तपस्यामें तत्पर हो भिक्षान्नका नियमित आहार करते हुए प्रभास आदि सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें भ्रमण करने लगे, परंतु उन्हें कहीं कोई ऐसा मन्त्र, ओषधि या तीर्थ नहीं प्राप्त हुआ जिससे उनके रोगका भलीभाँति निवारण हो जाय। इससे राजाके मनमें बड़ा वैराग्य हुआ और वे अपने मन और बुद्धिको वशमें करके उस पुण्यक्षेत्रमें अकेले रहने लगे। वे अपने-आप गिरे हुए सूखे पत्ते चबाते और रातमें भूमिपर सोते थे। मद और अहंकार तो उन्हें छू भी नहीं गये थे। तदनन्तर कुछ कालके बाद उन्होंने तीर्थयात्राके लिये जानेवाले बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको देखा और उन सबको विनीत भावसे प्रणाम करके कहा—‘विप्रवरो! मैं आनर्तदेशका सूर्यवंशी राजा हूँ। मेरा नाम चमत्कार है। इस समय मेरे सारे शरीरमें कोढ़ फैल गयी है। क्या यहाँ ऐसा कोई दैव या मानवी उपाय है जिससे मेरा कुष्ठरोग शान्त हो जाय? यदि है तो आपलोग मुझपर कृपा करके बतावें।’

तब उन दयालु ब्राह्मणोंने कहा—नृपश्रेष्ठ! यहाँसे थोड़ी ही दूरपर सुप्रसिद्ध शंखतीर्थ है, जो सब रोगोंका नाश करनेवाला है। जो मनुष्य रोगग्रस्त, काने, अन्धे, मूर्ख, किसी अंगसे हीन या अधिक अंगवाले कुरूप और विकृत मुखवाले हैं, वे भी चैत्रमासके कृष्णपक्षकी* आदितिथि (चैत्रपूर्णिमा)—को चित्रा नक्षत्रके योगमें वहाँ स्नान करके उपवास


* यहाँ शुक्लपक्षसे मासका आरम्भ और अमावास्याको मासकी समाप्ति समझनी चाहिये। अतः जहाँ कृष्ण पक्षसे मासका आरम्भ माना जाता है, उनकी दृष्टिसे यह चैत्रका कृष्णपक्ष वास्तवमें वैशाखका कृष्णपक्ष है।