संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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और वहाँ जिस बिलके मार्गसे नागलोग इस पृथ्वीपर आते-जाते हैं उसी मार्गसे तुम भी पातालमें प्रवेश करो और वहाँ पातालगंगामें स्नान करके हाटकेश्वर महादेवकी पूजा करो। इससे तुम अवश्य ही पापसे मुक्त हो जाओगे।'
यह आकाशवाणी सुनकर इन्द्र शीघ्र ही उस क्षेत्रमें गये और नागबिलके मार्गसे पातालमें प्रवेश करके वहाँकी गंगामें स्नान किया। स्नानके पश्चात् हाटकेश्वर लिंगका पूजन किया। इससे क्षणमात्रमें उनका शरीर निर्मल हो गया और तेज बढ़ गया। इसी समय ब्रह्मा-विष्णु आदि सब देवता वहाँ आये और अत्यन्त प्रसन्न हो पापमुक्त इन्द्रसे इस प्रकार बोले—'देवराज! तुम ब्रह्महत्यासे मुक्त होकर परम पवित्र हो गये हो। अतः आओ, हम साथ ही स्वर्गलोकको चलें।' तदनन्तर सब देवता स्वर्गलोकको चले गये। इन्द्रको पुनः देवताओंका राज्य प्राप्त हुआ और स्वर्गमें वृत्रासुरके मारे जानेसे बड़ा भारी उत्सव मनाया गया।
जो कोई मनुष्य एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक इस प्रसंगका कीर्तन और श्रवण करता है वह जरा-मृत्युसे रहित परमधामको प्राप्त होता है।
सूतजी कहते हैं—तदनन्तर देवगुरु बृहस्पतिजीने इन्द्रसे कहा—'देवराज! पृथ्वीपर हिमालय नामसे विख्यात एक पर्वत है। उसके तीन पुत्र हैं—मैनाक, नन्दिवर्धन और रक्तशृंग। उनमेंसे तीसरे पुत्र रक्तशृंगको ले आओ और उसीके द्वारा नागलोकके इस बिलको भर दो।'
बृहस्पतिजीका यह वचन सुनकर इन्द्र हिमालय पर्वतपर गये। वहाँ उन्होंने हिमाचलसे उनके पुत्रको माँगा। हिमाचलने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और पुत्रको उनके साथ जानेकी आज्ञा दे दी। तब रक्तशृंग बोला—'पिताजी! मेरे दोनों पंख इन्हीं इन्द्रने काट डाले हैं। अतः अब मुझमें यहाँसे जानेकी शक्ति नहीं है। ये मुझे ले जानेका विचार छोड़कर कोई दूसरा उपाय सोचें।'
इन्द्र बोले—रक्तशृंग! मैं तुम्हें अपने हाथपर रखकर ले चलूँगा। वहाँ भी तुम्हारे ऊपर हरे-भरे शोभासम्पन्न वृक्ष उत्पन्न होंगे। तुम्हारे सब ओर पुण्यतीर्थ एवं देवमन्दिर बनेंगे। मुनियोंके आश्रम बनेंगे। उस भूमिमें पापी पुरुष भी तुम्हारा दर्शन पाकर तृप्त हो जायेंगे। इसलिये तुम मेरे साथ शीघ्र चले चलो। यदि आनाकानी करोगे तो इस वज्रसे तुम्हारे सैकड़ों टुकड़े कर दूँगा।
इन्द्रकी यह बात सुनकर रक्तशृंग डर गया और सहसा वहाँ जाकर उस नागबिलमें घुस गया। इस प्रकार हिमवान्कुमार रक्तशृंगको उस बिलपर बिठाकर इन्द्रने कहा—'तुम मुझसे कोई वर ग्रहण करो।'
पर्वत बोला—देवेश! मेरे लिये यही वरदान है कि मुझपर आप सन्तुष्ट हैं। मैं आपके प्रसादसे सुखी हूँ।
इन्द्र बोले—स्वप्नावस्थामें भी मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं जाता, फिर साक्षात् दर्शन होनेपर कैसे निरर्थक होगा।
रक्तशृंगने कहा—देवराज! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं तो यही वर दें कि मेरा सम्पूर्ण ऐश्वर्य सदा ब्राह्मणोंके ही काम आये।
इन्द्र बोले—चमत्कार नामसे विख्यात एक राजा होंगे, जो तुम्हारे शिखरपर ब्राह्मणोंके रहनेके लिये एक नगर स्थापित करेंगे। उस नगरमें वेद-वेदांगोंके पारगामी विद्वान् (नागर) ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक रहकर तुम्हारे सम्पूर्ण ऐश्वर्यका उपभोग करेंगे तथा चैत्र कृष्णा चतुर्दशीको मैं स्वयं तुम्हारे शिखरपर आकर हाटकेश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिवकी पूजा करूँगा। इससे त्रिलोकमें तुम्हारे प्रभावका विस्तार होगा। अच्छा, अब मैं स्वर्गको जाऊँगा। तुम्हारा कल्याण हो।
ऐसा कहकर देवराज इन्द्र स्वर्गमें चले आये तथा रक्तशृंग उस नागबिलको ढककर स्थित हुआ। उसके शिखरपर मुख्य-मुख्य तीर्थ और मन्दिर स्थापित हो गये और मुनियोंके भी बहुत-से आश्रम बन गये।