भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1096

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०६७


दुगुने भासित होने लगे। इस प्रकार आकाशमें सभी ग्रह, नक्षत्र द्विगुण हो एक-दूसरेसे स्पर्धा रखकर लोगोंके मनमें भ्रम उत्पन्न करने लगे। यह देख इन्द्र सब देवताओंके साथ ब्रह्माजीके पास गये और प्रणाम करके बोले—‘सुरश्रेष्ठ! इस समय विश्वामित्रजीने सृष्टिरचना प्रारम्भ की है। अतः जबतक उनकी सृष्टिसे यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त न हो जाय, तबतक ही आप स्वयं जाकर उन्हें रोकिये।’ तब ब्रह्माजी मुनिवर विश्वामित्रके पास गये और इस प्रकार बोले—‘ब्रह्मर्षे! तुम मेरे कहनेसे सृष्टि-रचनाका कार्य बंद करो।’

विश्वामित्रजी बोले—यदि नृपश्रेष्ठ त्रिशंकु इसी शरीरसे आपके लोकमें चले जायें, तो मैं नयी सृष्टि नहीं करूँगा।

ब्रह्माजीने कहा—मुनीश्वर! मुझे स्वीकार है, ये राजा त्रिशंकु इसी शरीरसे मेरे साथ स्वर्गलोकमें चलें। तुम सृष्टिरचनासे मुक्त हो जाओ।

ऐसा कहकर ब्रह्माजी त्रिशंकुको साथ लेकर चले गये और महर्षि विश्वामित्र हर्षमें भरकर वहीं टिके रहे।

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नागबिलका महत्त्व, इन्द्रकी ब्रह्महत्यासे मुक्ति, रक्तशृंग-पर्वतके द्वारा नागबिलका भरा जाना और मृगीके शापसे राजा चमत्कारका कोढ़ी होना

सूतजी कहते हैं—तबसे लेकर स्थान तीनों लोकोंमें उत्तम तीर्थके रूपमें विख्यात हुआ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पदार्थोंके देनेवाला है। जो मनुष्य श्रद्धायुक्त चित्तसे वहाँ रहकर मृत्युको प्राप्त होता है, वह पापाचारी हो तो भी मोक्षको प्राप्त होता है। कीट, पक्षी, पतंग, पशु और मृग आदि जितने जन्तु हैं, वे भी वहाँ मरनेपर निश्चय ही भगवान् शिवके लोकमें जाते हैं। जो श्रद्धासे पवित्र किये हुए मनके द्वारा वहाँ स्नान करते हैं वे स्वर्गलोकमें जाते हैं। तदनन्तर विश्वामित्र मुनिने उस तीर्थका उत्तम माहात्म्य देखकर कुरुक्षेत्र छोड़कर वहीं निवास किया तथा अन्यान्य शान्त स्वभाववाले मुनि भी दूसरे तीर्थोंको त्यागकर बहुत दूर-दूरसे वहाँ आ गये और वहीं आश्रम बनाकर रहने लगे। इस प्रकार उस तीर्थके प्रभावसे सब मनुष्य स्वर्गको जाने लगे। तब कोई भी न यज्ञ करता था, न व्रत; न दान देता और न दूसरे किसी तीर्थका सेवन ही करता था। केवल उसी तीर्थमें एकाग्रचित्त होकर लोग स्नान करते और उत्तम विमानपर चढ़कर स्वर्गलोकमें चले जाते थे। उस समय स्वर्गलोक मनुष्योंसे भर गया। श्रेष्ठ देवताओंसे स्पर्धा करनेवाले मनुष्योंद्वारा स्वर्गको भरपूर हुआ देख संवर्तक वायुने इन्द्रकी आज्ञा पाकर पृथ्वीतलपर स्थित उस हाटकेश्वर-क्षेत्रको चारों ओरसे धूलसे आच्छादित कर दिया। इस प्रकार वह तीर्थभूमि केवल स्थलमात्र रह गयी। उसके बाद सर्वत्र यज्ञादि सत्कर्म होने लगे।

तदनन्तर पातालसे नागलोग बिलके मार्गसे मर्त्यलोकमें आते, पृथ्वीपर सब ओर घूमते और यहाँके भोगोंका इच्छानुसार उपभोग करके फिर उसी मार्गसे अपने निवासस्थानको लौट जाते थे। इससे वह स्थान इस पृथ्वीपर नागबिलके नामसे विख्यात हुआ।

एक समय वज्रके द्वारा वृत्रासुरका वध करनेसे इन्द्रको ब्रह्महत्या लग गयी थी, तब उनको इसका बड़ा दुःख हुआ। इस प्रकार दुःखको प्राप्त हुए इन्द्र एक पर्वतपर चढ़कर मृत्युका निश्चय करके वहाँसे अपने शरीरको नीचे गिराना ही चाहते थे कि आकाशवाणी सुनायी दी—‘इन्द्र! ऐसा दुःसाहस न करो, इस पातकसे शुद्ध होनेके लिये सावधान होकर उपाय सुनो। हाटकेश्वरक्षेत्रमें, जहाँ भगवान् शिव स्वयं विराजमान हैं, जाओ