भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1099, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1099
१०७०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करनेपर उसी क्षण रोगसे रहित हो जाते हैं।

राजाने पूछा— विप्रवरो! शंखतीर्थका ज्ञान मुझे जैसे हो और उसकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई है। यह सब आपलोग विस्तारपूर्वक बतावें।

ब्राह्मण बोले— राजन्! पूर्वकालमें इस पृथ्वीपर लिखित नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ मुनि रहते थे। वे शिण्डिलमुनिके पुत्र थे। उनके छोटे भाईका नाम शंख था। शंख भी अपने बड़े भाईकी भाँति धर्मशास्त्रके ज्ञाता थे और कन्द, मूल, फलका आहार करते हुए सदैव तपस्यामें संलग्न रहते थे। एक दिन शंख भूखसे अत्यन्त पीड़ित होकर लिखितके आश्रमपर गये। महात्मा लिखितका आश्रम सूना था तो भी 'ये फल अपने ही हैं' ऐसा मानकर शंखने बहुत-से फल तोड़ लिये और उन्हें खा लिया। इसी समय लिखित अपने शिष्यके साथ वहाँ आये और शंखको फल लिये हुए देखकर क्रोधपूर्वक बोले—'तुमने मेरे दिये बिना ही ये फल कैसे ले लिये? क्या तुम यह नहीं समझते कि इस प्रकार बिना पूछे लेनेसे चोरीरूप दोषसे बँध जाना पड़ता है?'

शंख बोले— द्विजश्रेष्ठ! आपने जो कुछ कहा है, वह सत्य है। मैंने आपके सूने आश्रममें ये फल लिये हैं, अतः मेरे लिये चोरीका उचित दण्ड दीजिये जिससे मेरा इहलोक और परलोक दोनों सुखद हो।

तब लिखितने उसी क्षण अपने भाई शंखके दोनों हाथ कटवा दिये। हाथ कट जानेपर शंख अपने आश्रममें लौट आये। वहाँ उन्होंने पुनः बड़ी घोर तपस्या की। इससे सन्तुष्ट होकर महादेवजीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'ब्रह्मन्! तुम मनोवांछित वर माँगो।'

शंख बोले— देव! मेरे दोनों हाथ पुनः पूर्ववत् हो जायें और यह तीर्थ मेरे नामसे प्रसिद्ध हो। जो कोई अंगहीन, अधिकांग अथवा रोगग्रस्त यहाँ स्नान करे वह शीघ्र ही फिरसे नवीन हो जाय—नूतन निर्दोष शरीर प्राप्त कर ले।

भगवान् शिवने कहा— विप्रेन्द्र! आजसे यह तीर्थ तुम्हारे नामसे विख्यात होगा। चैत्रमासके शुक्लपक्षमें जब चन्द्रमा चित्रा नक्षत्रपर स्थित हों, उस समय जो कोई न्यूनांग या अधिकांग मनुष्य भी यहाँ स्नान करेगा, वह सुवर्णके समान गौर और सर्वांगसुन्दर हो जायगा। उस दिन वहाँ श्राद्ध करनेसे पितरलोग उत्तम तृप्तिको प्राप्त होंगे। विप्रवर! आज चैत्रमासका शुक्लपक्ष है। आज तीसरे पहर चन्द्रमाका चित्रा नक्षत्रसे योग हो जायगा। उस समय उपवासपूर्वक भलीभाँति स्नान करनेपर तुम्हारे दोनों हाथ तत्काल पूर्ववत् सुन्दररूपसे युक्त हो जायेंगे।

ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये और शंखमुनिने कुतप काल (दिनके तीसरे पहर)-में स्नान किया। स्नान करते ही उनके दोनों हाथ पूर्ववत् हो गये।

नृपश्रेष्ठ! इसलिये तुम भी चैत्र शुक्लपक्षमें, जब चन्द्रमा चित्रा नक्षत्रपर स्थित हों, उस तीर्थमें स्नान करो। इससे तुम सब रोगोंसे मुक्त हो जाओगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इस तीर्थके लिये जो समय और योग बताया गया है, उसके प्राप्त होनेपर हम साथ चलकर तुमको उस तीर्थका दर्शन करायेंगे।

सूतजी कहते हैं— तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद चैत्र शुक्लपक्ष आया और चित्रानक्षत्रमें चन्द्रमाके योगसे युक्त चतुर्दशी तिथि प्राप्त हुई तब वे राजाके हितैषी ब्राह्मण उन्हें साथ लेकर उसी समय शंखतीर्थमें गये। वहाँ राजाने अपने मनमें कुष्ठरोगके नाशका संकल्प लेकर बड़ी श्रद्धा-भक्तिसे विधिपूर्वक स्नान किया। स्नान करते ही वे कुष्ठरोगसे मुक्त एवं तेजस्वी हो गये और बड़े हर्षके साथ तीर्थके जलसे बाहर निकले, फिर उन ब्राह्मणोंको प्रणाम करके राजाने हाथ जोड़कर कहा—'विप्रवरो! आपलोगोंके प्रसादसे ही मैं इस कुष्ठरोगसे मुक्त हुआ हूँ। अब मैं राज्य नहीं करूँगा। इसी तीर्थमें रहकर सदा उत्तम तप करूँगा।

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