भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1100

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०७१

यह राज्य, देश, हाथी, घोड़ा तथा और जो भी कुछ वैभव मेरे अधीन है, वह सब मुझपर अनुग्रह करनेके लिये ही कृपापूर्वक आपलोग ग्रहण करें।'

ब्राह्मण बोले—नृपश्रेष्ठ! हमलोग राज्यकी रक्षा करनेमें असमर्थ हैं। फिर उसे लेनेसे क्या लाभ हुआ, जिससे राज्यमें बड़ा भारी विप्लव मच जाय। पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुरामने इक्कीस बार इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे हीन करके हम ब्राह्मणोंको सौंप दिया था, परंतु बलवान् क्षत्रियोंने फिर समस्त ब्राह्मणोंका तिरस्कार करके अनायास ही बार-बार इसे छीन लिया था।

राजाने कहा—विप्रवरो! मैं तपस्यामें स्थित होकर भी आपलोगोंकी रक्षा करता रहूँगा, अतः इस कार्यमें आप लोगोंको किसी प्रकार भय नहीं मानना चाहिये।

ब्राह्मण बोले—यदि आपके मनमें हमें कुछ देनेकी दृढ़ श्रद्धा है, तो इस महापुण्यमय क्षेत्रमें एक श्रेष्ठ नगरका निर्माण कराके उसे दे दें। वह श्रेष्ठ नगर चहारदीवारी और खाईसे घिरा हुआ हो, जिससे हम वहाँ सुखपूर्वक रहें और तीर्थस्नान किया करें। हम सब लोग सदा वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर और गृहस्थधर्मका पालन करनेवाले हैं, अतः हमें गृहकी आवश्यकता है।

यह सुनकर राजाने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और उस स्थानमें एक बहुत बड़े नगरका निर्माण कराया। नगरके चारों ओर ऊँची-ऊँची चहारदीवारी और गहरी खाई तैयार करायी गयी। उस मनोहर नगरकी लंबाई और चौड़ाई एक कोसकी थी। इस प्रकार उत्तम नगरका निर्माण हो जानेपर उन राजाने ब्राह्मणोंके पैर धोये और जो जैसी-जैसी योग्यतावाले थे, उन्हें वैसे ही गृह शास्त्रोक्तविधिसे दान किये।

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राजा चमत्कारकी तपस्यासे सन्तुष्ट हुए शिवका अचलेश्वररूपसे निवास और रक्तशृंग पर्वतकी परिक्रमा आदिका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको वह उत्तम नगर दान करके राजा चमत्कार कृतकृत्य हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने अपने पुत्र-पौत्र तथा सेवकोंको बुलाकर कहा—'मैंने यह नगर बनवाकर ब्राह्मणोंको निवेदन किया है। अतः तुमलोगोंको मेरी आज्ञासे इस नगरकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये, जिससे सब ब्राह्मण यहाँ सन्तुष्टचित्त एवं सुखी रह सकें। जो राजा भक्तियुक्त होकर इन सब ब्राह्मणोंका पालन करेगा, वह इस भूतलपर महान् तेज प्राप्त करेगा। ब्राह्मणोंके प्रसादसे और मेरे वचनसे वह दीर्घायु एवं नीरोग रहेगा। इसके विपरीत जो कोई इनके प्रति द्वेष रखकर इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको कष्ट पहुँचायेगा, वह निश्चय ही नरकमें पड़ेगा।' ऐसा कहकर राजा चमत्कार तपस्यामें तत्पर हो गये। उनके पुत्र-पौत्र आदिने भी उनकी दी हुई शिक्षाके अनुसार ही बर्ताव किया।

पुत्रोंको राज्य और ब्राह्मणोंको नगर देकर राजाने अपने लिये शंखतीर्थमें आश्रम बनाया और वहीं रहकर बड़ी श्रद्धाके साथ देवाधिदेव महेश्वरकी आराधना की। उनकी आराधनासे प्रसन्न होकर महादेवजीने प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'राजन्! मुझसे मनोवांछित वर माँगो।'

राजा बोले—प्रभो! अनेक तीर्थोंका आश्रयभूत यह पुण्यतम क्षेत्र आप भगवान् हाटकेश्वरके माहात्म्यसे सब पापोंको नाश करनेवाला है। सम्पूर्ण देवताओंके अधीश्वर! मैंने श्रद्धायुक्त पवित्रचित्तसे इस उत्तम नगरका निर्माण कराके इसे ब्राह्मणोंकी सेवामें समर्पित किया है। इस नगरमें आप अपने समस्त पार्षदगणोंके साथ सदा अचलरूपसे निवास करें।

भगवान् शिवने कहा—राजन्! मैं इस नगरमें अचल होकर निवास करूँगा, अतएव तीनों लोकोंमें अचलेश्वर नामसे मेरी ख्याति होगी। जो मनुष्य यहाँ स्थित हुए मेरे स्वरूपका भक्तिपूर्वक दर्शन करेगा, उसके यहाँ सम्पूर्ण देवताओंकी विभूतियाँ अविचलरूपसे निवास करेंगी। जो माघमासके