संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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शुक्लपक्षकी चतुर्दशीमें श्रद्धापूर्वक मेरे लिंगमय विग्रहको घृतसे स्नान करायेगा उसका समस्त पाप सूर्योदयसे अन्धकारकी भाँति नष्ट हो जायगा। अतः भूपाल! तुम यहीं मेरे लिंगमय स्वरूपकी स्थापना करो, मैं यहाँ अचलरूपसे निवास करूँगा।
ऐसा कहकर देवेश्वर शिव अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर राजाने शीघ्रतापूर्वक एक परम मनोहर मन्दिर तैयार कराया और उसमें शिवलिंगको स्थापित किया। उसके दर्शन, स्पर्श, ध्यान और पूजनसे मनुष्य जन्मसे लेकर मृत्युतकके पापोंसे मुक्त हो जाता है। शिवलिंगकी स्थापना हो जानेपर आकाशवाणी हुई, 'नृपश्रेष्ठ! मैं इस लिंगमें नित्य, निरन्तर निवास करूँगा। मेरे इस विग्रहकी छाया सदा अचल होगी। वह केवल पृष्ठभागकी ओर रहेगी, दूसरी किसी दिशामें स्थित न होगी।'
तत्पश्चात् राजाने सब दिशाओंमें सूर्यके स्थित होनेपर उस शिवलिंगकी छायाको सदा एक ही रूपसे अविचल देखा। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने भूमिमें मस्तक रखकर उस शिवलिंगको प्रणाम करके अपने-आपको कृतार्थ माना।
सूतजी कहते हैं—'महर्षियो! आज भी उस शिवलिंगकी छाया वैसी ही दिखायी देती है जो सबको विस्मयमें डालनेवाली है। जिसकी मृत्यु छः महीनेके भीतर ही होनेवाली है। वह उस छायाको नहीं देख पाता। उस क्षेत्रमें रहनेवाले सब मनुष्य भगवान् अचलेश्वरके माहात्म्यसे सम्पूर्ण मनोवांछित फलको पाते हैं।'
महर्षियो! उस तीर्थमें चैत्र कृष्ण चतुर्दशीको ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सब देवता, सम्पूर्ण तीर्थ, सभी मन्दिर, नदी और समुद्र आदि जो भी पवित्र करनेवाली शक्तियाँ हैं वे सब उपस्थित होती हैं। जिस समय इन्द्र रक्तश्रृंग पर्वतको उस प्रदेशमें ले आये थे उसी समय उन्होंने यह कह दिया था कि तुम्हारे समीप सब देवता आवेंगे; इसलिये उस समय एक बार उस पर्वतकी प्रदक्षिणा कर लेनेपर उत्तम कल्याणकी प्राप्ति होती है। उस दिन वहाँ जो कुछ भी आदरपूर्वक दान किया जाता है, वह सूर्य और चन्द्रमाके स्थितिकालतक अक्षय पुण्य देनेवाला होता है। जो कोई मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक उत्तम अन्नसे ब्राह्मणोंको भोजन कराता है उसे गयातीर्थका फल प्राप्त होता है। जो जिस कामनाका चिन्तन करते हुए उस पर्वतकी परिक्रमा करता है वह उसी कामनाको पाता है और जो निष्कामभावसे परिक्रमा करता है वह मोक्षका भागी होता है। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि वे सब कार्य छोड़कर प्रयत्नपूर्वक रक्तश्रृंग पर्वतके समीपकी भूमिका सेवन करें। ब्राह्मणो! भगवान् हाटकेश्वरका वह क्षेत्र स्मरण करनेसे भी मनुष्यको पवित्र कर देता है; फिर दर्शन और स्पर्शसे पवित्र कर दे इसके लिये तो कहना ही क्या है?
## चमत्कारपुरमें गयाशीर्षतीर्थकी महिमा—राजा विदूरथके द्वारा तीन प्रेतोंका उद्धार
सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! उस क्षेत्रकी लंबाई-चौड़ाई पाँच कोसकी है। उसके पूर्वमें गयाशीर्ष, पश्चिममें नृसिंहजीका स्थान और दक्षिण तथा उत्तरमें गोकर्णेश्वर शिव हैं। पहले वह हाटकेश्वरक्षेत्र कहलाता था। आगे चलकर वही संसारमें सर्वपातकनाशक उत्तम तीर्थके रूपमें विख्यात हुआ। राजा चमत्कारने जबसे वह स्थान ब्राह्मणोंको दे दिया, तबसे उन्हींके नामसे उसकी प्रसिद्धि हुई—लोग उसे चमत्कारपुर कहने लगे।
पूर्वकालमें विदूरथ नामसे प्रसिद्ध एक हैहयवंशी राजा हो गये हैं, जो बड़े-बड़े यज्ञ करनेवाले, दानपति तथा प्रत्येक कार्यमें दक्ष थे। एक समय