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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

१०७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

शुक्लपक्षकी चतुर्दशीमें श्रद्धापूर्वक मेरे लिंगमय विग्रहको घृतसे स्नान करायेगा उसका समस्त पाप सूर्योदयसे अन्धकारकी भाँति नष्ट हो जायगा। अतः भूपाल! तुम यहीं मेरे लिंगमय स्वरूपकी स्थापना करो, मैं यहाँ अचलरूपसे निवास करूँगा।

ऐसा कहकर देवेश्वर शिव अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर राजाने शीघ्रतापूर्वक एक परम मनोहर मन्दिर तैयार कराया और उसमें शिवलिंगको स्थापित किया। उसके दर्शन, स्पर्श, ध्यान और पूजनसे मनुष्य जन्मसे लेकर मृत्युतकके पापोंसे मुक्त हो जाता है। शिवलिंगकी स्थापना हो जानेपर आकाशवाणी हुई, 'नृपश्रेष्ठ! मैं इस लिंगमें नित्य, निरन्तर निवास करूँगा। मेरे इस विग्रहकी छाया सदा अचल होगी। वह केवल पृष्ठभागकी ओर रहेगी, दूसरी किसी दिशामें स्थित न होगी।'

तत्पश्चात् राजाने सब दिशाओंमें सूर्यके स्थित होनेपर उस शिवलिंगकी छायाको सदा एक ही रूपसे अविचल देखा। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने भूमिमें मस्तक रखकर उस शिवलिंगको प्रणाम करके अपने-आपको कृतार्थ माना।

सूतजी कहते हैं—'महर्षियो! आज भी उस शिवलिंगकी छाया वैसी ही दिखायी देती है जो सबको विस्मयमें डालनेवाली है। जिसकी मृत्यु छः महीनेके भीतर ही होनेवाली है। वह उस छायाको नहीं देख पाता। उस क्षेत्रमें रहनेवाले सब मनुष्य भगवान् अचलेश्वरके माहात्म्यसे सम्पूर्ण मनोवांछित फलको पाते हैं।'

महर्षियो! उस तीर्थमें चैत्र कृष्ण चतुर्दशीको ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सब देवता, सम्पूर्ण तीर्थ, सभी मन्दिर, नदी और समुद्र आदि जो भी पवित्र करनेवाली शक्तियाँ हैं वे सब उपस्थित होती हैं। जिस समय इन्द्र रक्तश्रृंग पर्वतको उस प्रदेशमें ले आये थे उसी समय उन्होंने यह कह दिया था कि तुम्हारे समीप सब देवता आवेंगे; इसलिये उस समय एक बार उस पर्वतकी प्रदक्षिणा कर लेनेपर उत्तम कल्याणकी प्राप्ति होती है। उस दिन वहाँ जो कुछ भी आदरपूर्वक दान किया जाता है, वह सूर्य और चन्द्रमाके स्थितिकालतक अक्षय पुण्य देनेवाला होता है। जो कोई मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक उत्तम अन्नसे ब्राह्मणोंको भोजन कराता है उसे गयातीर्थका फल प्राप्त होता है। जो जिस कामनाका चिन्तन करते हुए उस पर्वतकी परिक्रमा करता है वह उसी कामनाको पाता है और जो निष्कामभावसे परिक्रमा करता है वह मोक्षका भागी होता है। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि वे सब कार्य छोड़कर प्रयत्नपूर्वक रक्तश्रृंग पर्वतके समीपकी भूमिका सेवन करें। ब्राह्मणो! भगवान् हाटकेश्वरका वह क्षेत्र स्मरण करनेसे भी मनुष्यको पवित्र कर देता है; फिर दर्शन और स्पर्शसे पवित्र कर दे इसके लिये तो कहना ही क्या है?


## चमत्कारपुरमें गयाशीर्षतीर्थकी महिमा—राजा विदूरथके द्वारा तीन प्रेतोंका उद्धार

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! उस क्षेत्रकी लंबाई-चौड़ाई पाँच कोसकी है। उसके पूर्वमें गयाशीर्ष, पश्चिममें नृसिंहजीका स्थान और दक्षिण तथा उत्तरमें गोकर्णेश्वर शिव हैं। पहले वह हाटकेश्वरक्षेत्र कहलाता था। आगे चलकर वही संसारमें सर्वपातकनाशक उत्तम तीर्थके रूपमें विख्यात हुआ। राजा चमत्कारने जबसे वह स्थान ब्राह्मणोंको दे दिया, तबसे उन्हींके नामसे उसकी प्रसिद्धि हुई—लोग उसे चमत्कारपुर कहने लगे।

पूर्वकालमें विदूरथ नामसे प्रसिद्ध एक हैहयवंशी राजा हो गये हैं, जो बड़े-बड़े यज्ञ करनेवाले, दानपति तथा प्रत्येक कार्यमें दक्ष थे। एक समय
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १०७३ ---|---

राजा विदूरथ अपनी सेनाके साथ हिंसक पशुओंसे भरे हुए वनमें शिकार खेलनेके लिये गये। वहाँ उन्होंने सर्पोंके समान विषैले बाणोंसे कितने ही चीता, शम्बर तथा व्याघ्र और सिंह आदि पशुओंको मारा। उन वन-जन्तुओंमेंसे एक पशु उनके बाणसे घायल होकर भी धरतीपर नहीं गिरा। बाण लिये जोरसे भागा। राजाने भी कौतूहलवश उसके पीछे अपना घोड़ा दौड़ाया। इस प्रकार वे अपनी सेनाको छोड़कर दूसरे घोर वनमें जा पहुँचे जो मनमें भय उत्पन्न करनेवाला था। उसमें प्रायः काँटेदार वृक्ष भरे हुए थे। वहाँकी सारी भूमि रूखी, पथरीली तथा जलसे हीन थी। उस वनमें जाकर राजा विदूरथ भूख और प्याससे व्याकुल हो गये और उस दुर्गम वनका अन्त ढूँढ़ते हुए अपने घोड़ेको कोड़ेसे पीट-पीटकर हाँकने लगे। घोड़ा हवासे बाते करने लगा और उसने राजाको सब जन्तुओंसे रहित दूरस्थ दुर्गम मार्गमें पहुँचा दिया। अन्तमें वह अश्व भी भूमिपर गिर पड़ा।

तदनन्तर भूख-प्याससे व्याकुल राजा उस वनके भीतर पैदल ही चलने लगे और एक जगह लड़खड़ाकर गिर पड़े। इतनेमें ही उन्होंने आकाशमें अत्यन्त भयंकर तीन प्रेत देखे। उन्हें देखकर वे भयसे थर्रा उठे और जीवनसे निराश होकर बड़े क्लेशसे बोले—'तुमलोग कौन हो। मैं भूख-प्याससे पीड़ित राजा विदूरथ हूँ। शिकारके पीछे जीव-जन्तुओंसे रहित इस वनमें आ पहुँचा हूँ।'

तब उन तीनों प्रेतोंमें जो सबसे ज्येष्ठ था, उसने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा—महाराज! हम तीनों प्रेत हैं और इसी वनमें रहते हैं। अपने कर्मजनित दोषसे हमलोग महान् दुःख उठा रहे हैं। मेरा नाम मांसाद है, यह दूसरा मेरा साथी विदैवत है और तीसरा कृतघ्न है, जो हम सबमें बढ़कर पापात्मा है। हमें जिस-जिस कर्मके द्वारा यहाँ एक ही साथ प्रेतयोनिकी प्राप्ति हुई है, वह सुनो। राजन्! हम तीनों वैदेशपुरमें देवरात नामक महात्मा ब्राह्मणके घरमें उत्पन्न हुए थे। हमने नास्तिक होकर धर्म-मर्यादाका उल्लंघन किया और हमलोग सदा परायी स्त्रियोंके मोहमें फँसे रहे। मैंने जिह्वाकी लोलुपताके कारण सदा मांस ही भोजन किया है, अतः मुझे अपने कर्मके अनुसार ही मांसाद नाम प्राप्त हुआ है। महाराज! यह दूसरा जो तुम्हारे सामने खड़ा है, इसने देवताओंका पूजन किये बिना ही सदा अन्न ग्रहण किया है, उसी कर्मके फलसे इसे प्रेत-योनिमें आना पड़ा है और देवताओंके विपरीत चलनेके कारण इसका नाम विदैवत हुआ है और जिस पापीने सदा दूसरोंके साथ कृतघ्नता—विश्वासघात किया है वही अपने कर्मके अनुसार कृतघ्न कहलाता है।

राजाने पूछा—इस मनुष्यलोकमें सब प्राणी आहारसे ही जीवन धारण करते हैं। यहाँ तुमलोगोंको कौन-सा आहार प्राप्त होता है, सो मुझे बताओ।

मांसाद बोला—जिस घरमें भोजनके समय स्त्रियोंमें युद्ध होता है, वहाँ प्रेत भोजन करते हैं। राजन्! जहाँ बलिवैश्वदेव किये बिना और भोजनमेंसे पहले अग्राशन—गोग्रास आदि दिये बिना भोजन किया जाता है, उस घरमें भी प्रेत भोजन करते हैं। जिस घरमें कभी झाड़ू नहीं लगता, जो कभी गोबर आदिसे लीपा नहीं जाता है तथा जहाँ मांगलिक कार्य और अतिथि आदिके सत्कार नहीं होते, उसमें भी प्रेत भोजन करते हैं। जिस घरमें फूटे बर्तनका त्याग नहीं किया जाता तथा वेदमन्त्रोंकी ध्वनि नहीं होती, वहाँ प्रेत आहार करते हैं। जो श्राद्ध दक्षिणासे रहित और शास्त्रोक्त विधिसे हीन होता है तथा जिसपर रजस्वला स्त्रीकी दृष्टि पड़ जाती है, वह श्राद्ध एवं भोजन हमारे अधिकारमें आ जाता है। जो अन्न केश, मूत्र, हड्डी और कफ आदिसे संयुक्त हो गया है और जिसे हीनजातिके मनुष्योंने छू दिया है, उसपर भी हमारा अधिकार हो जाता है। जो मनुष्य असहिष्णु, चुगली खानेवाला, दूसरोंका कष्ट देखकर प्रसन्न होनेवाला, कृतघ्न तथा गुरुकी

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शय्यापर सोनेवाला है और जो वेदों एवं ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है, ब्राह्मणकुलमें पैदा होकर मांस खाता है और सदा प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह प्रेत होता है। जो परायी स्त्रीमें आसक्त, दूसरेका धन हड़प लेनेवाला तथा परायी निन्दासे सन्तुष्ट होनेवाला है और जो धनकी इच्छासे नीच एवं वृद्ध पुरुषके साथ अपनी कन्याका व्याह कर देता है, वह प्रेत होता है। जो मनुष्य उत्तम कुलमें उत्पन्न, विनयशील और दोषरहित धर्मपत्नीका त्याग करता है, जो देवता, स्त्री और गुरुका धन लेकर उसे लौटा नहीं देता है तथा जो ब्राह्मणोंके लिये धनका दान होता देख उसमें विघ्न डालता है, वह प्रेत होता है।

राजाने पूछा—मांसाद! अब यह बताओ कि कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्य प्रेत नहीं होता है?

मांसाद बोला—जो परायी स्त्रियोंको माताके समान, दूसरोंके धनको मिट्टीके ढेलेके समान तथा सब प्राणियोंको अपने समान देखता है, वह प्रेत नहीं होता। जो सदा अन्नदानमें तत्पर, विशेषतः अतिथि-सत्कारमें प्रेम रखनेवाला, स्वाध्यायशील और व्रतपरायण होता है, वह प्रेत नहीं होता। जो शत्रु और मित्रमें समभाव रखनेवाला और मान तथा अपमानमें भी समताका त्याग न करनेवाला है, वह प्रेत नहीं होता। जो धर्ममें लगे हुए तथा धर्ममार्गपर चलनेवाले मनुष्योंका उत्साह बढ़ाता है, वह भी प्रेत नहीं होता। जो सदा यज्ञकर्ममें तत्पर, सदैव तीर्थयात्रापरायण तथा सर्वदा शास्त्र-श्रवण करनेवाला है, वह मनुष्य प्रेत नहीं होता। जो बावली, कुआँ और पोखरा बनवाता, बगीचे लगाता और पौंसले (प्याऊ) चलाता है, वह प्रेत नहीं होता। राजन्! हम इस प्रेतयोनिसे बहुत कष्ट पा रहे हैं। तुम हमारा उद्धार करनेवाले हो जाओ। गयाशीर्ष नामक पवित्र तीर्थमें जाकर तुम हम तीनोंके लिये पृथक्-पृथक् श्राद्ध करो, जिससे हमारी यह प्रेतयोनि निवृत्त हो जाय।

राजा बोले—जिस योनिमें इस प्रकार पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण होता है, आकाशमें भी चलनेकी शक्ति प्राप्त है और धर्म तथा अधर्मका सम्यक् ज्ञान है, उसकी तुम निन्दा क्यों करते हो?

मांसादने कहा—राजन्! यह प्रेतयोनि अधम देवयोनि कहलाती है। इसमें केवल तीन ही गुण हैं—पूर्वजन्मका स्मरण, आकाशगमनकी शक्ति तथा धर्म और अधर्मका निश्चय। इसके सिवा इसमें सब दोष-ही-दोष भरे हैं। यदि हमलोग इस वनकी सीमासे बाहर जाते हैं तो हमारे ऊपर बिना देखे हुए मुद्गरोंकी मार पड़ती है। इसके सिवा समस्त धार्मिक क्रियाओंका अनुष्ठान केवल मनुष्यके लिये विहित है, प्रेतयोनि अथवा देवयोनिमें गये हुए जीवोंके लिये नहीं। राजन्! जब सूर्य वृष राशिपर स्थित होते हैं तब ज्येष्ठकी चिलचिलाती हुई धूपमें हम प्याससे व्याकुल होकर दूरसे ही जलसे भरे हुए जलाशयोंको देखते हैं। यदि उनके समीप चले जायें तो हमारे ऊपर अदृष्ट मुद्गरोंकी मार पड़ती है। इसी प्रकार हम दूरसे देखते हैं, गृहस्थोंके घरोंमें नाना प्रकारकी रसोई तैयार करके रखी हुई है। हम भूखसे व्याकुल रहते हैं किंतु उस रसोईको ले नहीं सकते। अच्छे फलवाले वृक्षोंको हम देखते हैं, किंतु उन्हें सेवनका अवसर नहीं पाते। अधिक क्या कहूँ, जो-जो घृणित एवं क्लेशदायक कर्म हैं, सब हमारे पास स्वतः उपस्थित हो जाते हैं। बिना किसी दोषके हमारी प्राणयात्रा नहीं चलती। जल, छाया, अन्न और सवारी—ये सब हमारे लिये नहीं हैं। इसीलिये प्रदोषकाल आनेपर हम सदा छिद्र ढूँढ़ते हुए घूमते रहते हैं। हमारे आकाशगमनकी शक्तिकी बात जो तुमने कही है, वह भी व्यर्थ है। उस आकाशगमनकी शक्तिसे, धर्माधर्म-विवेकसे और पूर्वजन्मकी स्मृतिसे भी क्या लाभ है, जिसके द्वारा मोक्षकी सिद्धि नहीं हो सकती?* अतः राजन्! यद्यपि ये आकाशगमन आदि प्रेतोंके गुण बताये जाते हैं


* क्रियते खेचरत्वेन किं किं धर्मविनिश्चयैः। यया न सिद्ध्यते मोक्षो याति स्मृत्या हि किं तया॥ (स्क० पु०, ना० १८।६७)

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०७५

तथापि इनके द्वारा कोई सिद्धि नहीं मिलती। उलटे इन गुणोंके कारण खेद ही अधिक होता है, क्योंकि प्रेतयोनियाँ किसी भी शुभ कर्मके करनेमें समर्थ नहीं हैं।

राजा बोले—यदि मैं इस महान् वनसे घरको लौट जाऊँगा तो निश्चय ही तुम सब लोगोंके लिये गयाश्राद्ध करूँगा और यत्नपूर्वक सब उपायोंसे तुम्हारा उद्धार करूँगा। इस समय तुम मुझे मनुष्योंसे सेवित कोई जलाशय बतलाओ जिससे जल प्राप्त करके मैं तुम्हारा उपकार करूँ।

मांसादने कहा—महाराज! इस स्थानसे थोड़ी ही दूरपर एक जलाशय है, जो नाना प्रकारके वृक्षोंसे घिरा हुआ और चित्तको आह्लाद प्रदान करनेवाला है। तुम यहाँसे सीधे उत्तरकी ओर चले जाओ।

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर राजा विदूरथ धीरे-धीरे उत्तर दिशाकी ओर चले। थोड़ी ही दूरपर हरे-भरे वृक्षोंका समुदाय दिखायी दिया। वहाँ हंस, बक तथा सारस आदि पक्षी उड़ रहे थे। वहाँ पहुँचकर राजाने सौम्य प्राणियोंसे सुसेवित एक मनोहर आश्रम देखा। वहाँ एक वृक्षके नीचे तपस्वीजनोंसे सेवित मुनिश्रेष्ठ जैमिनि विराजमान थे। उनके समीप जाकर महाराजने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और भूमिपर बैठे हुए मुनिके शिष्योंको भी प्रणाम किया। उन सबने राजाको देखकर पूछा—'महाराज! इन निर्जन वनमें तुम कहाँसे आये हो?'

राजाने कहा—इस समय मुझे प्यास सता रही है, अतः पहले पानी पीकर पीछे मैं अपना सब हाल बताऊँगा।

तब उन्होंने राजाको जल दिखा दिया। राजाने उसमें प्रवेश करके जल पीकर प्यास बुझायी और नीचे गिरे हुए वृक्षोंके फल लेकर इच्छापूर्वक भोजन किया। पूर्णतः तृप्त होनेपर वे पुनः महर्षि जैमिनिके समीप आये और प्रणाम करके बैठ गये। तदनन्तर अपना वृत्तान्त कहना प्रारम्भ किया—

‘मुनिवरो! मैं विदूरथ नामसे प्रसिद्ध राजा हूँ। माहिष्मती पुरीमें मेरा निवासस्थान है। मैंने अपनी सेना साथ लेकर इस भयंकर वनमें प्रवेश किया था। मेरे सब सैनिक लताओं और झाड़ियोंकी आड़में छिपकर मुझसे अदृश्य हो गये। पता नहीं उन सैनिकोंका क्या हाल है। मेरा घोड़ा भी एक स्थानपर गिर गया। मेरी आयु शेष थी कि मैं घूमता हुआ यहाँ आ पहुँचा। मुनिवरो! अब सन्ध्याका समय आ गया है। अतः हम सब लोगोंको यथायोग्य सन्ध्योपासन आदि विधि करनी चाहिये।'

तत्पश्चात् मुनियों तथा राजाने सन्ध्योपासना की। धीरे-धीरे रात्रि हो गयी। इसी समय राजाकी सेनाके कुछ मनुष्य उन्हें ढूँढ़ते हुए वहाँ आ पहुँचे और उन्हें देखकर बड़े आदरसे बोले—'अहोभाग्य! जो महाराज मिल गये।' यों कहकर वे राजाके चरणोंमें गिर गये। फिर उठकर उन्होंने राजासे सैनिकोंके कष्ट, जो देखे और सुने थे, बतलाये। तदनन्तर उन सब सेवकोंके साथ राजा वृक्षके नीचे पत्ते बिछाकर सो रहे। प्रातःकाल उठकर उन्होंने पूर्वाह्निककृत्य—स्नान, सन्ध्योपासन आदि पूरा किया। तत्पश्चात् मुनिवर जैमिनिको प्रणाम करके उनकी आज्ञा ले अपने सेवकोंके साथ माहिष्मती पुरीकी ओर प्रस्थान किया। मार्ग पूछते हुए धीरे-धीरे चलकर राजा कुछ कालमें अपने निवासस्थानपर जा पहुँचे और कुछ समय विश्राम करके उन्होंने शीघ्र ही गयाशीर्षकी यात्रा कर दी। समयानुसार वहाँ पहुँचकर राजाने स्नान किया और धुले हुए वस्त्र पहनकर पवित्र हो श्रद्धायुक्त हृदयसे पहले मांसादका श्राद्ध किया। तदनन्तर रातमें सोते समय स्वप्नमें उन्होंने देखा, मांसाद दिव्य माला और वस्त्र धारण किये दिव्य विमानपर आरूढ़ है। उस समय मांसादने राजासे कहा—'भूपाल! तुम्हारे प्रसादसे मैं प्रेतयोनिसे मुक्त हो गया हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, मैं स्वर्गलोकको जाऊँगा।'

तब प्रातःकाल उठकर हर्षमें भरे हुए राजा

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विदूरथने विदैवतके लिये यथायोग्य श्राद्ध किया। फिर वह भी उसी प्रकार राजाको स्वप्नमें दिखायी दिया और मांसादकी ही भाँति कृतज्ञता प्रकट करके स्वर्गलोकमें चला गया। फिर तीसरे दिन राजाने पूर्ववत् श्रद्धापूर्ण हृदयसे कृतघ्नके लिये श्राद्ध किया। रातको उसने भी स्वप्नमें दर्शन दिया, किंतु वह उसी प्रेतरूपमें आया था और बड़े दुःखसे घिरा हुआ था।

कृतघ्न बोला—महाराज ! तड़ागके लिये नियत धनकी जिसने चोरी की है और जो सदा कृतघ्न रहा है—ऐसे मुझ पापात्माकी अभीतक मुक्ति नहीं हुई। अतः जिस प्रकार मुझे भी इस दुःखसे छुटकारा मिल जाय, वैसा कोई उपाय करो और अपनी की हुई सत्यप्रतिज्ञा पूरी करो। सत्य ही परब्रह्म है, सत्य ही परम तप है, सत्य ही परम ज्ञान है और सत्य ही परम शास्त्र है। सत्यके बलसे वायु चलती है। सत्यसे सूर्य तप रहा है और सत्य वचनसे ही समुद्र अपनी मर्यादाका लंघन नहीं करता। सत्यहीन मनुष्यके द्वारा किये हुए तीर्थ-सेवन, तप, दान, स्वाध्याय और गुरुसेवा—ये सब धर्म व्यर्थ हो जाते हैं। एक समय देवताओंद्वारा कौतूहलवश अपनी तुलापर एक ओर तो सम्पूर्ण धर्मोंको रखा और दूसरी ओर केवल सत्यको, परंतु सत्यका ही पलड़ा भारी रहा।^* इसलिये महामते ! तुम भी सत्यको ही आगे रखकर मेरा उद्धार करो। यह पुण्य तुम्हारे लिये तपस्यासे भी बढ़कर कल्याणका साधक होगा।

राजा विदूरथने पूछा—प्रेत ! तुम्हारी मुक्ति किस उपायसे हो सकती है, शीघ्र बताओ। दुष्कर होनेपर भी मैं उसे अवश्य करूँगा।

प्रेतने कहा—राजन् ! चमत्कारपुरमें जो हाटकेश्वरक्षेत्र है, वहीं कलियुगसे डरा हुआ गयाशीर्षतीर्थ प्लक्ष (पाकड़) नामक वृक्षके नीचे धूलमें छिपा हुआ है। उसके चारों ओर समयोचित शाक, कुशा और जंगली तिलके पौधे हैं। वहीं जाकर तुम तिल, अन्न, शाक और कुश आदि सामग्रियोंके द्वारा मेरे लिये श्राद्ध करो। ऐसा करनेपर शीघ्र मेरी मुक्ति हो जायगी।

प्रेतकी यह बात सुनकर दयालु राजा वहाँ गये और उसके बताये अनुसार उन्होंने सब कुछ किया। पहले जलके लिये वहाँ एक छोटा-सा कुआँ खोदा। फिर वेदोंके पारंगत श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बुलाकर कृतघ्नके उद्देश्यसे शास्त्रोक्तविधिके अनुसार श्राद्ध किया। उस श्राद्धके पूर्ण होते ही कृतघ्न दिव्यरूपधारी पुरुष होकर श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हुआ और विदूरथसे बोला—'प्रभो ! तुम्हारे प्रसादसे मैं इस भयंकर प्रेतशरीरसे मुक्त हो गया। अब मैं स्वर्गको जा रहा हूँ।'

सूतजी कहते हैं—तबसे लेकर गयाशीर्षक्षेत्रमें वह 'लघुकूप' प्रसिद्ध हो गया। वह उस क्षेत्रमें पितरोंको पुष्टि देनेवाला है। जो आश्विनमासमें पितृपक्षकी अमावास्याको वहाँ कालशाक, जंगली तिल, तैयार किये हुए अन्न तथा कुशा आदिके द्वारा श्रद्धापूर्वक पितरोंका श्राद्ध करता है वह उत्तम फलका भागी होता है। अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, आज्यप और सोमप—ये पितृगण वहाँ सदा निवास करते हैं; अतः उस तीर्थमें जाकर समय या असमयमें सदा ही प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिये।


^* सत्यमेव परं ब्रह्म सत्यमेव परं तपः। सत्यमेव परं ज्ञानं सत्यमेव परं श्रुतम्॥
सत्येन वायुर्वहति सत्येन तपते रविः। सागरः सत्यवाक्येन मर्यादां न विलङ्घयेत्॥
तीर्थसेवा तपो दानं स्वाध्यायो गुरुसेवनम्। सर्वं सत्यविहीनस्य व्यर्थं सञ्जायते यतः॥
सर्वे धर्मा धृताः पूर्वमेकतोऽन्यत्र वै ऋतम्। तुलाया कौतुकाद्देवैर्जातं तत्र ऋतं गुरु॥
(स्क० पु०, ना० १९। २०—२३)

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध *१०७७

मार्कण्डेय मुनिको अमरत्वकी प्राप्ति, ब्रह्माजीकी स्थापना, बालसख्यतीर्थकी महिमा

सूतजी कहते हैं—चमत्कारपुरके समीप मृकण्ड नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ द्विज थे, जो वेदवेत्ता विद्वानोंमें अग्रगण्य माने जाते थे। वे वानप्रस्थ-आश्रममें स्थित थे। वहाँ उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की थी। जिस समय वे गृहस्थ थे, तभी ढलती अवस्थामें उनके एक सर्वशुभ-लक्षणसम्पन्न पुत्र हुआ था। पिताने उसका नाम ‘मार्कण्ड’ रखा था। वानप्रस्थी पिताके आश्रममें ही बालकका लालन-पालन हुआ और वह जल्दी बढ़ गया। धीरे-धीरे उसकी अवस्था पाँच वर्षकी हो गयी। एक दिन जब वह पिताकी गोदमें बैठकर खेल रहा था, उसी समय वहाँ कोई सामुद्रिक शास्त्रका विद्वान् आया। उसने नखसे लेकर शिखातक उस बालककी ओर देखा। देखकर उसके नेत्र आश्चर्यसे चकित हो गये। फिर वह किंचित् मुसकराया।

मृकण्ड मुनिने उसे हँसते देख विनीतभावसे पूछा—'विप्रवर! मेरे इस पुत्रकी ओर देखकर आप चकित क्यों हो गये थे और फिर हँसे क्यों?' उनके बारंबार इस प्रकार पूछनेपर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने कहा—'मुने! इस शिशुके जो लक्षण देखे जाते हैं, वे यदि किसी मनुष्यके शरीरमें हों तो वह अजर-अमर होता है। परंतु इसमें जो एक विशेष लक्षण है उससे सूचित होता है कि आजके दिनसे छः महीने पूरे होते ही इसकी मृत्यु हो जायगी। ऐसा जानकर आप आजसे इसके लिये लोक-परलोकमें हितकर कार्य कीजिये।'

यों कहकर वह उत्तम ब्राह्मण अपनी अभीष्ट दिशाको चला गया। तब मृकण्ड मुनिने मन-ही-मन कुछ सोच-विचारकर उचित समयसे पहले ही बालकका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। फिर उसे कर्तव्यका उपदेश देते हुए कहा—'बेटा! तुम जिस किसी भी ब्राह्मणको देखना उसे अवश्य विनयपूर्वक प्रणाम करना।' इस प्रकार व्रतमें स्थित हुए उस बालकके छः महीने पूर्ण होनेमें केवल तीन दिन शेष रह गये। वह सदा प्रत्येक ब्राह्मणको प्रणाम करता रहा। इसी बीचमें तीर्थयात्रापरायण सप्तर्षिगण उधर आ निकले, जहाँ वह मेखलाधारी मार्कण्ड खड़ा था। उसने उन सब मुनियोंको बारी-बारीसे प्रणाम किया और सबने पृथक्-पृथक् उसे ‘दीर्घायु’ होनेका आशीर्वाद दिया। तदनन्तर मुनिवर वसिष्ठने उस बालब्रह्मचारीकी ओर देखते हुए कहा—'हम सबने इस शिशुको दीर्घायु होनेका आशीर्वाद दिया है, परंतु यह तो आजके तीसरे ही दिन प्राण त्याग देगा; अतः हमलोगोंके वचनका इस प्रकार असत्य होना कदापि उचित नहीं है। इसलिये ऐसा कोई उपाय किया जाय जिससे यह बालक चिरंजीवी हो जाय।'

तदनन्तर वे सब महर्षि परस्पर विचार करके इस निश्चय पर पहुँचे कि 'ब्रह्माजीको छोड़कर दूसरा कोई इसके जीवनका उपाय नहीं है। अतः इस बालकको उनके आगे ले जाकर उन्हींकी आज्ञासे इसे चिरंजीवी बनाना चाहिये।' ऐसा निर्णय करके तीर्थभ्रमणका कार्य रोककर उस ब्रह्मचारीको साथ ले वे शीघ्र ही ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे। वहाँ ब्रह्माजीको प्रणाम करके वेदोक्त स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करनेके पश्चात् सब मुनि बैठे। इसके बाद उस बालकने भी ब्रह्माजीको प्रणाम किया और ब्रह्माजीने भी उसे दीर्घायु होनेका आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् ब्रह्माजीने सप्तर्षियोंसे पूछा—'तुमलोग कहाँसे और किसलिये इस समय यहाँ आये हो और यह उत्तम व्रत धारण करनेवाला बालक कौन है?'

सप्तर्षि बोले—पितामह! हमलोग तीर्थयात्राके प्रसंगसे पृथ्वीपर सब ओर घूमते हुए चमत्कारपुरके समीपतक गये थे। वहाँ इस बालकने हम सबको प्रणाम किया और क्रमशः हम सबने इसे दीर्घायु

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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


होनेका आशीर्वाद दिया। परंतु इसकी आयु तो तीन दिन ही शेष रह गयी है, इसीलिये हम बहुत लज्जित हैं और इसे लेकर आपके पास आये हैं। यहाँ आनेपर आपने भी इस बालकको दीर्घायु होनेका आशीर्वाद दिया है। अतः आप और हम सब लोग सत्यवादी बने रहें, इसके लिये कोई उपाय आप करें।

मुनियोंका यह वचन सुनकर ब्रह्माजीने हँसते हुए कहा—यह बालक मेरे प्रसादसे वेद-विद्यामें प्रवीण तथा जरामृत्युसे रहित होगा। इसमें सन्देह नहीं है। अतः अब इसे शीघ्र भूतलपर ले जाकर इसके घर पहुँचा दो। यह सुनकर सप्तर्षि उस बालकको लेकर उसके पिताके आश्रमके समीप आये और अग्नितीर्थमें छोड़कर स्वयं तीर्थस्नानके लिये चले गये। इधर पुत्र-स्नेही मृकण्ड मुनि अपने पुत्रको न देख दुःखी हो विलाप करते थे, इतनेमें ही बालक मार्कण्डेय पिता-माताके निकट आ गया। उसे आते देख ब्राह्मण और ब्राह्मणी दोनों उसकी ओर दौड़े और बार-बार हृदयसे लगाकर पूछने लगे—'बेटा! अपनी मातासहित मुझको शोकके समुद्रमें डालकर तुम आश्रमसे कहाँ चले गये थे और अब कहाँसे आये हो? फिर कभी ऐसा न करना।'

मार्कण्डेयजी बोले—पिताजी! आज यहाँ मुनिलोग पधारे थे। मैंने आपकी आज्ञाका स्मरण रखते हुए बारी-बारीसे उन सबको विनयपूर्वक प्रणाम किया और उन्होंने मुझे दीर्घायु होनेका आशीर्वाद दिया। तब उनमेंसे वसिष्ठजीने हँसकर कहा—'मुनियो! आपने जिस बालकको 'दीर्घायु' कहा है, वह आजसे तीसरे ही दिन मृत्युको प्राप्त होनेवाला है।' तब असत्यसे डरे हुए उन महर्षियोंने तत्क्षण मुझे ब्रह्मलोकमें पहुँचा दिया। वहाँ जानेपर मैंने ब्रह्माजीको प्रणाम किया तब उन्होंने भी 'दीर्घायु' होनेका आशीर्वाद दिया। तब उन मुनियोंने मुझे आशीर्वाद देनेका सब वृत्तान्त कहा और यह अनुरोध किया कि 'पितामह! आपके प्रसादसे यह बालक जिस प्रकार दीर्घायु हो सके वैसा यत्न कीजिये।' तब ब्रह्माजीने मुझे अजर-अमर बना दिया और तुरंत उन सप्तर्षियोंके साथ घरको भेज दिया। वे मुनि मुझे आश्रमके समीप छोड़कर कुण्डमें स्नान करनेके लिये चले गये हैं।

मार्कण्डेयकी यह बात सुनकर मृकण्ड मुनिको बड़ा हर्ष हुआ। वे तुरंत उस स्थानपर गये जहाँ मुनिलोग स्थित थे। उन सबको प्रणाम करके वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये और बोले—'मुनिवरो! आपलोगोंके प्रसादसे आज मेरे कुलकी वृद्धि हुई। किन्हीं आचार्योंने यह बहुत उत्तम बात कही है कि साधुपुरुषोंकी सेवा करके मनुष्य तीनों लोकोंमें ख्याति लाभ करता है। साधुजनोंका दर्शन पवित्र है, क्योंकि साधुपुरुष तीर्थस्वरूप हैं। तीर्थ तो कुछ समयके बाद ही फलता है; परंतु साधुपुरुषोंका समागम तत्काल फल देता है*। अतः आज आप सब लोग मेरे घर अतिथिरूपसे आये हैं; बताइये मैं किस प्रकार आपका आतिथ्य करूँ।'

ऋषि बोले—मुने! हमारे लिये तो यही करोड़ों आतिथ्यके तुल्य है कि आपका अल्पायु बालक भी अमर हो गया।

मृकण्डने कहा—मुनीश्वरो! जिसे मृत्युने गलेसे लगा लिया था, मेरे उस बालककी रक्षा करके आपने समस्त कुलका उद्धार कर दिया है। ब्रह्मघाती, शराबी, चोर तथा व्रतको भंग करनेवाले पापीके लिये सत्पुरुषोंने प्रायश्चित्त बताया है; परंतु कृतघ्नके उद्धारका कोई उपाय नहीं है। अतः मुनीश्वरो! मुझपर कृतघ्नताका दोष न आवे, ऐसा उपाय आपको करना चाहिये।

ऋषि बोले—द्विजश्रेष्ठ! यदि आप कोई प्रत्युपकार करना ही चाहते हैं तो हमारे कहनेसे यहाँ ब्रह्माजीके लिये, जिन्होंने आपके पुत्रको अमर बनाया है, एक मन्दिर बनवाइये और इस तीर्थमें ब्रह्माजीकी स्थापना कीजिये। तत्पश्चात् स्वयं भी


* साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधवः। तीर्थं फलति कालेन सद्यः साधुसमागमः॥ (स्क० पु०, ना० २१। ६८)

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०७९

आप पुत्रके साथ यहाँ रहकर दिन-रात उनकी आराधना करें। हम और दूसरे ब्राह्मण भी आपके साथ रहकर नित्यप्रति पितामहका पूजन करेंगे। यहाँ आपके बालकके साथ हमारा सख्यसम्बन्ध स्थापित हुआ है, इसलिये यह तीर्थ 'बालसख्य' के नामसे प्रसिद्ध होगा। हमारे वचनसे यह तीर्थ सदा रोगी और भयभीत पुरुषोंको रोग एवं भयसे मुक्त करेगा। जो लोग इस तीर्थमें अपने रोगार्त, भयार्त अथवा ग्रहपीड़ित बालकोंको स्नान करायेंगे, उनके वे बालक सब दोषोंसे रहित हो जायँगे। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक निष्कामभावसे इस तीर्थमें स्नान करेंगे वे उत्तम गतिको प्राप्त होंगे।

ऐसा कहकर वे सभी मुनीश्वर मृकण्ड मुनिकी अनुमति ले अन्य तीर्थोंमें चले गये। तत्पश्चात् पुत्रसहित मृकण्ड मुनिने ज्येष्ठमासकी पूर्णिमाको ज्येष्ठा नक्षत्रमें चन्द्रमाके स्थित होनेपर ब्रह्माजीकी स्थापना की और आलस्य छोड़कर वे दिन-रात श्रद्धापूर्वक उनकी आराधनामें लगे रहे। इससे उन्हें उत्तम गतिकी प्राप्ति हुई। ब्राह्मणो! जो बालक ज्येष्ठमासके ज्येष्ठा नक्षत्रमें वहाँ स्नान करता है, वह एक वर्षतक ग्रहादिजनित पीड़ाका अनुभव नहीं करता है।


मृगपदतीर्थ और विष्णुपदतीर्थका प्रादुर्भाव तथा माहात्म्य, विष्णुपदीमें स्नान और विष्णुपदके स्पर्श आदिका महत्त्व

सूतजी कहते हैं—उसी तीर्थके पश्चिम भागमें परम उत्तम एवं अतिशय पवित्र मृगतीर्थ है, जो समस्त भूतलमें विख्यात है। जो मानव उस तीर्थमें पूर्ण श्रद्धाके साथ चैत्र शुक्ला चतुर्दशीको मध्याह्नकालमें स्नान करते हैं वे समस्त दोषों और पापोंसे युक्त होनेपर भी किसी प्रकार पशु-पक्षियोंकी योनिमें नहीं जाते। जो कृतघ्न, नास्तिक, चोर तथा राजनिन्दक हैं वे भी वहाँ स्नान करके परम गतिको प्राप्त होते हैं।

ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन! उस क्षेत्रमें मृगतीर्थका आविर्भाव कैसे हुआ?

सूतजीने कहा—महर्षियो! पूर्वकालमें उस विशाल वनके भीतर एक दिन बहुत-से महाभयंकर व्याध अपने हाथोंमें धनुष लिये आ पहुँचे। उस समय एक वृक्षके नीचे मृगोंका झुंड विश्वस्त होकर बैठा था। व्याधोंकी दृष्टि उनके ऊपर पड़ी। मृग भी उन व्याधोंको दूरसे ही देखकर भयसे व्याकुल हो भाग चले और पास ही गहरे जलाशयको देख उसीमें समा गये। जलके भीतर प्रवेश करते ही वे सब मृग उसी तीर्थके प्रभावसे मानव-शरीरको प्राप्त हो गये। तब उनसे व्याधोंने पूछा—'भद्रपुरुषो! इस मार्गसे अभी-अभी मृगोंका झुंड आया है, बताइये वह किस मार्गसे निकला है?'

वे मनुष्य बोले—हमलोग ही वे मृग हैं। इस तीर्थके प्रभावसे हमने दुर्लभ मानव-शरीर प्राप्त कर लिया है।

यह सुनकर सब व्याध बड़े विस्मयमें पड़े और उन्होंने भी धनुष-बाण फेंककर उस तीर्थमें स्नान किया। स्नान करते ही वे दिव्य शरीरसे युक्त श्रेष्ठ राजा हो गये। प्राचीन कालमें जहाँ स्नान करके राजा त्रिशंकु उत्तम शरीरको प्राप्त हुए थे, उसी जलाशयमें स्नान करनेके कारण वे वधिक सब पापोंसे मुक्त होकर उत्तम शरीरको प्राप्त हुए।

उस शुभ तीर्थमें विष्णुपद नामसे प्रसिद्ध एक अन्य तीर्थ भी है जो समस्त पातकोंका नाश करनेवाला है। दक्षिणायन आरम्भ होनेपर मनुष्य एकाग्रचित्त हो वहाँ विष्णुपदका पूजन करे और श्रद्धापूर्वक भगवान्‌को आत्मनिवेदन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष दक्षिणायनमें मरनेपर भी भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त होता है, इसमें सन्देह

१०८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नहीं है। इसी प्रकार उत्तरायण आरम्भ होनेपर भी विधिपूर्वक विष्णुपदका पूजन करके एकाग्रचित्त हो भक्तिभावसे आत्मनिवेदन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष भी भगवान् विष्णुके पुण्यधामको प्राप्त होकर सुखी होता है।

ऋषियोंने पूछा—भगवान् विष्णुका चरण उस तीर्थमें कैसे प्राप्त हुआ और वहाँ किस प्रकार आत्मनिवेदन किया जाता है?

सूतजीने कहा—सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने जिस समय बलिको बाँधा था, उस समय अपने तीन पगोंसे चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंको नाप लिया था। भगवान्के उन तीन पगोंमेंसे पहला पग इसी हाटकेश्वरक्षेत्रमें पड़ा था। दूसरा पग उन्होंने महर्लोकमें रखा। फिर भगवान् चक्रपाणिने जब तीसरा पग रखनेका उद्योग किया तब उनके अंगुष्ठके अग्रभागसे ब्रह्माण्ड फूट गया और अत्यन्त लघुताको प्राप्त हो गया। फूटे ब्रह्माण्डके उस छिद्रसे निकला हुआ वह जल भगवान्के अंगुष्ठाग्रसे होता हुआ क्रमशः पृथ्वीतलपर आया। चन्द्रमाके समान उज्ज्वल जलसे विभूषित उस तीर्थको लोकमें विष्णुपदी गंगा कहते हैं। इस प्रकार उस क्षेत्रमें जब भगवान् विष्णुका चरण प्राप्त हुआ तब प्राणियोंके सब पापोंका नाश करनेवाली विष्णुपदी नामक एक नदी प्रकट हुई। जो उसमें श्रद्धापूर्वक स्नान करके भगवान् विष्णुके चरणका स्पर्श करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। जो उत्तम श्रद्धासे युक्त हो विष्णुपदीके तटपर श्राद्ध करता है, वह गयामें श्राद्ध करनेका फल पाता है। जो मनुष्य सदा माघमासमें प्रातःकाल उठकर स्नान करता है, वह प्रयागमें स्नानका फल पाता है। जो एक वर्षतक वहाँ निवास करके भक्तिपूर्वक उसमें स्नान करता है, वह मनुष्य मोक्षका भागी होता है। जिसकी हड्डियाँ उस तीर्थके जलमें डाल दी जाती हैं, वह परम गतिको प्राप्त होता है। जो प्याससे पीड़ित होकर बिना भक्तिके भी उस तीर्थके जलमें प्रवेश करते हैं, वे भी पापमुक्त हो शरीरका अन्त होनेके पश्चात् भगवान् विष्णुके जरा-मृत्यु-रहित परम धाममें जाते हैं। फिर जो पर्वकाल उपस्थित होनेपर श्रद्धापूर्वक स्नान करके वेदके ज्ञाता श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान देते हैं, उनके लिये क्या कहना है! इसलिये जो मनुष्य अपने कल्याणकी इच्छा रखता है, वह प्रयत्न-पूर्वक विष्णुपदीके जलमें स्नान तथा विष्णुपदका स्पर्श करे।

दक्षिणायन अथवा उत्तरायण प्राप्त होनेपर श्रीविष्णुपदका पूजन करके इस मन्त्रका उच्चारण करे—

षण्मासाभ्यन्तरे मृत्युर्यद्यकस्माद् भवेन्मम।
तत्ते पदं गतिर्मे स्यात् स्यामहं भृत्यतां गतः॥

'भगवान्! यदि छः महीनेके भीतर मेरी अकस्मात् मृत्यु हो जाय तो आपके चरणोंमें ही मुझे आश्रय मिले और मैं आपका सेवक (पार्षद) होऊँ।'

श्रीहरिसे ऐसा कहकर तत्पश्चात् ब्राह्मणोंका पूजन करे और उन्हींके साथ भोजन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष उत्तम गतिको प्राप्त होता है।


विष्णुपदीकी अद्भुत महिमा, चण्डशर्माकी शुद्धि

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! पूर्वकालकी बात है। चमत्कारपुरमें उत्तम व्रतका पालन करनेवाले चण्डशर्मा नामसे विख्यात एक ब्राह्मण हो गये हैं, जो रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न थे। वे जब युवावस्थामें पहुँचे तब किसी वेश्यामें आसक्त हो गये। एक समय आधी रातमें वे प्याससे व्याकुल होकर उठे तो उस वेश्यासे बोले—'प्रिये! मैं पानी पीना चाहता हूँ।' तब उस वेश्याने पानीके भ्रमसे उन निद्राकुल ब्राह्मणको मदिरासे भरा हुआ पुरवा लाकर दे दिया। मुखमें मदिरा जाते ही ब्राह्मण कुपित हो उठे और उस वेश्याको बार-बार धिक्कारते हुए कड़ी फटकार

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०८१

सुनाने लगे—‘अरी पापिनी! तूने यह क्या किया। आज मदिरा पीनेसे मेरी ब्राह्मणता निश्चय ही नष्ट हो गयी; अतः मैं आत्मशुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करूँगा।’ ऐसा कहकर वे दुःखपूर्वक घरसे बाहर निकले और निर्जन वनमें जाकर करुणस्वरमें विलाप करने लगे। तत्पश्चात् प्रातःकाल होनेपर उन्होंने अपने शरीरके सब बाल बनवाकर वस्त्रसहित स्नान किया। तदनन्तर वे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी सभामें गये और उन्हें प्रणाम करके बोले—‘ब्राह्मणो! मैंने जलके धोखेसे मदिरा पी ली है, मुझे दण्ड दीजिये।’ तब उन ब्राह्मणोंने बार-बार धर्मशास्त्रका विचार करके कहा—‘ब्राह्मण यदि ज्ञान अथवा अज्ञानसे भी मदिरा पी ले तो मदिराके बराबर ही खौलता हुआ घी पी लेनेपर उसकी शुद्धि होती है; अतः यदि तुम आत्मशुद्धि चाहते हो तो यही प्रायश्चित्त करो।’ ‘बहुत अच्छा, ऐसा ही करूँगा’ ऐसी प्रतिज्ञा करके ब्राह्मणने तत्काल घी लेकर उसे पीनेके लिये आगपर तपाया। इतनेमें ही यह समाचार सुनकर उनके पिता-माता भी आ पहुँचे और बोले—‘यह क्या, यह क्या बेटा! तुम यह क्या करते हो?’

तब पुत्रने नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए रातकी सब घटना कह सुनायी। यह सब सुनकर ब्राह्मण-दम्पतिने उन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे प्रार्थना की, ‘मेरे इस पुत्रको धर्मशास्त्रका विचार करके कोई दूसरा प्रायश्चित्त बताइये।’ तब उन ब्राह्मणोंने पुनः आदरपूर्वक धर्मशास्त्रका विचार किया और इस प्रकार कहा—‘ब्रह्मन्! धर्मशास्त्रमें तो कोई दूसरा उपाय नहीं है। तुम्हें जो उचित प्रतीत हो सो करो।’ तब ब्राह्मणने पुत्रसे कहा—‘बेटा! तीर्थयात्रा करो, फिर क्रमशः अनेक प्रकारका व्रत करनेसे पवित्रताको प्राप्त होओगे।’

पुत्र बोला—महाभाग! क्या ब्राह्मणोंका बताया हुआ प्रायश्चित्त पवित्रताके लिये पर्याप्त नहीं है, जो आप व्रत आदिका उपदेश करते हैं?

पुत्रका यह निश्चय जानकर पुत्रवत्सला पिता तथा उनकी सती पत्नीने भी मृत्युका निश्चय करके प्रसन्नतापूर्वक अपना सब कुछ ब्राह्मणोंको दान कर दिया। तब माताने कहा—‘बेटा! जब हम दोनों अग्निमें प्रवेश कर जायँ उसके बाद तुम मोंजीहोम (मरणान्त प्रायश्चित्त) करना।’ ऐसा कहकर वे दम्पति प्रसन्नतापूर्वक मृत्युके लिये अग्निके समीप गये। उनके साथ ही उनका पुत्र भी था। इतनेमें ही वेदोंके पारंगत विद्वान् शाण्डिल्य मुनि तीर्थ-यात्राके प्रसंगसे उस स्थानपर आ पहुँचे और सारी बात सुनकर उन सब ब्राह्मणोंको फटकारते हुए बोले—‘अहो! तुम सब लोग अत्यन्त मूढ़ हो; क्योंकि तुम्हारे कारण सुगम प्रायश्चित्तके होते हुए भी आज ये तीन ब्राह्मण व्यर्थ ही मृत्युको प्राप्त हो रहे हैं। कृच्छ्र और चान्द्रायण आदि प्रायश्चित वहाँ दिये जाते हैं, जहाँ श्रीगंगाजी उपलब्ध न हों। यहाँ तो साक्षात् विष्णुपदी गंगा विद्यमान हैं; उसीमें यह स्नान करे तो पापसे शुद्ध हो जायगा।’

तब सब ब्राह्मणोंने शाण्डिल्य मुनिको साधुवाद देते हुए कहा—‘मुने! आपका कथन सत्य है।’ इसके बाद वे सब लोग ब्राह्मणको समझा-बुझाकर विष्णुपदी गंगाके तटपर ले गये। वहाँ ब्राह्मणने ज्यों-ही मुखमें गंगाजल डालकर कुल्ला किया, त्यों-ही वह शुद्ध हो गया। फिर जब वे उस शोभायमान जलमें स्नान करने लगे, उस समय स्पष्ट स्वरमें आकाशवाणी हुई—‘विष्णुपदीका सम्पर्क होनेसे तथा उसके जलमें स्नान और आचमन करनेसे ब्राह्मणदेवता शुद्ध हो गये हैं; अतः अब वे अपने घर लौट जायँ।’ यह सुनकर सब लोग हर्ष प्रकट करते हुए अपने-अपने घर चले गये।

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! ऐसे प्रभावशाली विष्णुपदी गंगा उस क्षेत्रकी पश्चिम सीमापर विद्यमान हैं, जो सब पापोंका नाश करनेवाली हैं।

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१०८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

हाटकेश्वर-क्षेत्रकी दक्षिणोत्तर सीमाके गोकर्णोंका परिचय, गोकर्ण और यमका संवाद, नरकवर्णन, क्षेत्रसेवनका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं— महर्षियो ! भूतलपर यमुना नदीके किनारे मथुरा नामसे विख्यात एक महापुरी है, जो अनेक ब्राह्मणोंसे भरी हुई है। वहीं पूर्वकालमें गोकर्ण नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण रहते थे, जो वेदाध्ययनसे सम्पन्न और सब शास्त्रोंके पण्डित थे। वहीं उसी नामका और उसी अवस्थाका एक दूसरा ब्राह्मण भी रहता था, जो सब विद्याओंमें पारंगत था। एक दिन यमराजने अपने दूतसे कहा—'दूत!' तुम शीघ्र मथुरा जाओ और वहाँके गोकर्ण नामक श्रेष्ठ ब्राह्मणको यहाँ ले आओ। आज दोपहरके समय उनकी आयु समाप्त हो जायगी। देखना, उसी पुरीमें उस नामके एक दूसरे ब्राह्मण भी हैं, जो दीर्घजीवी हैं; कहीं भूलसे उनको न ले आना।'

यमराजकी आज्ञासे दूत बड़े वेगसे मथुरापुरीमें पहुँचा; परंतु भ्रम हो जानेसे वह दीर्घजीवी गोकर्णको ही पकड़ लाया। तब यमराजने कुपित होकर अपने सेवकसे कहा—'पापी! तुझे धिक्कार है। तू इन दीर्घायु महात्माको ले आया! तूने यह क्या किया। इन्हें शीघ्र ही ले जाकर वहाँ पहुँचा दे; अन्यथा भय है कि बन्धु-बान्धव इनकी देहका दाह-संस्कार न कर दें।'

ब्राह्मण बोले— मैं सौभाग्यवश आपके समीप आ गया हूँ। अब वहाँ लौटकर नहीं जाऊँगा। मैं तो दरिद्रतासे कष्ट पाकर स्वयं ही सदा मृत्युकी इच्छा रखता था।

यमराजने कहा— विप्रवर! यदि पलभर भी आयु शेष हो तो मैं किसी मनुष्यको पृथ्वीसे यहाँ नहीं बुलाता, इसीलिये लोग मुझे धर्मराज कहते हैं। मैं सब प्राणियोंपर पक्षपात छोड़कर समान भाव रखता हूँ। तुम मुझसे कोई वर माँगो। किसी भी देहधारीको मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं होता।

ब्राह्मण बोले— देव! यदि मुझे अवश्य ही घर लौटकर जाना है तो मैं पूछता हूँ, उसको बताइये। वही मेरे लिये श्रेष्ठ वर होगा। पापकमी मनुष्य, जो इन भयंकर नरकोंका सेवन कर रहे हैं, इनमेंसे किस कर्मसे किसको कौन-सा नरक प्राप्त होता है?

यमराजने कहा— विप्रवर ! नरक असंख्य हैं पर उनमेंसे जो मुख्य हैं, केवल उन्हींका परिचय मैं तुम्हें कराऊँगा। यहाँ मुख्य इक्कीस नरक हैं। उनमेंसे पहला रौरव नरक है, जिसमें अत्यन्त तप्त तेलसे भरे हुए कुण्डोंमें प्राणी पकाये जा रहे हैं। इसमें दूसरोंका धन हड़पनेवाले क्षुद्र मनुष्य यातना भोगते हैं। दूसरेका नाम है महारौरव, जिसमें कृतघ्न और गुरुशय्यागामी पापात्मा दाहसे पीड़ित होकर तथा तीखी धारवाले शस्त्रोंसे छिन्न-भिन्न होकर आर्तनाद करते हैं। तीसरे भयदायक नरकका नाम अन्धतम है। जिन नराधमोंने परायी स्त्रियोंको दूषित दृष्टि देखा है, वे जब यहाँ आते हैं तब लोहेके समान मुखवाले पक्षी उनकी दोनों आँखें निकाल लेते हैं। चौथा नरक प्रतप्त नामसे विख्यात है। यहाँ भी पापी जीव यातना भोगकर शुद्ध होते हैं। जिन्होंने गुरुजनों, देवताओं तथा तपस्वियोंकी सदैव निन्दा की है, उन लोगोंकी जिह्वा यहाँ उखाड़ ली जाती है। पाँचवाँ सुप्रसिद्ध नरक विदारक नामवाला है। यहाँ मित्रद्रोही मनुष्य आरेसे चीरे जाते हैं। छठा निकुम्भ नामक नरक है, जो तपायी हुई बालूसे भरा हुआ है और स्वयं भी अग्नि-से तप रहा है। जिन मनुष्योंने पहले बिना किसी अपराधके दूसरे ब्राह्मणोंको प्राणान्तकारी कष्ट पहुँचाया है, वे यहाँ तपी हुई बालूमें भूने जाते हैं। सातवाँ नरक बीभत्सु कहलाता है। वह अत्यन्त गर्हित है। उसमें सब ओरसे मल-मूत्र आदि गंदी वस्तुएँ भरी हुई हैं। जिन दुरात्माओंने राजाके पास जाकर लोगोंकी चुगली खायी है, उनके मुँहमें ये गंदी वस्तुएँ भरकर उन्हें इसी नरकमें डाल दिया जाता है। आठवाँ अधम नरक

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०८३

कुत्सित नामसे प्रसिद्ध है। वह कफ और मूत्र आदि एवं दुर्गन्धयुक्त वस्तुओंसे भरा हुआ है। जिन्होंने गुरु, देवता, अतिथि और विशेषतः अपने कुटुम्बीजनों और सेवकोंको भोजन दिये बिना ही स्वयं भोजन किया है, वे लोग इसमें डाले जाते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! यह दुर्गम नामका नवाँ नरक है। यह तीखे काँटोंसे भरा हुआ है। इसके भीतर साँप और बिच्छू भी रहते हैं। जिन्होंने एक साथ यात्रा करनेवाले अपने भूखे-प्यासे कष्ट पाते हुए साथीको न देकर अकेले भोजन किया है, उन्हें इस नरकमें रखा जाता है। दसवें नरकका नाम दुस्सह है, जो सब ओरसे तप्त लोहमय खम्भोंसे घिरा हुआ है। जो पापी परायी स्त्रियोंमें तथा मांस-भोजनमें अनुरक्त होते हैं, उन मनुष्योंको यहाँ तप्त लोहमय खम्भोंका आलिंगन करना पड़ता है। ग्यारहवाँ नरक आकर्ष नामसे प्रसिद्ध है। यहाँ तपाये हुए सँड़से रखे रहते हैं। जो मनुष्य स्त्री, ब्राह्मण, गुरु और देवताका धन खाते हैं, उन्हें तपाये हुए सँड़सोंसे पकड़कर सब ओर खींचा जाता है। बारहवें नरकको सन्दंश कहते हैं। इसमें अभक्ष्य भक्षण करनेवाले नराधमोंको लोहेके समान दाँत और मुखवाले गीध नोच-नोचकर खाते हैं। तेरहवें नरकका नाम नियन्त्रक है। उसकी बड़ी ख्याति है। वह सब ओरसे कीटों तथा सुदृढ़ बन्धनोंसे व्याप्त है। जो पापी दूसरोंकी धरोहरको हड़प लेते हैं, वे यहाँ बन्धनोंसे कसकर बाँध दिये जाते हैं और कृमि, बिच्छू तथा कीट आदि उन्हें काटते और खाते हैं। चौदहवाँ नरक अधोमुख कहा गया है। इसका स्वरूप सब नरकोंसे अधिक भयंकर है। जो मनुष्य ब्राह्मणकी हत्या करते हैं, वे यहाँ एक वृक्षकी डालमें बाँधकर नीचे मुँह करके लटका दिये जाते हैं और नीचेसे आग प्रज्वलित करके उन्हें पकाया जाता है। पंद्रहवाँ भीषण नामवाला नरक है, जो जूँ और खटमल आदिसे भरा हुआ है। जो लोग झूठी गवाही देते या झूठ बोलते हैं, उनको तथा अन्य कुकर्मियोंको भी मैंने यहीं स्थान दे रखा है। यह सोलहवाँ नरक क्षुद्दद कहा गया है, जो चारों ओर क्षुधातुर मनुष्योंसे व्याप्त है। जिन द्विजोंने मांस भोजन किये हैं, वे यहाँ भूखसे पीड़ित होकर अपने ही शरीरको काट-काटकर खाते हैं। सत्रहवाँ क्षार नरक है, जो नमकसे भरा हुआ है। यह सब प्राणियोंके लिये बड़ा भयंकर है। जो मनुष्य व्रत भंग करनेवाले तथा पाखण्डी हैं, वे यहाँ आनेपर तीखे शस्त्रोंसे पीस डाले जाते हैं और ऊपरसे उनपर नमक छिड़का जाता है। यह अठारहवाँ नरक निदाघ नामसे प्रसिद्ध है, जो प्रज्वलित अंगारोंसे भरा है। जो मनुष्य शास्त्र, काव्य तथा ब्राह्मण-कन्याको कलंकित करते हैं, वे यहीं अंगारोंके भीतर रखे जाते हैं। उन्नीसवाँ नरक कूटशाल्मलि कहलाता है, जो सब ओरसे तीखे काँटोंसे भरा हुआ है। जो नास्तिक, मर्यादा भंग करनेवाले तथा ब्राह्मणघाती हैं, वे सब मनुष्य यहाँ सदैव चढ़ते और गिरते रहते हैं। बीसवें नरकका नाम असिपत्र वन है। जो दूसरोंके छिद्र देखते, झूठ-कपटसे भरे हुए कार्योंमें संलग्न रहते और शास्त्र बेचते हैं, वे ही इसमें आते हैं। इक्कीसवाँ नरक वैतरणी नामवाली नदी है, जिसे धर्मात्मा और पापी सभीको पार करना पड़ता है। जो मृत्युकालके समय गायकी पूँछ हाथमें लेकर उसका दान करते हैं, वे सुखपूर्वक उस नदीको पार कर जाते हैं। जो मानव गोदान किये बिना ही मर जाते हैं, उन्हें इस दुर्गम नदीको हाथोंसे ही तैरकर पार करना पड़ता है। द्विजश्रेष्ठ ! तुमने जो कुछ पूछा है, वह सब वृत्तान्त मैंने तुमसे कह दिया। अब इच्छानुसार धन लेकर घर जाओ।

**ब्राह्मण बोले—**देव ! अब यह बताइये कि कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्य नरकमें नहीं जाता।

**यमराजने कहा—**जो सदा तीर्थयात्रामें तत्पर रहता, देवता और अतिथियोंकी पूजा करता, ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति रखता तथा शरणमें आये हुएका पालन करता है, वह कभी भी नरकमें नहीं जाता। जो सर्वदा दूसरोंकी भलाईमें संलग्न रहता, हेमन्त

१०८४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

(सर्दी)-में आग तपाता, गरमीमें जल पिलाता और वर्षांमें ठहरनेके लिये स्थान देता है, वह कभी नरकका दर्शन नहीं करता है। जो व्रत और उपवासमें तत्पर, शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी तथा सदैव भगवान्‌का ध्यान करनेवाला है, वह मनुष्य भी नरकमें नहीं जाता है। जो अन्न और तिलका दान करता, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता, वेदाध्ययन करके शास्त्रके आज्ञा-पालनमें तत्पर होता, मीठे वचन बोलता तथा सदा धार्मिक चर्चा किया करता है, वह कभी नरकको नहीं देखता।

ब्राह्मण बोले—धर्मराज! यह तो एक मूर्ख भी जानता है कि शुभ कर्ममें तत्पर रहनेवाला पुरुष नरकमें नहीं जाता और पापपरायण मनुष्य स्वर्गमें नहीं जा सकता। मुझे तो सब लोकोंको सुख पहुँचानेवाला वह श्रेष्ठ व्रत, नियम, तीर्थ, जप अथवा होम आदि उपाय बताइये, जिसको स्वल्प मात्रामें करनेपर भी पापी पुरुष भी अपने पापका नाश करके शीघ्र स्वर्गलोकमें जा सके।

यमराजने कहा—द्विजश्रेष्ठ! आनर्त देशमें परम मनोहर एवं सर्वतीर्थमय शुभ हाटकेश्वरक्षेत्र है जो महापातकोंका भी नाश करनेवाला है। जो उस क्षेत्रमें पंद्रह दिन भी भक्तिपूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करता है, वह सब पापोंसे युक्त होनेपर भी भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। अतः तुम वहीं जाकर भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी आराधना करो। इससे अपनी दस पीढ़ियोंके साथ तुम मोक्ष प्राप्त करोगे।

सूतजी कहते हैं—यह उपदेश सुनकर गोकर्णजी ज्योंही अपने घरकी ओर प्रस्थित हुए त्यों ही यमदूत दूसरे गोकर्णको भी साथ लेकर वहाँ आ पहुँचा और शीघ्र ही उसने धर्मराजके सामने उसे उपस्थित किया। तब धर्मराजने प्रसन्न होकर दूतसे कहा—'तुम समय बिताकर इन ब्राह्मण देवताको यहाँ लाये हो, अतः द्वितीय गोकर्णके साथ ही इन्हें भी जल्दी छोड़ दो।' तदनन्तर वे दोनों गोकर्ण ब्राह्मण उसी क्षण एक ही साथ छोड़ दिये गये। फिर दोनोंने सहसा अपने-अपने शरीरमें प्रवेश किया। स्वस्थ होनेपर दोनोंने हाटकेश्वरतीर्थमें यथावत् तपस्या करके भगवान् शंकरकी आराधना की और उसके प्रभावसे सशरीर स्वर्गलोकमें चले गये। जो मनुष्य निष्कामभावसे वहाँ भगवान् शिवकी आराधना करता है वह मोक्षको प्राप्त होता है।

विप्रवरो! इस प्रकार मैंने तुम्हें हाटकेश्वरक्षेत्रका प्रमाण और सीमा आदिका सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। यहाँ खेती करनेवाले किसान भी परमगतिको प्राप्त होते हैं। फिर जो अपने मनको वशमें रखनेवाले शान्त, दान्त और जितेन्द्रिय साधक हैं उनके लिये क्या कहना है। मनुष्योंकी तो बात ही क्या है, उस क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त हुए कीट, पतंग, पशु-पक्षी और मृग भी निःसन्देह स्वर्गलोकमें जाते हैं। जो भगवान् जनार्दनको अपने हृदयमें स्थापित करके श्रद्धापूर्वक वहाँ रहते हैं, उनकी सद्गतिमें सन्देह ही क्या हो सकता है; अतः पूरा प्रयत्न करके सबको उस क्षेत्रका सेवन करना चाहिये।


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सिद्धेश्वर लिंगकी महिमा तथा वत्स मुनिके द्वारा षडक्षर-मन्त्रके माहात्म्य एवं मांसाहारकी निन्दा तथा अहिंसाकी महत्ताका वर्णन

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! हाटकेश्वरक्षेत्रमें सिद्धेश्वर नामक लिंग है। उस लिंगके रूपमें वहाँ साक्षात् भगवान् शंकर स्वयं ही प्रकट हैं। वे स्मरण और दर्शन करनेसे सदा सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाले हैं। जो मनुष्य पवित्र भावसे भक्तिपूर्वक उन सिद्धेश्वरका दर्शन या स्पर्श करता है, वह दुर्लभ मनोरथको भी शीघ्र प्राप्त कर लेता है। उस क्षेत्रमें पहले स्पर्श और दर्शन करनेसे सैकड़ों पुरुष सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं और कितने ही मनुष्य केवल प्रणाम करनेसे

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध *१०८५
सिद्धि के भागी हुए हैं। पूर्वकालमें जब मैं पिताके घरमें रहता था, मेरे सामने ही एक दिन वहाँ महातेजस्वी वत्स मुनि पधारे। उस समय उनका दर्शन करके मेरे पिताजीने भक्तिभावसे उन्हें प्रणाम किया और अर्घ्य देकर विनयपूर्वक पूछा—'विप्रवर! आपका स्वागत है। आप कहाँसे आये हैं, मेरे लिये यथोचित सेवाके निमित्त आज्ञा कीजिये।'<br><br>वत्सजी बोले—सूत! मैं तुम्हारे आश्रमपर चातुर्मास्य व्रत करना चाहता हूँ। यदि तुम मेरी सेवा-शुश्रूषा करो तो यहीं चौमासा करूँ।<br><br>लोमहर्षणजीने कहा—ब्रह्मन्! मैं निःसन्देह आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।<br><br>ऐसा कहकर मेरे पिताजी मुझसे बोले—वत्स! तुम्हें प्रतिदिन इन महर्षिकी सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिये। तब मैं विनीतभावसे उनकी सेवा-टहलके सब कार्य करने लगा। वे रातमें मुझे विचित्र-विचित्र कथाएँ सुनाया करते थे। एक समय कथाके अन्तमें मैंने पूछा—भगवन्! समुद्रसहित सम्पूर्ण धरातलको आपने थोड़ी ही अवस्थामें कैसे देखा? जिन द्वीप, समुद्र तथा पर्वतोंकी चर्चा आपने की है, वहाँतक तो मनुष्य मनके द्वारा भी किसी प्रकार नहीं जा सकते। मुनीश्वर! यह किसी तपस्याका प्रभाव है अथवा मन्त्रका पराक्रम है, जिससे आपने सम्पूर्ण भूतलको देख लिया है?<br><br>वत्स मुनिने हँसकर कहा—यह तुमने ठीक समझा है। मेरे मन्त्रका ही ऐसा पराक्रम है। मैं प्रतिदिन भगवान् शिवके समीप षडक्षर मन्त्र (ॐ नमः शिवाय) का आठ हजार जप करता हूँ, इससे तीनों कालमें मेरी युवावस्था सदा स्थिर रहती है। मुझे भूत और भविष्यका ज्ञान है और मेरा जीवन सदा सुखमय बना रहता है। मेरी आयु लाखों वर्षोंकी हो गयी है, तथापि अभी प्रथम अवस्था (किशोरावस्था) ही दिखायी देती है।<br><br>एक समय मेरी स्त्रीकी मृत्यु हो जानेपर जब मैं उसके लिये शोक कर रहा था, तब मेरे सुहृदोंने मुझसे कहा—'अरे भैया! तुम शोक क्योंकरते हो? एक दिन हम सभीकी मृत्यु होनेवाली है। इसके लिये रोना क्या है। तुमने अपनी प्रियाको पहलेसे नहीं देखा था, वह अदर्शनसे ही तुम्हें प्राप्त हुई थी और अब पुनः अदर्शनावस्थाको ही चली गयी है। न वह तुम्हारी थी, न तुम उसके। फिर व्यर्थ शोक क्यों करते हो? किसीका किसीके साथ सदा एक स्थानपर निवास नहीं होता। अपने शरीरके साथ भी मनुष्य सदा नहीं रह सकता। फिर इस शरीरसे भिन्न जो दूसरे लोग हैं, उनके साथ सदा संयोग कैसे रह सकता है। जो मरे हुए सम्बन्धी, खोयी हुई वस्तु और बीती हुई बातके लिये शोक करता है, वह दुःखसे दुःख उठाता है।' इस प्रकार वे सब सुहृद् मुझे समझा-बुझाकर घर ले आये। घर आनेपर मैंने यह प्रण किया कि 'जहाँ कहीं भी सर्पको देखूँगा, वहीं उसे डंडेसे मार डालूँगा; क्योंकि मेरी स्त्रीको सर्पने ही काट खाया है।' ऐसा निश्चय करके एक समय मैं घूमता हुआ चमत्कारपुरमें पहुँचा। वहाँ एक कुण्डसे निकलकर पड़े हुए विशाल जल-सर्पको देखा। देखते ही उसे मारनेके लिये मैंने डंडा उठाया, तब उस सर्पने कहा—'पहले मेरी बात सुन लो। फिर तुम्हें जो उचित प्रतीत हो, वह करना। ब्रह्मन्! वे सर्प दूसरे ही होते हैं, जो मनुष्योंको काटते हैं। हम तो पानीके साँप हैं, हमारा केवल रूप ही साँपका होता है, हममें विष नहीं होता।' उसके इस प्रकार कहनेपर भी मैंने डंडेका प्रहार कर ही दिया। उस डंडेका स्पर्श होते ही वह एक तेजस्वी महापुरुषके रूपमें परिणत हो गया। इस आश्चर्यको देखकर मैंने उन महापुरुषसे प्रणाम करके कहा—'प्रभो! मेरा अपराध क्षमा करें, आप कौन हैं?'<br><br>तब वे प्रसन्न होकर मुझसे बोले—मेरा वृत्तान्त सुनो। मैं पहले राजा चमत्कारके बनवाये हुए उत्तम नगरमें एक ब्राह्मण था। वहाँ भगवान् सिद्धेश्वरजीका एक उत्तम शिवालय है। किसी समय वहाँ यात्राका महोत्सव था। उस अवसरपर
१०८६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

बहुतसे ऋषि-मुनि आये और देवाधिदेव महेश्वरको प्रणाम करके उनके सम्मुख बैठ गये। फिर आपसमें कथा-वार्ता करने लगे। वे सभी दया और धर्मसे युक्त थे और उनमेंसे कितने ही महात्मा उस देवालयमें भक्तिपूर्वक नृत्य करते थे। इस प्रकार जब वहाँ महान् उत्सव हो रहा था, उस समय मैं बहुत-से समवयस्क युवकोंके साथ उस स्थानपर गया। मेरे दुष्ट साथियोंने उस उत्सवमें विघ्न डालनेके लिये मुझे बार-बार प्रेरित किया। तब मैं एक भयंकर आकारवाले विशाल जल सर्पको लेकर आगे बढ़ा और उस महान् जनसमुदायमें उसे फेंक दिया। सर्पको देखकर मृत्युके भयसे व्याकुल हो सब लोग भाग छूटे। वहीं सुमन नामवाले एक तपस्वी भी थे, जो अपने उत्तम शिष्योंके साथ वहाँ आकर समाधिमें स्थित थे। हृदयके भीतर कमलके आसनपर विराजमान उन्हीं वेदाधीश्वर महेश्वरका वे साक्षात्कार कर रहे थे, जो सर्वव्यापी, अविनाशी, सर्वज्ञ, अनिन्द्य, अभेद्य और जरा-मृत्युसे रहित बताये जाते हैं। तपस्वीके सब अंगोंमें रोमांच हो रहा था। उनके नेत्रोंसे आनन्दाश्रुओंकी अजस्र धारा प्रवाहित होकर उन्हें भिगो रही थी। इस प्रकार समाधिस्थ होकर अविचल भावसे बैठे हुए उन महात्माके शरीरको उस सर्पने अपने देहसे लपेट लिया। इसी समय उनका एक शिष्य वहाँ आ गया, जो बड़ा तपस्वी था। उसका नाम श्रीवर्धन था। उसने सर्पके शरीरसे लिपटे हुए गुरुको और पास ही खड़े हुए मुझको देखकर यह जान लिया कि 'इसीने यह दुष्टता की है।' तब उसने कुपित होकर कहा- 'यदि मैंने निर्विकल्प चित्तसे महादेवजीका ध्यान किया है, तो उस सत्यसे यह दुष्टात्मा ब्राह्मण ऐसे ही सर्पकी आकृतिवाला हो जाय।' उसके इतना कहते ही मैं तत्क्षण भयंकर सर्पशरीरको प्राप्त हो गया। तदनन्तर समाधिसे विरत होनेपर मुनिने अपने शरीरपर भयंकर आकारवाले सर्पको देखा। फिर सर्पकी ही आकृतिमें स्थित मुझे महान् दुःख उठाते हुए देखा और समीप खड़ी हुई सब जनताको तटस्थ एवं भयसे संत्रस्त पाया, तब उन्होंने ज्ञानदृष्टिसे सब कुछ जान लिया और मेरे प्रति दयाभावसे युक्त हो अपने शिष्यसे कहा- 'श्रीवर्धन! तुमने यह सब कर्म करके मेरा प्रिय नहीं किया है। इस दीन ब्राह्मणको शाप दिया। यह तपस्वियोंका धर्म नहीं है। जो मान और अपमानमें समान रहे, ढेला-पत्थर और सोनेको एक-सा समझे तथा शत्रु और मित्रके साथ एक-सा स्नेहपूर्ण बर्ताव करे, वही तपस्वी सिद्धिको प्राप्त होता है। तुमने अज्ञानवश इस ब्राह्मणको शाप दे दिया है, यह तुम्हारा बालचापल्य ही है। मेरी आज्ञासे इसके प्रति पुनः तुम्हें अपना प्रमाद प्रकट करना चाहिये।' यह सुनकर शिष्य श्रीवर्धनने हाथ जोड़ गुरुको प्रणाम करके कहा- 'मैंने ज्ञान अथवा अज्ञानसे जो बात कह दी है, वह निःसन्देह वैसी ही होगी।' गुरु बोले- 'वत्स! मैं जानता हूँ, तुम्हारी वाणी कभी झूठी नहीं हो सकती, तथापि मैं यह बार-बार कहता हूँ कि तपस्या और धर्मसे हीन पुरुषोंकी जो चाल होती है, वही तपस्वी मुनियोंकी नहीं होती। उन यतियोंके लिये तो एकमात्र क्षमा ही सिद्धि देनेवाली बतायी गयी है। अतः तपस्वीजनोंको सदा क्षमाका आदर्श सामने रखकर ही बर्ताव करना चाहिये। पापीके प्रति स्वयं भी पापी न बने, यही सनातन बुद्धि है। जो पापात्मा पाप करता है, वह स्वयं ही नष्ट हो जाता है। जो पापीके प्रति स्वयं भी पापपूर्ण बर्ताव करता है, वह उत्तम ज्ञानसे रहित है; क्योंकि वह जलेको ही जलाता है और मरे हुएको ही मारता है। जो अपना उपकार करनेवाले पुरुषोंके प्रति ही साधुतापूर्ण बर्ताव करता है, उसकी उस साधुतामें क्या विशेषता है। जो अपनी बुराई करनेवालोंके प्रति भी साधुभाव रखता है, वही जनताद्वारा साधु कहा जाता है*।' अपने


* उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः। अपकारिषु यः साधुः स साधुः कीर्त्यते जनैः ॥
(स्क० पु०, ना० २९। १८२-१८३)

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०८७

शिष्यसे ऐसा कहकर गुरुजीने परम दयासे युक्त हो मुझसे कहा—'सर्प! मेरे शिष्यकी बात झूठी नहीं हो सकती; अतः अब तुम कुछ कालतक सर्पके शरीरमें ही स्थित रहकर अपने उद्धारकी प्रतीक्षा करो।' तब मैंने पूछा—'मुनिश्रेष्ठ! मेरा शाप कब निवृत्त होगा।' उन्होंने उत्तर दिया—'जो शिवालयमें एक क्षण भी संगीत आदिका आयोजन करता है, उसके धर्मकी संख्या नहीं बतायी जा सकती, इसी प्रकार जो उस महोत्सवमें विघ्न डालता है, उसके पापकी भी कोई गणना नहीं कर सकता। इसलिये तुम भी पापी ब्राह्मण हो, अतः तुम्हारी मुक्ति इस समय नहीं होगी; तथापि मेरी एक बात सुनो। जो श्रद्धापूर्वक भगवान् शिवके षडक्षर मन्त्रका जप करता है, उसका ब्रह्महत्याजनित पाप भी नष्ट हो जाता है। दस बार षडक्षर मन्त्रके जपसे एक दिनका और बीस बारके जपसे मनुष्य एक वर्षका पाप धो डालता है, इसलिये अब तुम जलमें रहकर आदरपूर्वक इस मन्त्रका जप करो, जिससे जन्मान्तरमें किया हुआ तुम्हारा पाप भी क्षीण हो जाय। जब वत्स नामवाले एक ब्राह्मण तुम्हें रोषपूर्वक डंडेसे मारेंगे, उस समय तुम्हारा उद्धार हो जायगा।' इतना कहकर वे मुनि चुप हो गये और मैं इस जलाशयमें रहकर षडक्षर मन्त्रका जप करता रहा। द्विजश्रेष्ठ ! आज तुम्हारे प्रसादसे मैं सर्पयोनिसे मुक्त हो गया। अतः शीघ्र बताओ मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?

तब मैंने उस दिव्यरूपधारी सर्पसे कहा—'भगवन्! मुझे कुछ कल्याणकारी उपदेश दीजिये, जिससे मुझे अपनी प्रिय पत्नीके विनाशका दुःख न हो तथा निर्धनता, रोग और शत्रुसे पराजयका कष्ट भी न हो।' यह प्रश्न सुनकर उस श्रेष्ठ पुरुषने कहा—द्विजवर! भगवान् शिवका षडक्षर मन्त्र मनुष्योंका सब पाप और अमंगल हर लेनेवाला है। ब्रह्मन्! तुम रात-दिन उस मन्त्रका यथाशक्ति जप करते रहो। उसके जपसे सब पापोंसे मुक्त होकर तुम निःसन्देह अभीष्ट वस्तु प्राप्त करोगे। मैंने भी सदैव बड़े-बड़े पाप किये हैं, तथापि उस मन्त्रके माहात्म्यसे मुझे परम ऐश्वर्ययुक्त लोक प्राप्त हुए हैं। विप्रवर! यह परम गोपनीय मन्त्र मैंने तुमको बताया है, किसी नास्तिकको इसका उपदेश नहीं करना चाहिये। सब वेदोंमें अहिंसाको परम धर्म बताया गया है। विशेषतः ब्राह्मणके लिये तो हिंसा सर्वथा त्याज्य है। इसलिये तुम सर्पका वध त्याग दो। जो समस्त चराचर प्राणियोंको अभय देता है, वह इहलोक और परलोकमें सदा सब प्रकारके सुखसे सम्पन्न होता है। भगवान् शंकरके समान कोई देवता नहीं है, गंगाके समान दूसरी नदी नहीं है, हिंसाके समान पाप नहीं है और दयासे बढ़कर कोई धर्म नहीं है*।

तदनन्तर वह अहिंसारूप धर्म सुनकर मैंने परलोकके भयसे दुःखित होकर उस ब्राह्मणसे पूछा—'भगवन्! मैंने बड़े-बूढ़ोंके मुखसे यह बात सुनी है कि राजा यदि वनमें मृगोंका वध करे, तो उसे दोष नहीं लगता है तथा चिकित्सा-शास्त्रके विद्वान् कहते हैं कि मांस खानेवाले लोग विशेष पुष्ट तथा दीर्घजीवी होते हैं। अतः इस विषयमें मुझे परम हितकारक बात बताइये। आपके मुँहसे जो कोई बात निकलेगी, उसका मैं सन्देह-रहित होकर पालन करूँगा।' मेरी बात सुनकर वे पुनः इस प्रकार बोले—'द्विजश्रेष्ठ ! ऐसी बात न कहो। यह सब तो मांसलोभी दुष्ट पापात्माओंका मत है। अहो! संसारमें वे निर्दयी, पापात्मा एवं दुष्ट पुरुष अत्यन्त शोचनीय हैं, जो सब दोषोंकी खानरूप मांसका आस्वादन


* चराचराणां भूतानामभयं यः प्रयच्छति। सर्वसौख्याढ्यो जायते दिवि चेह च॥
नास्ति भर्गसमो देवो नास्ति गंगासमा नदी। नास्ति हिंसासमं पापं नास्ति धर्मो दयापरः॥
(स्क० पु०, ना० २९। २२०-२२१)

१०८८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करते हैं। मांस न तो आयु बढ़ानेका साधन है और न आरोग्य तथा बलका ही हेतु है। उसे जो गुणकारक बताया जाता है, वह सब झूठ है। इसका दृष्टान्त मुझसे सुनो—मांसभोजी मनुष्य भी रोगसे पीड़ित, दुर्बल और स्वल्पायु देखे जाते हैं तथा जो मांस नहीं खाते, वे भी पृथ्वीपर नीरोग, दीर्घायु और हृष्ट-पुष्ट अंगोंवाले देखे जाते हैं। इसलिये मांसको सर्वथा त्याग देना चाहिये। जो जीवनकी इच्छा रखनेवाले जीवोंके मांस खाता है, वह घोर नरकमें जाता है और वहाँ उन्हीं प्राणियोंद्वारा वह स्वयं भक्षण किया जाता है। मांसकी उत्पत्ति घास, काठ या पत्थरसे नहीं होती, किसी जीवकी हिंसा करनेपर ही मांस मिलता है, अतः उसे सर्वथा त्याग देना चाहिये*। विद्वान् पुरुषोंको उचित है कि वे सब जीवोंको अपने ही समान देखें और पूरी शक्ति लगाकर उनकी रक्षा करें। जो जीवोंको मारता है, जो मारनेकी अनुमति देता है, जो उसे काट-काटकर अलग करता है, जो खरीदता और बेचता है, जो उसे पकाकर तैयार करता है, जो उसे परोसता है तथा जो खानेवाला है—ये आठ प्रकारके व्यक्ति घातक (हिंसक) माने गये हैं। खरीदनेवाला धनसे मारता है, खानेवाला भक्षणके द्वारा हत्या करता है तथा घातक वध और बन्धनके द्वारा मारता है। इस प्रकार जीवोंका तीन तरहसे वध होता है। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी जीवकी हिंसा नहीं करता, वह जरा-मृत्युसे रहित परम धामको प्राप्त होता है†। शाक, मूल और फलका भोजन करनेवाला ब्रह्मचर्यपरायण पुरुष भी यदि हिंसा-कर्ममें तत्पर है, तो उसे अपने नियम और व्रतका कोई फल नहीं मिलता। एक मनुष्य सौसे भी अधिक वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या करता है और दूसरा दयासे प्रेरित होकर केवल अहिंसा-व्रतका पालन करता है तो इन दोनोंमें जो दयालु पुरुष है, वही श्रेष्ठ है। जो मानव-दया-धर्मसे युक्त है, वह जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, दुर्लभ होनेपर भी उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है।' ऐसा कहकर वे महात्मा पुरुष मेरे देखते-देखते उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर स्वर्गलोकको चले गये। महामते! षडक्षर मन्त्रके माहात्म्यसे गन्धर्वलोग उनका यशोगान और किन्नर स्तुति करते थे।

उन महात्माके चले जानेपर मैंने भक्तिपूर्वक शिवमन्त्रकी दीक्षा ग्रहण की और तीनों सन्ध्याओंमें श्रद्धायुक्त हो भगवान् सिद्धेश्वरके समीप बैठकर मैं प्रतिदिन दस हजार मन्त्रका जप करने लगा। इसीसे मेरी युवावस्था स्थिर हो गयी है और मुझे लोकान्तरोंका ज्ञान एवं आकाशगमनकी शक्ति प्राप्त हो गयी है। द्वापरका अन्त होनेपर मैं सिद्धेश्वरजीका दर्शन करूँगा और सदा शिवलोकको प्राप्त होऊँगा। यह मैंने सत्य बात बतलायी है। सूतनन्दन! मैंने यह मोक्षदायक षडक्षरमन्त्रका माहात्म्य तुम्हें सुनाया है। जो मनुष्य उत्तम श्रद्धासे युक्त हो इसका सदा श्रवण करेगा, वह जन्मसे लेकर मृत्युतकके समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा। महाभाग! तुम भी इस मन्त्रका सदा जप किया करो।

**सूतजी कहते हैं—**महर्षियों! इस प्रकार पहले सद्गुरुके मुखसे सुना हुआ यह षडक्षर-माहात्म्य मैंने तुम्हारे समक्ष कहा है।


* न हि मांसं तृणात् काष्ठादुत्पलादपि जायते। हते जन्तौ भवेन्मांसं तस्मात्तत्परिवर्जयेत्॥
(स्क० पु०, ना० २९। २३२)

† हन्ता चैवानुमन्ता च विशस्ता क्रयविक्रयी। संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चाष्टघातकाः॥
धनेन क्रयकृद्धन्ति भक्षणेन च खादकः। घातको वधबन्धाभ्यामित्येवं त्रिविधो वधः॥
कर्मणा मनसा वाचा यो हिनस्ति न किञ्चन। स प्राप्नोति परं स्थानं जरामरणवर्जितम्॥
(स्क० पु०, ना० २९। २३४-२३७)

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १०८९ ---|---:

सप्तर्षि-आश्रमकी महिमा, सप्तर्षियोंका हाटकेश्वरक्षेत्रमें आगमन

सूतजी कहते हैं—द्विजवरो! हाटकेश्वरक्षेत्रमें सप्तर्षियोंका आश्रम हैं, जो समस्त कामनाओंको देनेवाला है। जो मनुष्य श्रावणमासकी पूर्णिमाको वहाँ स्नान करता है, वह मनोवांछित फलको पाता है। जो कन्द, मूल, फल और शाकद्वारा वहाँ श्राद्ध करता है, वह राजसूय तथा अश्वमेध दोनों यज्ञोंका फल पाता है। भाद्रपदमासके शुक्ल पक्षकी पंचमी तिथिमें वहाँ स्नान करके पुष्प, धूप और चन्दन आदिके द्वारा ऋषियोंका भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये। पूजनका मन्त्र इस प्रकार है—

ॐ अत्रये नमः, ॐ वसिष्ठाय नमः, ॐ कश्यपाय नमः, ॐ भरद्वाजाय नमः, ॐ गौतमाय नमः, ॐ कौशिकाय नमः, ॐ जमदग्नये नमः, ॐ अरुन्धत्यै नमः।

इस प्रकार उच्चारण करके पूजन करना चाहिये।

ब्रह्मर्षियो! पूर्वकालकी बात है। एक समय संसारमें बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं हुई। जीविकाकी साधनभूत समस्त ओषधियों (अन्न और फल आदि)-का नाश हो गया। इससे सब लोग भूखकी पीड़ासे व्याकुल हो गये। इस प्रकार अन्नका विनाश हो जानेसे जब सारा भूमण्डल भूखसे पीड़ित हो गया, तब सप्तर्षि लोग भी क्षुधासे व्याकुल होकर इधर-उधर भ्रमण करने लगे। घूमते-घूमते वे सब लोग वर्षार्दर्भि नामक राजाके राज्यमें गये। उनका आगमन सुनकर राजा वहाँ आये और इस प्रकार बोले—'मैं आपलोगोंको अन्न, ग्राम और धान-जौ आदि दूँगा।'

ऋषि बोले—राजन्! राजाका प्रतिग्रह बड़ा भयंकर होता है। वह स्वादमें मधुके समान है, किंतु परिणाममें विषके तुल्य होता है। अतः पुण्यात्मा ब्राह्मणोंको उसे दूरसे ही त्याग देना चाहिये। इसलिये तुम्हारा कल्याण हो, तुम घर लौट जाओ, हम तुम्हारा धन कदापि नहीं लेंगे। ऐसा कहकर ऋषिलोग चमत्कारपुरकी ओर चल दिये। तब राजाने गूलरके फलोंमें सोना भरकर उन फलोंको सप्तर्षियोंके मार्गमें बहुत आगे रखवा दिया। तब वे मुनि पृथ्वीपर गिरे हुए गूलरके फलोंको देखकर बड़े प्रसन्न हुए और भूखसे पीड़ित होनेके कारण उन सबको उठाने लगे। उन्हें भारी देख अत्रिने एक फल तोड़कर देखा और उसमें सुवर्ण देखकर कहा—'हमलोगोंकी ज्ञानशक्ति मन्द नहीं हुई है, हमारी बुद्धि मूढ़ नहीं है, जो कि इन फलोंको सुवर्णसे भरे हुए जानकर भी हम ग्रहण कर लें। अतः इन सुवर्णपूरित फलोंको दूरसे ही त्यागकर चल देंगे। एक मनुष्य सम्पूर्ण पृथ्वीका स्वामी है और दूसरा केवल निष्कामभावसे रहनेवाला अकिंचन है। इन दोनोंमें जो निष्काम पुरुष है, वही सौभाग्यशाली एवं श्रेष्ठ है।'

जमदग्नि बोले—जो अधम ब्राह्मण धन पाकर शोक करनेकी जगह प्रसन्न होता है, वह मन्दबुद्धि उससे होनेवाले नरकको नहीं देखता। दान लेनेमें समर्थ होकर भी जो उससे निवृत्त हैं, उन्हें वही लोक मिलता है, जो दाताओंको मिलता है।

कश्यपने कहा—मुने! यह जो धनका संग्रह प्राप्त हुआ है, सो महान् अनर्थरूप है; क्योंकि ऐश्वर्यसे मोहित चित्तवाला मानव आत्मकल्याणसे वंचित हो जाता है। अर्थसम्पत्ति मोहमें डालनेवाली है और मोह नरकमें गिरानेवाला है। अतः कल्याणकी इच्छा रखनेवाला पुरुष धनको प्रयत्नपूर्वक त्याग दे। धनके द्वारा जिस धर्मका साधन किया जाता है, वह नाशवान् बताया गया है और तपस्याद्वारा जिस धर्मका साधन किया जाता है, वह मोक्ष देनेवाला होता है, ऐसा मेरा विचार है।

भरद्वाजजी बोले—बुढ़ापेसे जीर्ण होनेवाले पुरुषके दाँत और केश जीर्ण हो जाते हैं, आँख और कान भी जीर्ण हो जाते हैं, परंतु उसकी

१०९० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तृष्णा तरुण होती जाती है। जैसे पूरे शरीरके बढ़नेके साथ-साथ प्रत्येक अंग भी वृद्धिको प्राप्त होता है, उसी प्रकार तृष्णा भी धनके बढ़नेके साथ-साथ बढ़ती रहती है। तृष्णाका कहीं अन्त नहीं है। उसे पूर्ण करना भी बहुत कठिन है, वह अपने साथ सैकड़ों दुःख लिये चलती है और उसके द्वारा प्रायः अधर्म ही होता है। अतः तृष्णाको सर्वथा त्याग देना चाहिये।^१

गौतमने कहा—जिसका मन सन्तुष्ट है, उसके लिये सर्वत्र सम्पत्तियाँ हैं। जिसने अपने पैरोंमें जूता पहन रखा है, उसके लिये सारी पृथ्वी ही चमड़ेसे आच्छादित है। सन्तोषरूपी अमृतसे तृप्त हुए शान्त चित्तवाले मनुष्योंको जो सुख प्राप्त होता है, वह धनके लोभमें पड़कर इधर-उधर दौड़ लगानेवाले लोगोंको कहाँसे मिल सकता है। असन्तोष सबसे महान् दुःख है और सन्तोष ही महान् सुख है। अतः सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुष सदैव सन्तुष्ट रहे।^२

विश्वामित्र बोले—किसी वस्तुकी इच्छा रखनेवाले पुरुषकी जब एक कामना पूरी हो जाती है, तब दूसरी वस्तुकी तृष्णा उसे बाणके समान बाँधने लगती है।

वसिष्ठजीने कहा—कामना रखनेवाला पुरुष सहस्रों कामनाएँ पाकर भी कभी सन्तुष्ट नहीं होता। जैसे घीकी आहुति देनेसे अग्नि प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार उसकी इच्छा रखनेवाला पुरुष मोहग्रस्त होनेके कारण कभी सुख नहीं पाता।

अरुन्धती बोलीं—जैसे अनन्त मृणालतन्तुएँ कमलनालमें जाकर स्थित हैं, उसी प्रकार देहधारियोंकी देहमें विद्यमान तृष्णा अनेक अनर्थोंका आश्रय है, खोटी बुद्धिवालोंके लिये जिसका त्याग करना अत्यन्त कठिन है, जो वृद्ध होनेपर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो प्राणान्तकारी रोगके समान है, उस तृष्णाका त्याग कर देनेवाले पुरुषको ही सुख मिलता है।^३

चण्डा बोली—मेरे ये स्वामीलोग जब इस धनसे सर्पकी भाँति डरते हैं, तो मुझे भी उस धनसे क्यों नहीं भय होगा।

पशुमुखने कहा—सदा धर्मपरायण विद्वान् पुरुष जैसा आचरण करते हैं, अपने हितकी इच्छा रखनेवाले विज्ञपुरुषको भी वैसा ही आचरण करना चाहिये।

सूतजी कहते हैं—ऐसा कहकर वे सप्तर्षिगण उन सुवर्णगर्भित फलोंको वहीं छोड़कर अन्यत्र चले गये। तत्पश्चात् उन्होंने चमत्कारपुरके क्षेत्रमें प्रवेश किया। वहाँ पहुँचते ही उन्हें सहसा अपने सामने आया हुआ शुनोमुख नामक संन्यासी दिखायी दिया। तब उसीके साथ वे किसी वनके भीतर गये। वहाँ जानेपर उन सबने कमलोंसे सुशोभित एक सुन्दर सरोवर देखा। तब भूखसे पीड़ित होनेके कारण उन्होंने उस पोखरेसे बहुतेरे मृणाल निकाले और किनारेपर रखकर सन्ध्या-तर्पण आदि पुण्यकर्मोंमें लग गये। तदनन्तर वे सब लोग जलसे निकलकर एक-दूसरेसे मिले। तब वहाँ उन मृणालोंको देखकर इस प्रकार कहने लगे।

ऋषि बोले—अहो! हम भूखसे पीड़ित हैं। इस दशामें भी किस निर्दयीने हमारे समस्त मृणाल इस स्थानसे चुरा लिये हैं।


१- अनन्तपारा दुष्पूरा तृष्णा दुःखशतावहा। अधर्मबहुला चैव तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ (स्क० पु०, ना० ३२।४५)
२- सर्वत्र सम्पदस्तस्य सन्तुष्टं यस्य मानसम्। उपानद्गूढपादस्य ननु चर्मावृतेव भूः॥
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्। कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥
असन्तोषं परं दुःखं सन्तोषं परमं सुखम्। सुखार्थी पुरुषस्तस्मात् सन्तुष्टः सततं भवेत्॥ (स्क० पु०, ना० ३२।४७-४९)
३- या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः। याऽसौ प्राणान्तको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्॥ (स्क० पु०, ना० ३२।५७)

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०९१

शुनोमुखने कहा—जिसने इन मृणालोंको चुराया है, वह साम आदि वेदोंको पढ़े, अतिथिप्रेमी गृहस्थ हो तथा निरन्तर सत्य बोले।

ऋषि बोले—वाह! आपने जो शपथ किये हैं, वे तो द्विजातियोंको अभीष्ट ही हैं। अतः यह निश्चय हो गया कि इन मृणालोंकी चोरी श्रीमान्ने ही की है।

शुनोमुखने कहा—निश्चय मैंने ही आपलोगोंके मृणाल चुराये हैं। आप मुझे इन्द्र जानें। द्विजवरो! आपमें लोभका अभाव देखकर मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ। अतः आप मेरे साथ शीघ्र स्वर्गलोकमें पधारें।

ऋषि बोले—देवराज! हम तो मोक्षमार्गके पथिक हैं। हमारे मनमें स्वर्गकी लिप्सा नहीं है। अतः इस तीर्थमें मोक्षके लिये हम तपस्या करेंगे।

जमदग्निने कहा—सुरेश्वर! हमने मृणालोंसे ही जीवन निर्वाह करते हुए समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीकी परिक्रमा की है। अब हमारे साथ आपका जो समागम हुआ है, इससे आपका ही कल्याण हो। आप यहाँसे स्वर्गलोकको पधारें।

इन्द्र बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वरो! मेरा दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता। इसलिये आपलोग अपनी कोई अभीष्ट वस्तु मुझसे ग्रहण करें।

ऋषियोंने कहा—इन्द्र! इस पृथ्वीपर हमारे नामसे यह आश्रम विख्यात हो और यहाँ आनेवाले मनुष्योंके सब पातकोंका नाश करनेवाला हो। हम सदा यहीं तपस्याके लिये तबतक निवास करेंगे, जबतक कि हमें सनातन-मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो जाती।

इन्द्र बोले—सप्तर्षियो! आपलोगोंका यह आश्रम तीनों लोकोंमें विख्यात होगा। जो जिस कामनाको मनमें लेकर श्रावणकी पूर्णिमाको यहाँ श्राद्ध करेगा, वह उस मनोरथको अवश्य प्राप्त करेगा। जो मनुष्य निष्कामभावसे यहाँ श्राद्ध अथवा दान करेगा, वह निस्सन्देह मोक्ष प्राप्त कर लेगा। जो आपलोगोंके शुभ आश्रमपर देहत्याग करेंगे, वे पापी होनेपर भी परम गतिको प्राप्त होंगे। जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो यहाँ इंगुदी, बेर अथवा बेल आदिसे भी पितरोंके लिये श्राद्ध करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त हो किन्नरगणोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ देवदुर्लभ परम सिद्धिको प्राप्त करेगा।

ऐसा कहकर इन्द्रदेव सब ऋषियोंसे प्रशंसित हो वहाँसे अन्तर्धान हो गये तथा वे सप्तर्षि वहीं रहने लगे। तदनन्तर दीर्घकाल व्यतीत होनेपर उन्होंने भी भारी तपस्या करके जरा-मृत्युरहित परमपद प्राप्त कर लिया। सप्तर्षियोंने अपने आश्रमपर त्रिशूलधारी भगवान् शिवके लिंगमय स्वरूपकी जो स्थापना की है, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। जो भक्तिपूर्वक पुष्प, धूप और चन्दन आदिसे उसका पूजन करता है, वह अवश्य मोक्षको प्राप्त होता है।


## अगस्त्य-आश्रममें शिव-पूजा आदिका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! हाटकेश्वरक्षेत्रमें एक दूसरा आश्रम महर्षि अगस्त्यका है। वहाँ साक्षात् विश्वात्मा भगवान् महेश्वर निवास करते हैं। वहाँ चैत्रमासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी तिथिको स्वयं भगवान् सूर्य आकर देवताओंके स्वामी महादेवजीकी पूजा करते हैं। जो कोई भी मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा करता है, वह उत्तम लोकोंमें जाता है और जो वहाँ श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके पितर उसी प्रकार तृप्त होते हैं, जैसे पितृमेध यज्ञसे उन्हें तृप्ति होती है। जिस समय विन्ध्याचल पर्वतने बढ़कर सूर्यदेवका मार्ग रोक लिया, उस समय वे सूर्यदेव ब्राह्मणका रूप धारण करके चमत्कार नामक नगरके क्षेत्रमें महर्षि अगस्त्यके आश्रमपर गये और बोले—'मुनिश्रेष्ठ! आज मैं आपके यहाँ अतिथिके रूपमें आया हूँ।'

अगस्त्यजीने प्रसन्नतापूर्वक कहा—मुने! स्वागत