भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1105

१०७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

विदूरथने विदैवतके लिये यथायोग्य श्राद्ध किया। फिर वह भी उसी प्रकार राजाको स्वप्नमें दिखायी दिया और मांसादकी ही भाँति कृतज्ञता प्रकट करके स्वर्गलोकमें चला गया। फिर तीसरे दिन राजाने पूर्ववत् श्रद्धापूर्ण हृदयसे कृतघ्नके लिये श्राद्ध किया। रातको उसने भी स्वप्नमें दर्शन दिया, किंतु वह उसी प्रेतरूपमें आया था और बड़े दुःखसे घिरा हुआ था।

कृतघ्न बोला—महाराज ! तड़ागके लिये नियत धनकी जिसने चोरी की है और जो सदा कृतघ्न रहा है—ऐसे मुझ पापात्माकी अभीतक मुक्ति नहीं हुई। अतः जिस प्रकार मुझे भी इस दुःखसे छुटकारा मिल जाय, वैसा कोई उपाय करो और अपनी की हुई सत्यप्रतिज्ञा पूरी करो। सत्य ही परब्रह्म है, सत्य ही परम तप है, सत्य ही परम ज्ञान है और सत्य ही परम शास्त्र है। सत्यके बलसे वायु चलती है। सत्यसे सूर्य तप रहा है और सत्य वचनसे ही समुद्र अपनी मर्यादाका लंघन नहीं करता। सत्यहीन मनुष्यके द्वारा किये हुए तीर्थ-सेवन, तप, दान, स्वाध्याय और गुरुसेवा—ये सब धर्म व्यर्थ हो जाते हैं। एक समय देवताओंद्वारा कौतूहलवश अपनी तुलापर एक ओर तो सम्पूर्ण धर्मोंको रखा और दूसरी ओर केवल सत्यको, परंतु सत्यका ही पलड़ा भारी रहा।^* इसलिये महामते ! तुम भी सत्यको ही आगे रखकर मेरा उद्धार करो। यह पुण्य तुम्हारे लिये तपस्यासे भी बढ़कर कल्याणका साधक होगा।

राजा विदूरथने पूछा—प्रेत ! तुम्हारी मुक्ति किस उपायसे हो सकती है, शीघ्र बताओ। दुष्कर होनेपर भी मैं उसे अवश्य करूँगा।

प्रेतने कहा—राजन् ! चमत्कारपुरमें जो हाटकेश्वरक्षेत्र है, वहीं कलियुगसे डरा हुआ गयाशीर्षतीर्थ प्लक्ष (पाकड़) नामक वृक्षके नीचे धूलमें छिपा हुआ है। उसके चारों ओर समयोचित शाक, कुशा और जंगली तिलके पौधे हैं। वहीं जाकर तुम तिल, अन्न, शाक और कुश आदि सामग्रियोंके द्वारा मेरे लिये श्राद्ध करो। ऐसा करनेपर शीघ्र मेरी मुक्ति हो जायगी।

प्रेतकी यह बात सुनकर दयालु राजा वहाँ गये और उसके बताये अनुसार उन्होंने सब कुछ किया। पहले जलके लिये वहाँ एक छोटा-सा कुआँ खोदा। फिर वेदोंके पारंगत श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बुलाकर कृतघ्नके उद्देश्यसे शास्त्रोक्तविधिके अनुसार श्राद्ध किया। उस श्राद्धके पूर्ण होते ही कृतघ्न दिव्यरूपधारी पुरुष होकर श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हुआ और विदूरथसे बोला—'प्रभो ! तुम्हारे प्रसादसे मैं इस भयंकर प्रेतशरीरसे मुक्त हो गया। अब मैं स्वर्गको जा रहा हूँ।'

सूतजी कहते हैं—तबसे लेकर गयाशीर्षक्षेत्रमें वह 'लघुकूप' प्रसिद्ध हो गया। वह उस क्षेत्रमें पितरोंको पुष्टि देनेवाला है। जो आश्विनमासमें पितृपक्षकी अमावास्याको वहाँ कालशाक, जंगली तिल, तैयार किये हुए अन्न तथा कुशा आदिके द्वारा श्रद्धापूर्वक पितरोंका श्राद्ध करता है वह उत्तम फलका भागी होता है। अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, आज्यप और सोमप—ये पितृगण वहाँ सदा निवास करते हैं; अतः उस तीर्थमें जाकर समय या असमयमें सदा ही प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिये।


^* सत्यमेव परं ब्रह्म सत्यमेव परं तपः। सत्यमेव परं ज्ञानं सत्यमेव परं श्रुतम्॥
सत्येन वायुर्वहति सत्येन तपते रविः। सागरः सत्यवाक्येन मर्यादां न विलङ्घयेत्॥
तीर्थसेवा तपो दानं स्वाध्यायो गुरुसेवनम्। सर्वं सत्यविहीनस्य व्यर्थं सञ्जायते यतः॥
सर्वे धर्मा धृताः पूर्वमेकतोऽन्यत्र वै ऋतम्। तुलाया कौतुकाद्देवैर्जातं तत्र ऋतं गुरु॥
(स्क० पु०, ना० १९। २०—२३)