संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १०७७ |
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मार्कण्डेय मुनिको अमरत्वकी प्राप्ति, ब्रह्माजीकी स्थापना, बालसख्यतीर्थकी महिमा
सूतजी कहते हैं—चमत्कारपुरके समीप मृकण्ड नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ द्विज थे, जो वेदवेत्ता विद्वानोंमें अग्रगण्य माने जाते थे। वे वानप्रस्थ-आश्रममें स्थित थे। वहाँ उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की थी। जिस समय वे गृहस्थ थे, तभी ढलती अवस्थामें उनके एक सर्वशुभ-लक्षणसम्पन्न पुत्र हुआ था। पिताने उसका नाम ‘मार्कण्ड’ रखा था। वानप्रस्थी पिताके आश्रममें ही बालकका लालन-पालन हुआ और वह जल्दी बढ़ गया। धीरे-धीरे उसकी अवस्था पाँच वर्षकी हो गयी। एक दिन जब वह पिताकी गोदमें बैठकर खेल रहा था, उसी समय वहाँ कोई सामुद्रिक शास्त्रका विद्वान् आया। उसने नखसे लेकर शिखातक उस बालककी ओर देखा। देखकर उसके नेत्र आश्चर्यसे चकित हो गये। फिर वह किंचित् मुसकराया।
मृकण्ड मुनिने उसे हँसते देख विनीतभावसे पूछा—'विप्रवर! मेरे इस पुत्रकी ओर देखकर आप चकित क्यों हो गये थे और फिर हँसे क्यों?' उनके बारंबार इस प्रकार पूछनेपर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने कहा—'मुने! इस शिशुके जो लक्षण देखे जाते हैं, वे यदि किसी मनुष्यके शरीरमें हों तो वह अजर-अमर होता है। परंतु इसमें जो एक विशेष लक्षण है उससे सूचित होता है कि आजके दिनसे छः महीने पूरे होते ही इसकी मृत्यु हो जायगी। ऐसा जानकर आप आजसे इसके लिये लोक-परलोकमें हितकर कार्य कीजिये।'
यों कहकर वह उत्तम ब्राह्मण अपनी अभीष्ट दिशाको चला गया। तब मृकण्ड मुनिने मन-ही-मन कुछ सोच-विचारकर उचित समयसे पहले ही बालकका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। फिर उसे कर्तव्यका उपदेश देते हुए कहा—'बेटा! तुम जिस किसी भी ब्राह्मणको देखना उसे अवश्य विनयपूर्वक प्रणाम करना।' इस प्रकार व्रतमें स्थित हुए उस बालकके छः महीने पूर्ण होनेमें केवल तीन दिन शेष रह गये। वह सदा प्रत्येक ब्राह्मणको प्रणाम करता रहा। इसी बीचमें तीर्थयात्रापरायण सप्तर्षिगण उधर आ निकले, जहाँ वह मेखलाधारी मार्कण्ड खड़ा था। उसने उन सब मुनियोंको बारी-बारीसे प्रणाम किया और सबने पृथक्-पृथक् उसे ‘दीर्घायु’ होनेका आशीर्वाद दिया। तदनन्तर मुनिवर वसिष्ठने उस बालब्रह्मचारीकी ओर देखते हुए कहा—'हम सबने इस शिशुको दीर्घायु होनेका आशीर्वाद दिया है, परंतु यह तो आजके तीसरे ही दिन प्राण त्याग देगा; अतः हमलोगोंके वचनका इस प्रकार असत्य होना कदापि उचित नहीं है। इसलिये ऐसा कोई उपाय किया जाय जिससे यह बालक चिरंजीवी हो जाय।'
तदनन्तर वे सब महर्षि परस्पर विचार करके इस निश्चय पर पहुँचे कि 'ब्रह्माजीको छोड़कर दूसरा कोई इसके जीवनका उपाय नहीं है। अतः इस बालकको उनके आगे ले जाकर उन्हींकी आज्ञासे इसे चिरंजीवी बनाना चाहिये।' ऐसा निर्णय करके तीर्थभ्रमणका कार्य रोककर उस ब्रह्मचारीको साथ ले वे शीघ्र ही ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे। वहाँ ब्रह्माजीको प्रणाम करके वेदोक्त स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करनेके पश्चात् सब मुनि बैठे। इसके बाद उस बालकने भी ब्रह्माजीको प्रणाम किया और ब्रह्माजीने भी उसे दीर्घायु होनेका आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् ब्रह्माजीने सप्तर्षियोंसे पूछा—'तुमलोग कहाँसे और किसलिये इस समय यहाँ आये हो और यह उत्तम व्रत धारण करनेवाला बालक कौन है?'
सप्तर्षि बोले—पितामह! हमलोग तीर्थयात्राके प्रसंगसे पृथ्वीपर सब ओर घूमते हुए चमत्कारपुरके समीपतक गये थे। वहाँ इस बालकने हम सबको प्रणाम किया और क्रमशः हम सबने इसे दीर्घायु