भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1107

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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


होनेका आशीर्वाद दिया। परंतु इसकी आयु तो तीन दिन ही शेष रह गयी है, इसीलिये हम बहुत लज्जित हैं और इसे लेकर आपके पास आये हैं। यहाँ आनेपर आपने भी इस बालकको दीर्घायु होनेका आशीर्वाद दिया है। अतः आप और हम सब लोग सत्यवादी बने रहें, इसके लिये कोई उपाय आप करें।

मुनियोंका यह वचन सुनकर ब्रह्माजीने हँसते हुए कहा—यह बालक मेरे प्रसादसे वेद-विद्यामें प्रवीण तथा जरामृत्युसे रहित होगा। इसमें सन्देह नहीं है। अतः अब इसे शीघ्र भूतलपर ले जाकर इसके घर पहुँचा दो। यह सुनकर सप्तर्षि उस बालकको लेकर उसके पिताके आश्रमके समीप आये और अग्नितीर्थमें छोड़कर स्वयं तीर्थस्नानके लिये चले गये। इधर पुत्र-स्नेही मृकण्ड मुनि अपने पुत्रको न देख दुःखी हो विलाप करते थे, इतनेमें ही बालक मार्कण्डेय पिता-माताके निकट आ गया। उसे आते देख ब्राह्मण और ब्राह्मणी दोनों उसकी ओर दौड़े और बार-बार हृदयसे लगाकर पूछने लगे—'बेटा! अपनी मातासहित मुझको शोकके समुद्रमें डालकर तुम आश्रमसे कहाँ चले गये थे और अब कहाँसे आये हो? फिर कभी ऐसा न करना।'

मार्कण्डेयजी बोले—पिताजी! आज यहाँ मुनिलोग पधारे थे। मैंने आपकी आज्ञाका स्मरण रखते हुए बारी-बारीसे उन सबको विनयपूर्वक प्रणाम किया और उन्होंने मुझे दीर्घायु होनेका आशीर्वाद दिया। तब उनमेंसे वसिष्ठजीने हँसकर कहा—'मुनियो! आपने जिस बालकको 'दीर्घायु' कहा है, वह आजसे तीसरे ही दिन मृत्युको प्राप्त होनेवाला है।' तब असत्यसे डरे हुए उन महर्षियोंने तत्क्षण मुझे ब्रह्मलोकमें पहुँचा दिया। वहाँ जानेपर मैंने ब्रह्माजीको प्रणाम किया तब उन्होंने भी 'दीर्घायु' होनेका आशीर्वाद दिया। तब उन मुनियोंने मुझे आशीर्वाद देनेका सब वृत्तान्त कहा और यह अनुरोध किया कि 'पितामह! आपके प्रसादसे यह बालक जिस प्रकार दीर्घायु हो सके वैसा यत्न कीजिये।' तब ब्रह्माजीने मुझे अजर-अमर बना दिया और तुरंत उन सप्तर्षियोंके साथ घरको भेज दिया। वे मुनि मुझे आश्रमके समीप छोड़कर कुण्डमें स्नान करनेके लिये चले गये हैं।

मार्कण्डेयकी यह बात सुनकर मृकण्ड मुनिको बड़ा हर्ष हुआ। वे तुरंत उस स्थानपर गये जहाँ मुनिलोग स्थित थे। उन सबको प्रणाम करके वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये और बोले—'मुनिवरो! आपलोगोंके प्रसादसे आज मेरे कुलकी वृद्धि हुई। किन्हीं आचार्योंने यह बहुत उत्तम बात कही है कि साधुपुरुषोंकी सेवा करके मनुष्य तीनों लोकोंमें ख्याति लाभ करता है। साधुजनोंका दर्शन पवित्र है, क्योंकि साधुपुरुष तीर्थस्वरूप हैं। तीर्थ तो कुछ समयके बाद ही फलता है; परंतु साधुपुरुषोंका समागम तत्काल फल देता है*। अतः आज आप सब लोग मेरे घर अतिथिरूपसे आये हैं; बताइये मैं किस प्रकार आपका आतिथ्य करूँ।'

ऋषि बोले—मुने! हमारे लिये तो यही करोड़ों आतिथ्यके तुल्य है कि आपका अल्पायु बालक भी अमर हो गया।

मृकण्डने कहा—मुनीश्वरो! जिसे मृत्युने गलेसे लगा लिया था, मेरे उस बालककी रक्षा करके आपने समस्त कुलका उद्धार कर दिया है। ब्रह्मघाती, शराबी, चोर तथा व्रतको भंग करनेवाले पापीके लिये सत्पुरुषोंने प्रायश्चित्त बताया है; परंतु कृतघ्नके उद्धारका कोई उपाय नहीं है। अतः मुनीश्वरो! मुझपर कृतघ्नताका दोष न आवे, ऐसा उपाय आपको करना चाहिये।

ऋषि बोले—द्विजश्रेष्ठ! यदि आप कोई प्रत्युपकार करना ही चाहते हैं तो हमारे कहनेसे यहाँ ब्रह्माजीके लिये, जिन्होंने आपके पुत्रको अमर बनाया है, एक मन्दिर बनवाइये और इस तीर्थमें ब्रह्माजीकी स्थापना कीजिये। तत्पश्चात् स्वयं भी


* साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधवः। तीर्थं फलति कालेन सद्यः साधुसमागमः॥ (स्क० पु०, ना० २१। ६८)