संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०७९
आप पुत्रके साथ यहाँ रहकर दिन-रात उनकी आराधना करें। हम और दूसरे ब्राह्मण भी आपके साथ रहकर नित्यप्रति पितामहका पूजन करेंगे। यहाँ आपके बालकके साथ हमारा सख्यसम्बन्ध स्थापित हुआ है, इसलिये यह तीर्थ 'बालसख्य' के नामसे प्रसिद्ध होगा। हमारे वचनसे यह तीर्थ सदा रोगी और भयभीत पुरुषोंको रोग एवं भयसे मुक्त करेगा। जो लोग इस तीर्थमें अपने रोगार्त, भयार्त अथवा ग्रहपीड़ित बालकोंको स्नान करायेंगे, उनके वे बालक सब दोषोंसे रहित हो जायँगे। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक निष्कामभावसे इस तीर्थमें स्नान करेंगे वे उत्तम गतिको प्राप्त होंगे।
ऐसा कहकर वे सभी मुनीश्वर मृकण्ड मुनिकी अनुमति ले अन्य तीर्थोंमें चले गये। तत्पश्चात् पुत्रसहित मृकण्ड मुनिने ज्येष्ठमासकी पूर्णिमाको ज्येष्ठा नक्षत्रमें चन्द्रमाके स्थित होनेपर ब्रह्माजीकी स्थापना की और आलस्य छोड़कर वे दिन-रात श्रद्धापूर्वक उनकी आराधनामें लगे रहे। इससे उन्हें उत्तम गतिकी प्राप्ति हुई। ब्राह्मणो! जो बालक ज्येष्ठमासके ज्येष्ठा नक्षत्रमें वहाँ स्नान करता है, वह एक वर्षतक ग्रहादिजनित पीड़ाका अनुभव नहीं करता है।
मृगपदतीर्थ और विष्णुपदतीर्थका प्रादुर्भाव तथा माहात्म्य, विष्णुपदीमें स्नान और विष्णुपदके स्पर्श आदिका महत्त्व
सूतजी कहते हैं—उसी तीर्थके पश्चिम भागमें परम उत्तम एवं अतिशय पवित्र मृगतीर्थ है, जो समस्त भूतलमें विख्यात है। जो मानव उस तीर्थमें पूर्ण श्रद्धाके साथ चैत्र शुक्ला चतुर्दशीको मध्याह्नकालमें स्नान करते हैं वे समस्त दोषों और पापोंसे युक्त होनेपर भी किसी प्रकार पशु-पक्षियोंकी योनिमें नहीं जाते। जो कृतघ्न, नास्तिक, चोर तथा राजनिन्दक हैं वे भी वहाँ स्नान करके परम गतिको प्राप्त होते हैं।
ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन! उस क्षेत्रमें मृगतीर्थका आविर्भाव कैसे हुआ?
सूतजीने कहा—महर्षियो! पूर्वकालमें उस विशाल वनके भीतर एक दिन बहुत-से महाभयंकर व्याध अपने हाथोंमें धनुष लिये आ पहुँचे। उस समय एक वृक्षके नीचे मृगोंका झुंड विश्वस्त होकर बैठा था। व्याधोंकी दृष्टि उनके ऊपर पड़ी। मृग भी उन व्याधोंको दूरसे ही देखकर भयसे व्याकुल हो भाग चले और पास ही गहरे जलाशयको देख उसीमें समा गये। जलके भीतर प्रवेश करते ही वे सब मृग उसी तीर्थके प्रभावसे मानव-शरीरको प्राप्त हो गये। तब उनसे व्याधोंने पूछा—'भद्रपुरुषो! इस मार्गसे अभी-अभी मृगोंका झुंड आया है, बताइये वह किस मार्गसे निकला है?'
वे मनुष्य बोले—हमलोग ही वे मृग हैं। इस तीर्थके प्रभावसे हमने दुर्लभ मानव-शरीर प्राप्त कर लिया है।
यह सुनकर सब व्याध बड़े विस्मयमें पड़े और उन्होंने भी धनुष-बाण फेंककर उस तीर्थमें स्नान किया। स्नान करते ही वे दिव्य शरीरसे युक्त श्रेष्ठ राजा हो गये। प्राचीन कालमें जहाँ स्नान करके राजा त्रिशंकु उत्तम शरीरको प्राप्त हुए थे, उसी जलाशयमें स्नान करनेके कारण वे वधिक सब पापोंसे मुक्त होकर उत्तम शरीरको प्राप्त हुए।
उस शुभ तीर्थमें विष्णुपद नामसे प्रसिद्ध एक अन्य तीर्थ भी है जो समस्त पातकोंका नाश करनेवाला है। दक्षिणायन आरम्भ होनेपर मनुष्य एकाग्रचित्त हो वहाँ विष्णुपदका पूजन करे और श्रद्धापूर्वक भगवान्को आत्मनिवेदन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष दक्षिणायनमें मरनेपर भी भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त होता है, इसमें सन्देह