संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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नहीं है। इसी प्रकार उत्तरायण आरम्भ होनेपर भी विधिपूर्वक विष्णुपदका पूजन करके एकाग्रचित्त हो भक्तिभावसे आत्मनिवेदन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष भी भगवान् विष्णुके पुण्यधामको प्राप्त होकर सुखी होता है।
ऋषियोंने पूछा—भगवान् विष्णुका चरण उस तीर्थमें कैसे प्राप्त हुआ और वहाँ किस प्रकार आत्मनिवेदन किया जाता है?
सूतजीने कहा—सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने जिस समय बलिको बाँधा था, उस समय अपने तीन पगोंसे चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंको नाप लिया था। भगवान्के उन तीन पगोंमेंसे पहला पग इसी हाटकेश्वरक्षेत्रमें पड़ा था। दूसरा पग उन्होंने महर्लोकमें रखा। फिर भगवान् चक्रपाणिने जब तीसरा पग रखनेका उद्योग किया तब उनके अंगुष्ठके अग्रभागसे ब्रह्माण्ड फूट गया और अत्यन्त लघुताको प्राप्त हो गया। फूटे ब्रह्माण्डके उस छिद्रसे निकला हुआ वह जल भगवान्के अंगुष्ठाग्रसे होता हुआ क्रमशः पृथ्वीतलपर आया। चन्द्रमाके समान उज्ज्वल जलसे विभूषित उस तीर्थको लोकमें विष्णुपदी गंगा कहते हैं। इस प्रकार उस क्षेत्रमें जब भगवान् विष्णुका चरण प्राप्त हुआ तब प्राणियोंके सब पापोंका नाश करनेवाली विष्णुपदी नामक एक नदी प्रकट हुई। जो उसमें श्रद्धापूर्वक स्नान करके भगवान् विष्णुके चरणका स्पर्श करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। जो उत्तम श्रद्धासे युक्त हो विष्णुपदीके तटपर श्राद्ध करता है, वह गयामें श्राद्ध करनेका फल पाता है। जो मनुष्य सदा माघमासमें प्रातःकाल उठकर स्नान करता है, वह प्रयागमें स्नानका फल पाता है। जो एक वर्षतक वहाँ निवास करके भक्तिपूर्वक उसमें स्नान करता है, वह मनुष्य मोक्षका भागी होता है। जिसकी हड्डियाँ उस तीर्थके जलमें डाल दी जाती हैं, वह परम गतिको प्राप्त होता है। जो प्याससे पीड़ित होकर बिना भक्तिके भी उस तीर्थके जलमें प्रवेश करते हैं, वे भी पापमुक्त हो शरीरका अन्त होनेके पश्चात् भगवान् विष्णुके जरा-मृत्यु-रहित परम धाममें जाते हैं। फिर जो पर्वकाल उपस्थित होनेपर श्रद्धापूर्वक स्नान करके वेदके ज्ञाता श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान देते हैं, उनके लिये क्या कहना है! इसलिये जो मनुष्य अपने कल्याणकी इच्छा रखता है, वह प्रयत्न-पूर्वक विष्णुपदीके जलमें स्नान तथा विष्णुपदका स्पर्श करे।
दक्षिणायन अथवा उत्तरायण प्राप्त होनेपर श्रीविष्णुपदका पूजन करके इस मन्त्रका उच्चारण करे—
षण्मासाभ्यन्तरे मृत्युर्यद्यकस्माद् भवेन्मम।
तत्ते पदं गतिर्मे स्यात् स्यामहं भृत्यतां गतः॥
'भगवान्! यदि छः महीनेके भीतर मेरी अकस्मात् मृत्यु हो जाय तो आपके चरणोंमें ही मुझे आश्रय मिले और मैं आपका सेवक (पार्षद) होऊँ।'
श्रीहरिसे ऐसा कहकर तत्पश्चात् ब्राह्मणोंका पूजन करे और उन्हींके साथ भोजन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष उत्तम गतिको प्राप्त होता है।
विष्णुपदीकी अद्भुत महिमा, चण्डशर्माकी शुद्धि
सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! पूर्वकालकी बात है। चमत्कारपुरमें उत्तम व्रतका पालन करनेवाले चण्डशर्मा नामसे विख्यात एक ब्राह्मण हो गये हैं, जो रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न थे। वे जब युवावस्थामें पहुँचे तब किसी वेश्यामें आसक्त हो गये। एक समय आधी रातमें वे प्याससे व्याकुल होकर उठे तो उस वेश्यासे बोले—'प्रिये! मैं पानी पीना चाहता हूँ।' तब उस वेश्याने पानीके भ्रमसे उन निद्राकुल ब्राह्मणको मदिरासे भरा हुआ पुरवा लाकर दे दिया। मुखमें मदिरा जाते ही ब्राह्मण कुपित हो उठे और उस वेश्याको बार-बार धिक्कारते हुए कड़ी फटकार