भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1104
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०७५

तथापि इनके द्वारा कोई सिद्धि नहीं मिलती। उलटे इन गुणोंके कारण खेद ही अधिक होता है, क्योंकि प्रेतयोनियाँ किसी भी शुभ कर्मके करनेमें समर्थ नहीं हैं।

राजा बोले—यदि मैं इस महान् वनसे घरको लौट जाऊँगा तो निश्चय ही तुम सब लोगोंके लिये गयाश्राद्ध करूँगा और यत्नपूर्वक सब उपायोंसे तुम्हारा उद्धार करूँगा। इस समय तुम मुझे मनुष्योंसे सेवित कोई जलाशय बतलाओ जिससे जल प्राप्त करके मैं तुम्हारा उपकार करूँ।

मांसादने कहा—महाराज! इस स्थानसे थोड़ी ही दूरपर एक जलाशय है, जो नाना प्रकारके वृक्षोंसे घिरा हुआ और चित्तको आह्लाद प्रदान करनेवाला है। तुम यहाँसे सीधे उत्तरकी ओर चले जाओ।

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर राजा विदूरथ धीरे-धीरे उत्तर दिशाकी ओर चले। थोड़ी ही दूरपर हरे-भरे वृक्षोंका समुदाय दिखायी दिया। वहाँ हंस, बक तथा सारस आदि पक्षी उड़ रहे थे। वहाँ पहुँचकर राजाने सौम्य प्राणियोंसे सुसेवित एक मनोहर आश्रम देखा। वहाँ एक वृक्षके नीचे तपस्वीजनोंसे सेवित मुनिश्रेष्ठ जैमिनि विराजमान थे। उनके समीप जाकर महाराजने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और भूमिपर बैठे हुए मुनिके शिष्योंको भी प्रणाम किया। उन सबने राजाको देखकर पूछा—'महाराज! इन निर्जन वनमें तुम कहाँसे आये हो?'

राजाने कहा—इस समय मुझे प्यास सता रही है, अतः पहले पानी पीकर पीछे मैं अपना सब हाल बताऊँगा।

तब उन्होंने राजाको जल दिखा दिया। राजाने उसमें प्रवेश करके जल पीकर प्यास बुझायी और नीचे गिरे हुए वृक्षोंके फल लेकर इच्छापूर्वक भोजन किया। पूर्णतः तृप्त होनेपर वे पुनः महर्षि जैमिनिके समीप आये और प्रणाम करके बैठ गये। तदनन्तर अपना वृत्तान्त कहना प्रारम्भ किया—

‘मुनिवरो! मैं विदूरथ नामसे प्रसिद्ध राजा हूँ। माहिष्मती पुरीमें मेरा निवासस्थान है। मैंने अपनी सेना साथ लेकर इस भयंकर वनमें प्रवेश किया था। मेरे सब सैनिक लताओं और झाड़ियोंकी आड़में छिपकर मुझसे अदृश्य हो गये। पता नहीं उन सैनिकोंका क्या हाल है। मेरा घोड़ा भी एक स्थानपर गिर गया। मेरी आयु शेष थी कि मैं घूमता हुआ यहाँ आ पहुँचा। मुनिवरो! अब सन्ध्याका समय आ गया है। अतः हम सब लोगोंको यथायोग्य सन्ध्योपासन आदि विधि करनी चाहिये।'

तत्पश्चात् मुनियों तथा राजाने सन्ध्योपासना की। धीरे-धीरे रात्रि हो गयी। इसी समय राजाकी सेनाके कुछ मनुष्य उन्हें ढूँढ़ते हुए वहाँ आ पहुँचे और उन्हें देखकर बड़े आदरसे बोले—'अहोभाग्य! जो महाराज मिल गये।' यों कहकर वे राजाके चरणोंमें गिर गये। फिर उठकर उन्होंने राजासे सैनिकोंके कष्ट, जो देखे और सुने थे, बतलाये। तदनन्तर उन सब सेवकोंके साथ राजा वृक्षके नीचे पत्ते बिछाकर सो रहे। प्रातःकाल उठकर उन्होंने पूर्वाह्निककृत्य—स्नान, सन्ध्योपासन आदि पूरा किया। तत्पश्चात् मुनिवर जैमिनिको प्रणाम करके उनकी आज्ञा ले अपने सेवकोंके साथ माहिष्मती पुरीकी ओर प्रस्थान किया। मार्ग पूछते हुए धीरे-धीरे चलकर राजा कुछ कालमें अपने निवासस्थानपर जा पहुँचे और कुछ समय विश्राम करके उन्होंने शीघ्र ही गयाशीर्षकी यात्रा कर दी। समयानुसार वहाँ पहुँचकर राजाने स्नान किया और धुले हुए वस्त्र पहनकर पवित्र हो श्रद्धायुक्त हृदयसे पहले मांसादका श्राद्ध किया। तदनन्तर रातमें सोते समय स्वप्नमें उन्होंने देखा, मांसाद दिव्य माला और वस्त्र धारण किये दिव्य विमानपर आरूढ़ है। उस समय मांसादने राजासे कहा—'भूपाल! तुम्हारे प्रसादसे मैं प्रेतयोनिसे मुक्त हो गया हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, मैं स्वर्गलोकको जाऊँगा।'

तब प्रातःकाल उठकर हर्षमें भरे हुए राजा