संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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शय्यापर सोनेवाला है और जो वेदों एवं ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है, ब्राह्मणकुलमें पैदा होकर मांस खाता है और सदा प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह प्रेत होता है। जो परायी स्त्रीमें आसक्त, दूसरेका धन हड़प लेनेवाला तथा परायी निन्दासे सन्तुष्ट होनेवाला है और जो धनकी इच्छासे नीच एवं वृद्ध पुरुषके साथ अपनी कन्याका व्याह कर देता है, वह प्रेत होता है। जो मनुष्य उत्तम कुलमें उत्पन्न, विनयशील और दोषरहित धर्मपत्नीका त्याग करता है, जो देवता, स्त्री और गुरुका धन लेकर उसे लौटा नहीं देता है तथा जो ब्राह्मणोंके लिये धनका दान होता देख उसमें विघ्न डालता है, वह प्रेत होता है।
राजाने पूछा—मांसाद! अब यह बताओ कि कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्य प्रेत नहीं होता है?
मांसाद बोला—जो परायी स्त्रियोंको माताके समान, दूसरोंके धनको मिट्टीके ढेलेके समान तथा सब प्राणियोंको अपने समान देखता है, वह प्रेत नहीं होता। जो सदा अन्नदानमें तत्पर, विशेषतः अतिथि-सत्कारमें प्रेम रखनेवाला, स्वाध्यायशील और व्रतपरायण होता है, वह प्रेत नहीं होता। जो शत्रु और मित्रमें समभाव रखनेवाला और मान तथा अपमानमें भी समताका त्याग न करनेवाला है, वह प्रेत नहीं होता। जो धर्ममें लगे हुए तथा धर्ममार्गपर चलनेवाले मनुष्योंका उत्साह बढ़ाता है, वह भी प्रेत नहीं होता। जो सदा यज्ञकर्ममें तत्पर, सदैव तीर्थयात्रापरायण तथा सर्वदा शास्त्र-श्रवण करनेवाला है, वह मनुष्य प्रेत नहीं होता। जो बावली, कुआँ और पोखरा बनवाता, बगीचे लगाता और पौंसले (प्याऊ) चलाता है, वह प्रेत नहीं होता। राजन्! हम इस प्रेतयोनिसे बहुत कष्ट पा रहे हैं। तुम हमारा उद्धार करनेवाले हो जाओ। गयाशीर्ष नामक पवित्र तीर्थमें जाकर तुम हम तीनोंके लिये पृथक्-पृथक् श्राद्ध करो, जिससे हमारी यह प्रेतयोनि निवृत्त हो जाय।
राजा बोले—जिस योनिमें इस प्रकार पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण होता है, आकाशमें भी चलनेकी शक्ति प्राप्त है और धर्म तथा अधर्मका सम्यक् ज्ञान है, उसकी तुम निन्दा क्यों करते हो?
मांसादने कहा—राजन्! यह प्रेतयोनि अधम देवयोनि कहलाती है। इसमें केवल तीन ही गुण हैं—पूर्वजन्मका स्मरण, आकाशगमनकी शक्ति तथा धर्म और अधर्मका निश्चय। इसके सिवा इसमें सब दोष-ही-दोष भरे हैं। यदि हमलोग इस वनकी सीमासे बाहर जाते हैं तो हमारे ऊपर बिना देखे हुए मुद्गरोंकी मार पड़ती है। इसके सिवा समस्त धार्मिक क्रियाओंका अनुष्ठान केवल मनुष्यके लिये विहित है, प्रेतयोनि अथवा देवयोनिमें गये हुए जीवोंके लिये नहीं। राजन्! जब सूर्य वृष राशिपर स्थित होते हैं तब ज्येष्ठकी चिलचिलाती हुई धूपमें हम प्याससे व्याकुल होकर दूरसे ही जलसे भरे हुए जलाशयोंको देखते हैं। यदि उनके समीप चले जायें तो हमारे ऊपर अदृष्ट मुद्गरोंकी मार पड़ती है। इसी प्रकार हम दूरसे देखते हैं, गृहस्थोंके घरोंमें नाना प्रकारकी रसोई तैयार करके रखी हुई है। हम भूखसे व्याकुल रहते हैं किंतु उस रसोईको ले नहीं सकते। अच्छे फलवाले वृक्षोंको हम देखते हैं, किंतु उन्हें सेवनका अवसर नहीं पाते। अधिक क्या कहूँ, जो-जो घृणित एवं क्लेशदायक कर्म हैं, सब हमारे पास स्वतः उपस्थित हो जाते हैं। बिना किसी दोषके हमारी प्राणयात्रा नहीं चलती। जल, छाया, अन्न और सवारी—ये सब हमारे लिये नहीं हैं। इसीलिये प्रदोषकाल आनेपर हम सदा छिद्र ढूँढ़ते हुए घूमते रहते हैं। हमारे आकाशगमनकी शक्तिकी बात जो तुमने कही है, वह भी व्यर्थ है। उस आकाशगमनकी शक्तिसे, धर्माधर्म-विवेकसे और पूर्वजन्मकी स्मृतिसे भी क्या लाभ है, जिसके द्वारा मोक्षकी सिद्धि नहीं हो सकती?* अतः राजन्! यद्यपि ये आकाशगमन आदि प्रेतोंके गुण बताये जाते हैं
* क्रियते खेचरत्वेन किं किं धर्मविनिश्चयैः। यया न सिद्ध्यते मोक्षो याति स्मृत्या हि किं तया॥ (स्क० पु०, ना० १८।६७)