संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1116, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०८७
शिष्यसे ऐसा कहकर गुरुजीने परम दयासे युक्त हो मुझसे कहा—'सर्प! मेरे शिष्यकी बात झूठी नहीं हो सकती; अतः अब तुम कुछ कालतक सर्पके शरीरमें ही स्थित रहकर अपने उद्धारकी प्रतीक्षा करो।' तब मैंने पूछा—'मुनिश्रेष्ठ! मेरा शाप कब निवृत्त होगा।' उन्होंने उत्तर दिया—'जो शिवालयमें एक क्षण भी संगीत आदिका आयोजन करता है, उसके धर्मकी संख्या नहीं बतायी जा सकती, इसी प्रकार जो उस महोत्सवमें विघ्न डालता है, उसके पापकी भी कोई गणना नहीं कर सकता। इसलिये तुम भी पापी ब्राह्मण हो, अतः तुम्हारी मुक्ति इस समय नहीं होगी; तथापि मेरी एक बात सुनो। जो श्रद्धापूर्वक भगवान् शिवके षडक्षर मन्त्रका जप करता है, उसका ब्रह्महत्याजनित पाप भी नष्ट हो जाता है। दस बार षडक्षर मन्त्रके जपसे एक दिनका और बीस बारके जपसे मनुष्य एक वर्षका पाप धो डालता है, इसलिये अब तुम जलमें रहकर आदरपूर्वक इस मन्त्रका जप करो, जिससे जन्मान्तरमें किया हुआ तुम्हारा पाप भी क्षीण हो जाय। जब वत्स नामवाले एक ब्राह्मण तुम्हें रोषपूर्वक डंडेसे मारेंगे, उस समय तुम्हारा उद्धार हो जायगा।' इतना कहकर वे मुनि चुप हो गये और मैं इस जलाशयमें रहकर षडक्षर मन्त्रका जप करता रहा। द्विजश्रेष्ठ ! आज तुम्हारे प्रसादसे मैं सर्पयोनिसे मुक्त हो गया। अतः शीघ्र बताओ मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?
तब मैंने उस दिव्यरूपधारी सर्पसे कहा—'भगवन्! मुझे कुछ कल्याणकारी उपदेश दीजिये, जिससे मुझे अपनी प्रिय पत्नीके विनाशका दुःख न हो तथा निर्धनता, रोग और शत्रुसे पराजयका कष्ट भी न हो।' यह प्रश्न सुनकर उस श्रेष्ठ पुरुषने कहा—द्विजवर! भगवान् शिवका षडक्षर मन्त्र मनुष्योंका सब पाप और अमंगल हर लेनेवाला है। ब्रह्मन्! तुम रात-दिन उस मन्त्रका यथाशक्ति जप करते रहो। उसके जपसे सब पापोंसे मुक्त होकर तुम निःसन्देह अभीष्ट वस्तु प्राप्त करोगे। मैंने भी सदैव बड़े-बड़े पाप किये हैं, तथापि उस मन्त्रके माहात्म्यसे मुझे परम ऐश्वर्ययुक्त लोक प्राप्त हुए हैं। विप्रवर! यह परम गोपनीय मन्त्र मैंने तुमको बताया है, किसी नास्तिकको इसका उपदेश नहीं करना चाहिये। सब वेदोंमें अहिंसाको परम धर्म बताया गया है। विशेषतः ब्राह्मणके लिये तो हिंसा सर्वथा त्याज्य है। इसलिये तुम सर्पका वध त्याग दो। जो समस्त चराचर प्राणियोंको अभय देता है, वह इहलोक और परलोकमें सदा सब प्रकारके सुखसे सम्पन्न होता है। भगवान् शंकरके समान कोई देवता नहीं है, गंगाके समान दूसरी नदी नहीं है, हिंसाके समान पाप नहीं है और दयासे बढ़कर कोई धर्म नहीं है*।
तदनन्तर वह अहिंसारूप धर्म सुनकर मैंने परलोकके भयसे दुःखित होकर उस ब्राह्मणसे पूछा—'भगवन्! मैंने बड़े-बूढ़ोंके मुखसे यह बात सुनी है कि राजा यदि वनमें मृगोंका वध करे, तो उसे दोष नहीं लगता है तथा चिकित्सा-शास्त्रके विद्वान् कहते हैं कि मांस खानेवाले लोग विशेष पुष्ट तथा दीर्घजीवी होते हैं। अतः इस विषयमें मुझे परम हितकारक बात बताइये। आपके मुँहसे जो कोई बात निकलेगी, उसका मैं सन्देह-रहित होकर पालन करूँगा।' मेरी बात सुनकर वे पुनः इस प्रकार बोले—'द्विजश्रेष्ठ ! ऐसी बात न कहो। यह सब तो मांसलोभी दुष्ट पापात्माओंका मत है। अहो! संसारमें वे निर्दयी, पापात्मा एवं दुष्ट पुरुष अत्यन्त शोचनीय हैं, जो सब दोषोंकी खानरूप मांसका आस्वादन
* चराचराणां भूतानामभयं यः प्रयच्छति। सर्वसौख्याढ्यो जायते दिवि चेह च॥
नास्ति भर्गसमो देवो नास्ति गंगासमा नदी। नास्ति हिंसासमं पापं नास्ति धर्मो दयापरः॥
(स्क० पु०, ना० २९। २२०-२२१)