संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1115, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०८६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
बहुतसे ऋषि-मुनि आये और देवाधिदेव महेश्वरको प्रणाम करके उनके सम्मुख बैठ गये। फिर आपसमें कथा-वार्ता करने लगे। वे सभी दया और धर्मसे युक्त थे और उनमेंसे कितने ही महात्मा उस देवालयमें भक्तिपूर्वक नृत्य करते थे। इस प्रकार जब वहाँ महान् उत्सव हो रहा था, उस समय मैं बहुत-से समवयस्क युवकोंके साथ उस स्थानपर गया। मेरे दुष्ट साथियोंने उस उत्सवमें विघ्न डालनेके लिये मुझे बार-बार प्रेरित किया। तब मैं एक भयंकर आकारवाले विशाल जल सर्पको लेकर आगे बढ़ा और उस महान् जनसमुदायमें उसे फेंक दिया। सर्पको देखकर मृत्युके भयसे व्याकुल हो सब लोग भाग छूटे। वहीं सुमन नामवाले एक तपस्वी भी थे, जो अपने उत्तम शिष्योंके साथ वहाँ आकर समाधिमें स्थित थे। हृदयके भीतर कमलके आसनपर विराजमान उन्हीं वेदाधीश्वर महेश्वरका वे साक्षात्कार कर रहे थे, जो सर्वव्यापी, अविनाशी, सर्वज्ञ, अनिन्द्य, अभेद्य और जरा-मृत्युसे रहित बताये जाते हैं। तपस्वीके सब अंगोंमें रोमांच हो रहा था। उनके नेत्रोंसे आनन्दाश्रुओंकी अजस्र धारा प्रवाहित होकर उन्हें भिगो रही थी। इस प्रकार समाधिस्थ होकर अविचल भावसे बैठे हुए उन महात्माके शरीरको उस सर्पने अपने देहसे लपेट लिया। इसी समय उनका एक शिष्य वहाँ आ गया, जो बड़ा तपस्वी था। उसका नाम श्रीवर्धन था। उसने सर्पके शरीरसे लिपटे हुए गुरुको और पास ही खड़े हुए मुझको देखकर यह जान लिया कि 'इसीने यह दुष्टता की है।' तब उसने कुपित होकर कहा- 'यदि मैंने निर्विकल्प चित्तसे महादेवजीका ध्यान किया है, तो उस सत्यसे यह दुष्टात्मा ब्राह्मण ऐसे ही सर्पकी आकृतिवाला हो जाय।' उसके इतना कहते ही मैं तत्क्षण भयंकर सर्पशरीरको प्राप्त हो गया। तदनन्तर समाधिसे विरत होनेपर मुनिने अपने शरीरपर भयंकर आकारवाले सर्पको देखा। फिर सर्पकी ही आकृतिमें स्थित मुझे महान् दुःख उठाते हुए देखा और समीप खड़ी हुई सब जनताको तटस्थ एवं भयसे संत्रस्त पाया, तब उन्होंने ज्ञानदृष्टिसे सब कुछ जान लिया और मेरे प्रति दयाभावसे युक्त हो अपने शिष्यसे कहा- 'श्रीवर्धन! तुमने यह सब कर्म करके मेरा प्रिय नहीं किया है। इस दीन ब्राह्मणको शाप दिया। यह तपस्वियोंका धर्म नहीं है। जो मान और अपमानमें समान रहे, ढेला-पत्थर और सोनेको एक-सा समझे तथा शत्रु और मित्रके साथ एक-सा स्नेहपूर्ण बर्ताव करे, वही तपस्वी सिद्धिको प्राप्त होता है। तुमने अज्ञानवश इस ब्राह्मणको शाप दे दिया है, यह तुम्हारा बालचापल्य ही है। मेरी आज्ञासे इसके प्रति पुनः तुम्हें अपना प्रमाद प्रकट करना चाहिये।' यह सुनकर शिष्य श्रीवर्धनने हाथ जोड़ गुरुको प्रणाम करके कहा- 'मैंने ज्ञान अथवा अज्ञानसे जो बात कह दी है, वह निःसन्देह वैसी ही होगी।' गुरु बोले- 'वत्स! मैं जानता हूँ, तुम्हारी वाणी कभी झूठी नहीं हो सकती, तथापि मैं यह बार-बार कहता हूँ कि तपस्या और धर्मसे हीन पुरुषोंकी जो चाल होती है, वही तपस्वी मुनियोंकी नहीं होती। उन यतियोंके लिये तो एकमात्र क्षमा ही सिद्धि देनेवाली बतायी गयी है। अतः तपस्वीजनोंको सदा क्षमाका आदर्श सामने रखकर ही बर्ताव करना चाहिये। पापीके प्रति स्वयं भी पापी न बने, यही सनातन बुद्धि है। जो पापात्मा पाप करता है, वह स्वयं ही नष्ट हो जाता है। जो पापीके प्रति स्वयं भी पापपूर्ण बर्ताव करता है, वह उत्तम ज्ञानसे रहित है; क्योंकि वह जलेको ही जलाता है और मरे हुएको ही मारता है। जो अपना उपकार करनेवाले पुरुषोंके प्रति ही साधुतापूर्ण बर्ताव करता है, उसकी उस साधुतामें क्या विशेषता है। जो अपनी बुराई करनेवालोंके प्रति भी साधुभाव रखता है, वही जनताद्वारा साधु कहा जाता है*।' अपने
* उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः। अपकारिषु यः साधुः स साधुः कीर्त्यते जनैः ॥
(स्क० पु०, ना० २९। १८२-१८३)