संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
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| * नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १०८५ |
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| सिद्धि के भागी हुए हैं। पूर्वकालमें जब मैं पिताके घरमें रहता था, मेरे सामने ही एक दिन वहाँ महातेजस्वी वत्स मुनि पधारे। उस समय उनका दर्शन करके मेरे पिताजीने भक्तिभावसे उन्हें प्रणाम किया और अर्घ्य देकर विनयपूर्वक पूछा—'विप्रवर! आपका स्वागत है। आप कहाँसे आये हैं, मेरे लिये यथोचित सेवाके निमित्त आज्ञा कीजिये।'<br><br>वत्सजी बोले—सूत! मैं तुम्हारे आश्रमपर चातुर्मास्य व्रत करना चाहता हूँ। यदि तुम मेरी सेवा-शुश्रूषा करो तो यहीं चौमासा करूँ।<br><br>लोमहर्षणजीने कहा—ब्रह्मन्! मैं निःसन्देह आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।<br><br>ऐसा कहकर मेरे पिताजी मुझसे बोले—वत्स! तुम्हें प्रतिदिन इन महर्षिकी सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिये। तब मैं विनीतभावसे उनकी सेवा-टहलके सब कार्य करने लगा। वे रातमें मुझे विचित्र-विचित्र कथाएँ सुनाया करते थे। एक समय कथाके अन्तमें मैंने पूछा—भगवन्! समुद्रसहित सम्पूर्ण धरातलको आपने थोड़ी ही अवस्थामें कैसे देखा? जिन द्वीप, समुद्र तथा पर्वतोंकी चर्चा आपने की है, वहाँतक तो मनुष्य मनके द्वारा भी किसी प्रकार नहीं जा सकते। मुनीश्वर! यह किसी तपस्याका प्रभाव है अथवा मन्त्रका पराक्रम है, जिससे आपने सम्पूर्ण भूतलको देख लिया है?<br><br>वत्स मुनिने हँसकर कहा—यह तुमने ठीक समझा है। मेरे मन्त्रका ही ऐसा पराक्रम है। मैं प्रतिदिन भगवान् शिवके समीप षडक्षर मन्त्र (ॐ नमः शिवाय) का आठ हजार जप करता हूँ, इससे तीनों कालमें मेरी युवावस्था सदा स्थिर रहती है। मुझे भूत और भविष्यका ज्ञान है और मेरा जीवन सदा सुखमय बना रहता है। मेरी आयु लाखों वर्षोंकी हो गयी है, तथापि अभी प्रथम अवस्था (किशोरावस्था) ही दिखायी देती है।<br><br>एक समय मेरी स्त्रीकी मृत्यु हो जानेपर जब मैं उसके लिये शोक कर रहा था, तब मेरे सुहृदोंने मुझसे कहा—'अरे भैया! तुम शोक क्यों | करते हो? एक दिन हम सभीकी मृत्यु होनेवाली है। इसके लिये रोना क्या है। तुमने अपनी प्रियाको पहलेसे नहीं देखा था, वह अदर्शनसे ही तुम्हें प्राप्त हुई थी और अब पुनः अदर्शनावस्थाको ही चली गयी है। न वह तुम्हारी थी, न तुम उसके। फिर व्यर्थ शोक क्यों करते हो? किसीका किसीके साथ सदा एक स्थानपर निवास नहीं होता। अपने शरीरके साथ भी मनुष्य सदा नहीं रह सकता। फिर इस शरीरसे भिन्न जो दूसरे लोग हैं, उनके साथ सदा संयोग कैसे रह सकता है। जो मरे हुए सम्बन्धी, खोयी हुई वस्तु और बीती हुई बातके लिये शोक करता है, वह दुःखसे दुःख उठाता है।' इस प्रकार वे सब सुहृद् मुझे समझा-बुझाकर घर ले आये। घर आनेपर मैंने यह प्रण किया कि 'जहाँ कहीं भी सर्पको देखूँगा, वहीं उसे डंडेसे मार डालूँगा; क्योंकि मेरी स्त्रीको सर्पने ही काट खाया है।' ऐसा निश्चय करके एक समय मैं घूमता हुआ चमत्कारपुरमें पहुँचा। वहाँ एक कुण्डसे निकलकर पड़े हुए विशाल जल-सर्पको देखा। देखते ही उसे मारनेके लिये मैंने डंडा उठाया, तब उस सर्पने कहा—'पहले मेरी बात सुन लो। फिर तुम्हें जो उचित प्रतीत हो, वह करना। ब्रह्मन्! वे सर्प दूसरे ही होते हैं, जो मनुष्योंको काटते हैं। हम तो पानीके साँप हैं, हमारा केवल रूप ही साँपका होता है, हममें विष नहीं होता।' उसके इस प्रकार कहनेपर भी मैंने डंडेका प्रहार कर ही दिया। उस डंडेका स्पर्श होते ही वह एक तेजस्वी महापुरुषके रूपमें परिणत हो गया। इस आश्चर्यको देखकर मैंने उन महापुरुषसे प्रणाम करके कहा—'प्रभो! मेरा अपराध क्षमा करें, आप कौन हैं?'<br><br>तब वे प्रसन्न होकर मुझसे बोले—मेरा वृत्तान्त सुनो। मैं पहले राजा चमत्कारके बनवाये हुए उत्तम नगरमें एक ब्राह्मण था। वहाँ भगवान् सिद्धेश्वरजीका एक उत्तम शिवालय है। किसी समय वहाँ यात्राका महोत्सव था। उस अवसरपर |