भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1113
१०८४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

(सर्दी)-में आग तपाता, गरमीमें जल पिलाता और वर्षांमें ठहरनेके लिये स्थान देता है, वह कभी नरकका दर्शन नहीं करता है। जो व्रत और उपवासमें तत्पर, शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी तथा सदैव भगवान्‌का ध्यान करनेवाला है, वह मनुष्य भी नरकमें नहीं जाता है। जो अन्न और तिलका दान करता, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता, वेदाध्ययन करके शास्त्रके आज्ञा-पालनमें तत्पर होता, मीठे वचन बोलता तथा सदा धार्मिक चर्चा किया करता है, वह कभी नरकको नहीं देखता।

ब्राह्मण बोले—धर्मराज! यह तो एक मूर्ख भी जानता है कि शुभ कर्ममें तत्पर रहनेवाला पुरुष नरकमें नहीं जाता और पापपरायण मनुष्य स्वर्गमें नहीं जा सकता। मुझे तो सब लोकोंको सुख पहुँचानेवाला वह श्रेष्ठ व्रत, नियम, तीर्थ, जप अथवा होम आदि उपाय बताइये, जिसको स्वल्प मात्रामें करनेपर भी पापी पुरुष भी अपने पापका नाश करके शीघ्र स्वर्गलोकमें जा सके।

यमराजने कहा—द्विजश्रेष्ठ! आनर्त देशमें परम मनोहर एवं सर्वतीर्थमय शुभ हाटकेश्वरक्षेत्र है जो महापातकोंका भी नाश करनेवाला है। जो उस क्षेत्रमें पंद्रह दिन भी भक्तिपूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करता है, वह सब पापोंसे युक्त होनेपर भी भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। अतः तुम वहीं जाकर भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी आराधना करो। इससे अपनी दस पीढ़ियोंके साथ तुम मोक्ष प्राप्त करोगे।

सूतजी कहते हैं—यह उपदेश सुनकर गोकर्णजी ज्योंही अपने घरकी ओर प्रस्थित हुए त्यों ही यमदूत दूसरे गोकर्णको भी साथ लेकर वहाँ आ पहुँचा और शीघ्र ही उसने धर्मराजके सामने उसे उपस्थित किया। तब धर्मराजने प्रसन्न होकर दूतसे कहा—'तुम समय बिताकर इन ब्राह्मण देवताको यहाँ लाये हो, अतः द्वितीय गोकर्णके साथ ही इन्हें भी जल्दी छोड़ दो।' तदनन्तर वे दोनों गोकर्ण ब्राह्मण उसी क्षण एक ही साथ छोड़ दिये गये। फिर दोनोंने सहसा अपने-अपने शरीरमें प्रवेश किया। स्वस्थ होनेपर दोनोंने हाटकेश्वरतीर्थमें यथावत् तपस्या करके भगवान् शंकरकी आराधना की और उसके प्रभावसे सशरीर स्वर्गलोकमें चले गये। जो मनुष्य निष्कामभावसे वहाँ भगवान् शिवकी आराधना करता है वह मोक्षको प्राप्त होता है।

विप्रवरो! इस प्रकार मैंने तुम्हें हाटकेश्वरक्षेत्रका प्रमाण और सीमा आदिका सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। यहाँ खेती करनेवाले किसान भी परमगतिको प्राप्त होते हैं। फिर जो अपने मनको वशमें रखनेवाले शान्त, दान्त और जितेन्द्रिय साधक हैं उनके लिये क्या कहना है। मनुष्योंकी तो बात ही क्या है, उस क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त हुए कीट, पतंग, पशु-पक्षी और मृग भी निःसन्देह स्वर्गलोकमें जाते हैं। जो भगवान् जनार्दनको अपने हृदयमें स्थापित करके श्रद्धापूर्वक वहाँ रहते हैं, उनकी सद्गतिमें सन्देह ही क्या हो सकता है; अतः पूरा प्रयत्न करके सबको उस क्षेत्रका सेवन करना चाहिये।


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सिद्धेश्वर लिंगकी महिमा तथा वत्स मुनिके द्वारा षडक्षर-मन्त्रके माहात्म्य एवं मांसाहारकी निन्दा तथा अहिंसाकी महत्ताका वर्णन

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! हाटकेश्वरक्षेत्रमें सिद्धेश्वर नामक लिंग है। उस लिंगके रूपमें वहाँ साक्षात् भगवान् शंकर स्वयं ही प्रकट हैं। वे स्मरण और दर्शन करनेसे सदा सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाले हैं। जो मनुष्य पवित्र भावसे भक्तिपूर्वक उन सिद्धेश्वरका दर्शन या स्पर्श करता है, वह दुर्लभ मनोरथको भी शीघ्र प्राप्त कर लेता है। उस क्षेत्रमें पहले स्पर्श और दर्शन करनेसे सैकड़ों पुरुष सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं और कितने ही मनुष्य केवल प्रणाम करनेसे