संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1112, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०८३
कुत्सित नामसे प्रसिद्ध है। वह कफ और मूत्र आदि एवं दुर्गन्धयुक्त वस्तुओंसे भरा हुआ है। जिन्होंने गुरु, देवता, अतिथि और विशेषतः अपने कुटुम्बीजनों और सेवकोंको भोजन दिये बिना ही स्वयं भोजन किया है, वे लोग इसमें डाले जाते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! यह दुर्गम नामका नवाँ नरक है। यह तीखे काँटोंसे भरा हुआ है। इसके भीतर साँप और बिच्छू भी रहते हैं। जिन्होंने एक साथ यात्रा करनेवाले अपने भूखे-प्यासे कष्ट पाते हुए साथीको न देकर अकेले भोजन किया है, उन्हें इस नरकमें रखा जाता है। दसवें नरकका नाम दुस्सह है, जो सब ओरसे तप्त लोहमय खम्भोंसे घिरा हुआ है। जो पापी परायी स्त्रियोंमें तथा मांस-भोजनमें अनुरक्त होते हैं, उन मनुष्योंको यहाँ तप्त लोहमय खम्भोंका आलिंगन करना पड़ता है। ग्यारहवाँ नरक आकर्ष नामसे प्रसिद्ध है। यहाँ तपाये हुए सँड़से रखे रहते हैं। जो मनुष्य स्त्री, ब्राह्मण, गुरु और देवताका धन खाते हैं, उन्हें तपाये हुए सँड़सोंसे पकड़कर सब ओर खींचा जाता है। बारहवें नरकको सन्दंश कहते हैं। इसमें अभक्ष्य भक्षण करनेवाले नराधमोंको लोहेके समान दाँत और मुखवाले गीध नोच-नोचकर खाते हैं। तेरहवें नरकका नाम नियन्त्रक है। उसकी बड़ी ख्याति है। वह सब ओरसे कीटों तथा सुदृढ़ बन्धनोंसे व्याप्त है। जो पापी दूसरोंकी धरोहरको हड़प लेते हैं, वे यहाँ बन्धनोंसे कसकर बाँध दिये जाते हैं और कृमि, बिच्छू तथा कीट आदि उन्हें काटते और खाते हैं। चौदहवाँ नरक अधोमुख कहा गया है। इसका स्वरूप सब नरकोंसे अधिक भयंकर है। जो मनुष्य ब्राह्मणकी हत्या करते हैं, वे यहाँ एक वृक्षकी डालमें बाँधकर नीचे मुँह करके लटका दिये जाते हैं और नीचेसे आग प्रज्वलित करके उन्हें पकाया जाता है। पंद्रहवाँ भीषण नामवाला नरक है, जो जूँ और खटमल आदिसे भरा हुआ है। जो लोग झूठी गवाही देते या झूठ बोलते हैं, उनको तथा अन्य कुकर्मियोंको भी मैंने यहीं स्थान दे रखा है। यह सोलहवाँ नरक क्षुद्दद कहा गया है, जो चारों ओर क्षुधातुर मनुष्योंसे व्याप्त है। जिन द्विजोंने मांस भोजन किये हैं, वे यहाँ भूखसे पीड़ित होकर अपने ही शरीरको काट-काटकर खाते हैं। सत्रहवाँ क्षार नरक है, जो नमकसे भरा हुआ है। यह सब प्राणियोंके लिये बड़ा भयंकर है। जो मनुष्य व्रत भंग करनेवाले तथा पाखण्डी हैं, वे यहाँ आनेपर तीखे शस्त्रोंसे पीस डाले जाते हैं और ऊपरसे उनपर नमक छिड़का जाता है। यह अठारहवाँ नरक निदाघ नामसे प्रसिद्ध है, जो प्रज्वलित अंगारोंसे भरा है। जो मनुष्य शास्त्र, काव्य तथा ब्राह्मण-कन्याको कलंकित करते हैं, वे यहीं अंगारोंके भीतर रखे जाते हैं। उन्नीसवाँ नरक कूटशाल्मलि कहलाता है, जो सब ओरसे तीखे काँटोंसे भरा हुआ है। जो नास्तिक, मर्यादा भंग करनेवाले तथा ब्राह्मणघाती हैं, वे सब मनुष्य यहाँ सदैव चढ़ते और गिरते रहते हैं। बीसवें नरकका नाम असिपत्र वन है। जो दूसरोंके छिद्र देखते, झूठ-कपटसे भरे हुए कार्योंमें संलग्न रहते और शास्त्र बेचते हैं, वे ही इसमें आते हैं। इक्कीसवाँ नरक वैतरणी नामवाली नदी है, जिसे धर्मात्मा और पापी सभीको पार करना पड़ता है। जो मृत्युकालके समय गायकी पूँछ हाथमें लेकर उसका दान करते हैं, वे सुखपूर्वक उस नदीको पार कर जाते हैं। जो मानव गोदान किये बिना ही मर जाते हैं, उन्हें इस दुर्गम नदीको हाथोंसे ही तैरकर पार करना पड़ता है। द्विजश्रेष्ठ ! तुमने जो कुछ पूछा है, वह सब वृत्तान्त मैंने तुमसे कह दिया। अब इच्छानुसार धन लेकर घर जाओ।
**ब्राह्मण बोले—**देव ! अब यह बताइये कि कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्य नरकमें नहीं जाता।
**यमराजने कहा—**जो सदा तीर्थयात्रामें तत्पर रहता, देवता और अतिथियोंकी पूजा करता, ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति रखता तथा शरणमें आये हुएका पालन करता है, वह कभी भी नरकमें नहीं जाता। जो सर्वदा दूसरोंकी भलाईमें संलग्न रहता, हेमन्त