संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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हाटकेश्वर-क्षेत्रकी दक्षिणोत्तर सीमाके गोकर्णोंका परिचय, गोकर्ण और यमका संवाद, नरकवर्णन, क्षेत्रसेवनका माहात्म्य
सूतजी कहते हैं— महर्षियो ! भूतलपर यमुना नदीके किनारे मथुरा नामसे विख्यात एक महापुरी है, जो अनेक ब्राह्मणोंसे भरी हुई है। वहीं पूर्वकालमें गोकर्ण नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण रहते थे, जो वेदाध्ययनसे सम्पन्न और सब शास्त्रोंके पण्डित थे। वहीं उसी नामका और उसी अवस्थाका एक दूसरा ब्राह्मण भी रहता था, जो सब विद्याओंमें पारंगत था। एक दिन यमराजने अपने दूतसे कहा—'दूत!' तुम शीघ्र मथुरा जाओ और वहाँके गोकर्ण नामक श्रेष्ठ ब्राह्मणको यहाँ ले आओ। आज दोपहरके समय उनकी आयु समाप्त हो जायगी। देखना, उसी पुरीमें उस नामके एक दूसरे ब्राह्मण भी हैं, जो दीर्घजीवी हैं; कहीं भूलसे उनको न ले आना।'
यमराजकी आज्ञासे दूत बड़े वेगसे मथुरापुरीमें पहुँचा; परंतु भ्रम हो जानेसे वह दीर्घजीवी गोकर्णको ही पकड़ लाया। तब यमराजने कुपित होकर अपने सेवकसे कहा—'पापी! तुझे धिक्कार है। तू इन दीर्घायु महात्माको ले आया! तूने यह क्या किया। इन्हें शीघ्र ही ले जाकर वहाँ पहुँचा दे; अन्यथा भय है कि बन्धु-बान्धव इनकी देहका दाह-संस्कार न कर दें।'
ब्राह्मण बोले— मैं सौभाग्यवश आपके समीप आ गया हूँ। अब वहाँ लौटकर नहीं जाऊँगा। मैं तो दरिद्रतासे कष्ट पाकर स्वयं ही सदा मृत्युकी इच्छा रखता था।
यमराजने कहा— विप्रवर! यदि पलभर भी आयु शेष हो तो मैं किसी मनुष्यको पृथ्वीसे यहाँ नहीं बुलाता, इसीलिये लोग मुझे धर्मराज कहते हैं। मैं सब प्राणियोंपर पक्षपात छोड़कर समान भाव रखता हूँ। तुम मुझसे कोई वर माँगो। किसी भी देहधारीको मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं होता।
ब्राह्मण बोले— देव! यदि मुझे अवश्य ही घर लौटकर जाना है तो मैं पूछता हूँ, उसको बताइये। वही मेरे लिये श्रेष्ठ वर होगा। पापकमी मनुष्य, जो इन भयंकर नरकोंका सेवन कर रहे हैं, इनमेंसे किस कर्मसे किसको कौन-सा नरक प्राप्त होता है?
यमराजने कहा— विप्रवर ! नरक असंख्य हैं पर उनमेंसे जो मुख्य हैं, केवल उन्हींका परिचय मैं तुम्हें कराऊँगा। यहाँ मुख्य इक्कीस नरक हैं। उनमेंसे पहला रौरव नरक है, जिसमें अत्यन्त तप्त तेलसे भरे हुए कुण्डोंमें प्राणी पकाये जा रहे हैं। इसमें दूसरोंका धन हड़पनेवाले क्षुद्र मनुष्य यातना भोगते हैं। दूसरेका नाम है महारौरव, जिसमें कृतघ्न और गुरुशय्यागामी पापात्मा दाहसे पीड़ित होकर तथा तीखी धारवाले शस्त्रोंसे छिन्न-भिन्न होकर आर्तनाद करते हैं। तीसरे भयदायक नरकका नाम अन्धतम है। जिन नराधमोंने परायी स्त्रियोंको दूषित दृष्टि देखा है, वे जब यहाँ आते हैं तब लोहेके समान मुखवाले पक्षी उनकी दोनों आँखें निकाल लेते हैं। चौथा नरक प्रतप्त नामसे विख्यात है। यहाँ भी पापी जीव यातना भोगकर शुद्ध होते हैं। जिन्होंने गुरुजनों, देवताओं तथा तपस्वियोंकी सदैव निन्दा की है, उन लोगोंकी जिह्वा यहाँ उखाड़ ली जाती है। पाँचवाँ सुप्रसिद्ध नरक विदारक नामवाला है। यहाँ मित्रद्रोही मनुष्य आरेसे चीरे जाते हैं। छठा निकुम्भ नामक नरक है, जो तपायी हुई बालूसे भरा हुआ है और स्वयं भी अग्नि-से तप रहा है। जिन मनुष्योंने पहले बिना किसी अपराधके दूसरे ब्राह्मणोंको प्राणान्तकारी कष्ट पहुँचाया है, वे यहाँ तपी हुई बालूमें भूने जाते हैं। सातवाँ नरक बीभत्सु कहलाता है। वह अत्यन्त गर्हित है। उसमें सब ओरसे मल-मूत्र आदि गंदी वस्तुएँ भरी हुई हैं। जिन दुरात्माओंने राजाके पास जाकर लोगोंकी चुगली खायी है, उनके मुँहमें ये गंदी वस्तुएँ भरकर उन्हें इसी नरकमें डाल दिया जाता है। आठवाँ अधम नरक