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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
१०८४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

(सर्दी)-में आग तपाता, गरमीमें जल पिलाता और वर्षांमें ठहरनेके लिये स्थान देता है, वह कभी नरकका दर्शन नहीं करता है। जो व्रत और उपवासमें तत्पर, शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी तथा सदैव भगवान्‌का ध्यान करनेवाला है, वह मनुष्य भी नरकमें नहीं जाता है। जो अन्न और तिलका दान करता, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता, वेदाध्ययन करके शास्त्रके आज्ञा-पालनमें तत्पर होता, मीठे वचन बोलता तथा सदा धार्मिक चर्चा किया करता है, वह कभी नरकको नहीं देखता।

ब्राह्मण बोले—धर्मराज! यह तो एक मूर्ख भी जानता है कि शुभ कर्ममें तत्पर रहनेवाला पुरुष नरकमें नहीं जाता और पापपरायण मनुष्य स्वर्गमें नहीं जा सकता। मुझे तो सब लोकोंको सुख पहुँचानेवाला वह श्रेष्ठ व्रत, नियम, तीर्थ, जप अथवा होम आदि उपाय बताइये, जिसको स्वल्प मात्रामें करनेपर भी पापी पुरुष भी अपने पापका नाश करके शीघ्र स्वर्गलोकमें जा सके।

यमराजने कहा—द्विजश्रेष्ठ! आनर्त देशमें परम मनोहर एवं सर्वतीर्थमय शुभ हाटकेश्वरक्षेत्र है जो महापातकोंका भी नाश करनेवाला है। जो उस क्षेत्रमें पंद्रह दिन भी भक्तिपूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करता है, वह सब पापोंसे युक्त होनेपर भी भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। अतः तुम वहीं जाकर भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी आराधना करो। इससे अपनी दस पीढ़ियोंके साथ तुम मोक्ष प्राप्त करोगे।

सूतजी कहते हैं—यह उपदेश सुनकर गोकर्णजी ज्योंही अपने घरकी ओर प्रस्थित हुए त्यों ही यमदूत दूसरे गोकर्णको भी साथ लेकर वहाँ आ पहुँचा और शीघ्र ही उसने धर्मराजके सामने उसे उपस्थित किया। तब धर्मराजने प्रसन्न होकर दूतसे कहा—'तुम समय बिताकर इन ब्राह्मण देवताको यहाँ लाये हो, अतः द्वितीय गोकर्णके साथ ही इन्हें भी जल्दी छोड़ दो।' तदनन्तर वे दोनों गोकर्ण ब्राह्मण उसी क्षण एक ही साथ छोड़ दिये गये। फिर दोनोंने सहसा अपने-अपने शरीरमें प्रवेश किया। स्वस्थ होनेपर दोनोंने हाटकेश्वरतीर्थमें यथावत् तपस्या करके भगवान् शंकरकी आराधना की और उसके प्रभावसे सशरीर स्वर्गलोकमें चले गये। जो मनुष्य निष्कामभावसे वहाँ भगवान् शिवकी आराधना करता है वह मोक्षको प्राप्त होता है।

विप्रवरो! इस प्रकार मैंने तुम्हें हाटकेश्वरक्षेत्रका प्रमाण और सीमा आदिका सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। यहाँ खेती करनेवाले किसान भी परमगतिको प्राप्त होते हैं। फिर जो अपने मनको वशमें रखनेवाले शान्त, दान्त और जितेन्द्रिय साधक हैं उनके लिये क्या कहना है। मनुष्योंकी तो बात ही क्या है, उस क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त हुए कीट, पतंग, पशु-पक्षी और मृग भी निःसन्देह स्वर्गलोकमें जाते हैं। जो भगवान् जनार्दनको अपने हृदयमें स्थापित करके श्रद्धापूर्वक वहाँ रहते हैं, उनकी सद्गतिमें सन्देह ही क्या हो सकता है; अतः पूरा प्रयत्न करके सबको उस क्षेत्रका सेवन करना चाहिये।


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सिद्धेश्वर लिंगकी महिमा तथा वत्स मुनिके द्वारा षडक्षर-मन्त्रके माहात्म्य एवं मांसाहारकी निन्दा तथा अहिंसाकी महत्ताका वर्णन

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! हाटकेश्वरक्षेत्रमें सिद्धेश्वर नामक लिंग है। उस लिंगके रूपमें वहाँ साक्षात् भगवान् शंकर स्वयं ही प्रकट हैं। वे स्मरण और दर्शन करनेसे सदा सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाले हैं। जो मनुष्य पवित्र भावसे भक्तिपूर्वक उन सिद्धेश्वरका दर्शन या स्पर्श करता है, वह दुर्लभ मनोरथको भी शीघ्र प्राप्त कर लेता है। उस क्षेत्रमें पहले स्पर्श और दर्शन करनेसे सैकड़ों पुरुष सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं और कितने ही मनुष्य केवल प्रणाम करनेसे

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध *१०८५
सिद्धि के भागी हुए हैं। पूर्वकालमें जब मैं पिताके घरमें रहता था, मेरे सामने ही एक दिन वहाँ महातेजस्वी वत्स मुनि पधारे। उस समय उनका दर्शन करके मेरे पिताजीने भक्तिभावसे उन्हें प्रणाम किया और अर्घ्य देकर विनयपूर्वक पूछा—'विप्रवर! आपका स्वागत है। आप कहाँसे आये हैं, मेरे लिये यथोचित सेवाके निमित्त आज्ञा कीजिये।'<br><br>वत्सजी बोले—सूत! मैं तुम्हारे आश्रमपर चातुर्मास्य व्रत करना चाहता हूँ। यदि तुम मेरी सेवा-शुश्रूषा करो तो यहीं चौमासा करूँ।<br><br>लोमहर्षणजीने कहा—ब्रह्मन्! मैं निःसन्देह आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।<br><br>ऐसा कहकर मेरे पिताजी मुझसे बोले—वत्स! तुम्हें प्रतिदिन इन महर्षिकी सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिये। तब मैं विनीतभावसे उनकी सेवा-टहलके सब कार्य करने लगा। वे रातमें मुझे विचित्र-विचित्र कथाएँ सुनाया करते थे। एक समय कथाके अन्तमें मैंने पूछा—भगवन्! समुद्रसहित सम्पूर्ण धरातलको आपने थोड़ी ही अवस्थामें कैसे देखा? जिन द्वीप, समुद्र तथा पर्वतोंकी चर्चा आपने की है, वहाँतक तो मनुष्य मनके द्वारा भी किसी प्रकार नहीं जा सकते। मुनीश्वर! यह किसी तपस्याका प्रभाव है अथवा मन्त्रका पराक्रम है, जिससे आपने सम्पूर्ण भूतलको देख लिया है?<br><br>वत्स मुनिने हँसकर कहा—यह तुमने ठीक समझा है। मेरे मन्त्रका ही ऐसा पराक्रम है। मैं प्रतिदिन भगवान् शिवके समीप षडक्षर मन्त्र (ॐ नमः शिवाय) का आठ हजार जप करता हूँ, इससे तीनों कालमें मेरी युवावस्था सदा स्थिर रहती है। मुझे भूत और भविष्यका ज्ञान है और मेरा जीवन सदा सुखमय बना रहता है। मेरी आयु लाखों वर्षोंकी हो गयी है, तथापि अभी प्रथम अवस्था (किशोरावस्था) ही दिखायी देती है।<br><br>एक समय मेरी स्त्रीकी मृत्यु हो जानेपर जब मैं उसके लिये शोक कर रहा था, तब मेरे सुहृदोंने मुझसे कहा—'अरे भैया! तुम शोक क्योंकरते हो? एक दिन हम सभीकी मृत्यु होनेवाली है। इसके लिये रोना क्या है। तुमने अपनी प्रियाको पहलेसे नहीं देखा था, वह अदर्शनसे ही तुम्हें प्राप्त हुई थी और अब पुनः अदर्शनावस्थाको ही चली गयी है। न वह तुम्हारी थी, न तुम उसके। फिर व्यर्थ शोक क्यों करते हो? किसीका किसीके साथ सदा एक स्थानपर निवास नहीं होता। अपने शरीरके साथ भी मनुष्य सदा नहीं रह सकता। फिर इस शरीरसे भिन्न जो दूसरे लोग हैं, उनके साथ सदा संयोग कैसे रह सकता है। जो मरे हुए सम्बन्धी, खोयी हुई वस्तु और बीती हुई बातके लिये शोक करता है, वह दुःखसे दुःख उठाता है।' इस प्रकार वे सब सुहृद् मुझे समझा-बुझाकर घर ले आये। घर आनेपर मैंने यह प्रण किया कि 'जहाँ कहीं भी सर्पको देखूँगा, वहीं उसे डंडेसे मार डालूँगा; क्योंकि मेरी स्त्रीको सर्पने ही काट खाया है।' ऐसा निश्चय करके एक समय मैं घूमता हुआ चमत्कारपुरमें पहुँचा। वहाँ एक कुण्डसे निकलकर पड़े हुए विशाल जल-सर्पको देखा। देखते ही उसे मारनेके लिये मैंने डंडा उठाया, तब उस सर्पने कहा—'पहले मेरी बात सुन लो। फिर तुम्हें जो उचित प्रतीत हो, वह करना। ब्रह्मन्! वे सर्प दूसरे ही होते हैं, जो मनुष्योंको काटते हैं। हम तो पानीके साँप हैं, हमारा केवल रूप ही साँपका होता है, हममें विष नहीं होता।' उसके इस प्रकार कहनेपर भी मैंने डंडेका प्रहार कर ही दिया। उस डंडेका स्पर्श होते ही वह एक तेजस्वी महापुरुषके रूपमें परिणत हो गया। इस आश्चर्यको देखकर मैंने उन महापुरुषसे प्रणाम करके कहा—'प्रभो! मेरा अपराध क्षमा करें, आप कौन हैं?'<br><br>तब वे प्रसन्न होकर मुझसे बोले—मेरा वृत्तान्त सुनो। मैं पहले राजा चमत्कारके बनवाये हुए उत्तम नगरमें एक ब्राह्मण था। वहाँ भगवान् सिद्धेश्वरजीका एक उत्तम शिवालय है। किसी समय वहाँ यात्राका महोत्सव था। उस अवसरपर
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बहुतसे ऋषि-मुनि आये और देवाधिदेव महेश्वरको प्रणाम करके उनके सम्मुख बैठ गये। फिर आपसमें कथा-वार्ता करने लगे। वे सभी दया और धर्मसे युक्त थे और उनमेंसे कितने ही महात्मा उस देवालयमें भक्तिपूर्वक नृत्य करते थे। इस प्रकार जब वहाँ महान् उत्सव हो रहा था, उस समय मैं बहुत-से समवयस्क युवकोंके साथ उस स्थानपर गया। मेरे दुष्ट साथियोंने उस उत्सवमें विघ्न डालनेके लिये मुझे बार-बार प्रेरित किया। तब मैं एक भयंकर आकारवाले विशाल जल सर्पको लेकर आगे बढ़ा और उस महान् जनसमुदायमें उसे फेंक दिया। सर्पको देखकर मृत्युके भयसे व्याकुल हो सब लोग भाग छूटे। वहीं सुमन नामवाले एक तपस्वी भी थे, जो अपने उत्तम शिष्योंके साथ वहाँ आकर समाधिमें स्थित थे। हृदयके भीतर कमलके आसनपर विराजमान उन्हीं वेदाधीश्वर महेश्वरका वे साक्षात्कार कर रहे थे, जो सर्वव्यापी, अविनाशी, सर्वज्ञ, अनिन्द्य, अभेद्य और जरा-मृत्युसे रहित बताये जाते हैं। तपस्वीके सब अंगोंमें रोमांच हो रहा था। उनके नेत्रोंसे आनन्दाश्रुओंकी अजस्र धारा प्रवाहित होकर उन्हें भिगो रही थी। इस प्रकार समाधिस्थ होकर अविचल भावसे बैठे हुए उन महात्माके शरीरको उस सर्पने अपने देहसे लपेट लिया। इसी समय उनका एक शिष्य वहाँ आ गया, जो बड़ा तपस्वी था। उसका नाम श्रीवर्धन था। उसने सर्पके शरीरसे लिपटे हुए गुरुको और पास ही खड़े हुए मुझको देखकर यह जान लिया कि 'इसीने यह दुष्टता की है।' तब उसने कुपित होकर कहा- 'यदि मैंने निर्विकल्प चित्तसे महादेवजीका ध्यान किया है, तो उस सत्यसे यह दुष्टात्मा ब्राह्मण ऐसे ही सर्पकी आकृतिवाला हो जाय।' उसके इतना कहते ही मैं तत्क्षण भयंकर सर्पशरीरको प्राप्त हो गया। तदनन्तर समाधिसे विरत होनेपर मुनिने अपने शरीरपर भयंकर आकारवाले सर्पको देखा। फिर सर्पकी ही आकृतिमें स्थित मुझे महान् दुःख उठाते हुए देखा और समीप खड़ी हुई सब जनताको तटस्थ एवं भयसे संत्रस्त पाया, तब उन्होंने ज्ञानदृष्टिसे सब कुछ जान लिया और मेरे प्रति दयाभावसे युक्त हो अपने शिष्यसे कहा- 'श्रीवर्धन! तुमने यह सब कर्म करके मेरा प्रिय नहीं किया है। इस दीन ब्राह्मणको शाप दिया। यह तपस्वियोंका धर्म नहीं है। जो मान और अपमानमें समान रहे, ढेला-पत्थर और सोनेको एक-सा समझे तथा शत्रु और मित्रके साथ एक-सा स्नेहपूर्ण बर्ताव करे, वही तपस्वी सिद्धिको प्राप्त होता है। तुमने अज्ञानवश इस ब्राह्मणको शाप दे दिया है, यह तुम्हारा बालचापल्य ही है। मेरी आज्ञासे इसके प्रति पुनः तुम्हें अपना प्रमाद प्रकट करना चाहिये।' यह सुनकर शिष्य श्रीवर्धनने हाथ जोड़ गुरुको प्रणाम करके कहा- 'मैंने ज्ञान अथवा अज्ञानसे जो बात कह दी है, वह निःसन्देह वैसी ही होगी।' गुरु बोले- 'वत्स! मैं जानता हूँ, तुम्हारी वाणी कभी झूठी नहीं हो सकती, तथापि मैं यह बार-बार कहता हूँ कि तपस्या और धर्मसे हीन पुरुषोंकी जो चाल होती है, वही तपस्वी मुनियोंकी नहीं होती। उन यतियोंके लिये तो एकमात्र क्षमा ही सिद्धि देनेवाली बतायी गयी है। अतः तपस्वीजनोंको सदा क्षमाका आदर्श सामने रखकर ही बर्ताव करना चाहिये। पापीके प्रति स्वयं भी पापी न बने, यही सनातन बुद्धि है। जो पापात्मा पाप करता है, वह स्वयं ही नष्ट हो जाता है। जो पापीके प्रति स्वयं भी पापपूर्ण बर्ताव करता है, वह उत्तम ज्ञानसे रहित है; क्योंकि वह जलेको ही जलाता है और मरे हुएको ही मारता है। जो अपना उपकार करनेवाले पुरुषोंके प्रति ही साधुतापूर्ण बर्ताव करता है, उसकी उस साधुतामें क्या विशेषता है। जो अपनी बुराई करनेवालोंके प्रति भी साधुभाव रखता है, वही जनताद्वारा साधु कहा जाता है*।' अपने


* उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः। अपकारिषु यः साधुः स साधुः कीर्त्यते जनैः ॥
(स्क० पु०, ना० २९। १८२-१८३)

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०८७

शिष्यसे ऐसा कहकर गुरुजीने परम दयासे युक्त हो मुझसे कहा—'सर्प! मेरे शिष्यकी बात झूठी नहीं हो सकती; अतः अब तुम कुछ कालतक सर्पके शरीरमें ही स्थित रहकर अपने उद्धारकी प्रतीक्षा करो।' तब मैंने पूछा—'मुनिश्रेष्ठ! मेरा शाप कब निवृत्त होगा।' उन्होंने उत्तर दिया—'जो शिवालयमें एक क्षण भी संगीत आदिका आयोजन करता है, उसके धर्मकी संख्या नहीं बतायी जा सकती, इसी प्रकार जो उस महोत्सवमें विघ्न डालता है, उसके पापकी भी कोई गणना नहीं कर सकता। इसलिये तुम भी पापी ब्राह्मण हो, अतः तुम्हारी मुक्ति इस समय नहीं होगी; तथापि मेरी एक बात सुनो। जो श्रद्धापूर्वक भगवान् शिवके षडक्षर मन्त्रका जप करता है, उसका ब्रह्महत्याजनित पाप भी नष्ट हो जाता है। दस बार षडक्षर मन्त्रके जपसे एक दिनका और बीस बारके जपसे मनुष्य एक वर्षका पाप धो डालता है, इसलिये अब तुम जलमें रहकर आदरपूर्वक इस मन्त्रका जप करो, जिससे जन्मान्तरमें किया हुआ तुम्हारा पाप भी क्षीण हो जाय। जब वत्स नामवाले एक ब्राह्मण तुम्हें रोषपूर्वक डंडेसे मारेंगे, उस समय तुम्हारा उद्धार हो जायगा।' इतना कहकर वे मुनि चुप हो गये और मैं इस जलाशयमें रहकर षडक्षर मन्त्रका जप करता रहा। द्विजश्रेष्ठ ! आज तुम्हारे प्रसादसे मैं सर्पयोनिसे मुक्त हो गया। अतः शीघ्र बताओ मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?

तब मैंने उस दिव्यरूपधारी सर्पसे कहा—'भगवन्! मुझे कुछ कल्याणकारी उपदेश दीजिये, जिससे मुझे अपनी प्रिय पत्नीके विनाशका दुःख न हो तथा निर्धनता, रोग और शत्रुसे पराजयका कष्ट भी न हो।' यह प्रश्न सुनकर उस श्रेष्ठ पुरुषने कहा—द्विजवर! भगवान् शिवका षडक्षर मन्त्र मनुष्योंका सब पाप और अमंगल हर लेनेवाला है। ब्रह्मन्! तुम रात-दिन उस मन्त्रका यथाशक्ति जप करते रहो। उसके जपसे सब पापोंसे मुक्त होकर तुम निःसन्देह अभीष्ट वस्तु प्राप्त करोगे। मैंने भी सदैव बड़े-बड़े पाप किये हैं, तथापि उस मन्त्रके माहात्म्यसे मुझे परम ऐश्वर्ययुक्त लोक प्राप्त हुए हैं। विप्रवर! यह परम गोपनीय मन्त्र मैंने तुमको बताया है, किसी नास्तिकको इसका उपदेश नहीं करना चाहिये। सब वेदोंमें अहिंसाको परम धर्म बताया गया है। विशेषतः ब्राह्मणके लिये तो हिंसा सर्वथा त्याज्य है। इसलिये तुम सर्पका वध त्याग दो। जो समस्त चराचर प्राणियोंको अभय देता है, वह इहलोक और परलोकमें सदा सब प्रकारके सुखसे सम्पन्न होता है। भगवान् शंकरके समान कोई देवता नहीं है, गंगाके समान दूसरी नदी नहीं है, हिंसाके समान पाप नहीं है और दयासे बढ़कर कोई धर्म नहीं है*।

तदनन्तर वह अहिंसारूप धर्म सुनकर मैंने परलोकके भयसे दुःखित होकर उस ब्राह्मणसे पूछा—'भगवन्! मैंने बड़े-बूढ़ोंके मुखसे यह बात सुनी है कि राजा यदि वनमें मृगोंका वध करे, तो उसे दोष नहीं लगता है तथा चिकित्सा-शास्त्रके विद्वान् कहते हैं कि मांस खानेवाले लोग विशेष पुष्ट तथा दीर्घजीवी होते हैं। अतः इस विषयमें मुझे परम हितकारक बात बताइये। आपके मुँहसे जो कोई बात निकलेगी, उसका मैं सन्देह-रहित होकर पालन करूँगा।' मेरी बात सुनकर वे पुनः इस प्रकार बोले—'द्विजश्रेष्ठ ! ऐसी बात न कहो। यह सब तो मांसलोभी दुष्ट पापात्माओंका मत है। अहो! संसारमें वे निर्दयी, पापात्मा एवं दुष्ट पुरुष अत्यन्त शोचनीय हैं, जो सब दोषोंकी खानरूप मांसका आस्वादन


* चराचराणां भूतानामभयं यः प्रयच्छति। सर्वसौख्याढ्यो जायते दिवि चेह च॥
नास्ति भर्गसमो देवो नास्ति गंगासमा नदी। नास्ति हिंसासमं पापं नास्ति धर्मो दयापरः॥
(स्क० पु०, ना० २९। २२०-२२१)

१०८८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करते हैं। मांस न तो आयु बढ़ानेका साधन है और न आरोग्य तथा बलका ही हेतु है। उसे जो गुणकारक बताया जाता है, वह सब झूठ है। इसका दृष्टान्त मुझसे सुनो—मांसभोजी मनुष्य भी रोगसे पीड़ित, दुर्बल और स्वल्पायु देखे जाते हैं तथा जो मांस नहीं खाते, वे भी पृथ्वीपर नीरोग, दीर्घायु और हृष्ट-पुष्ट अंगोंवाले देखे जाते हैं। इसलिये मांसको सर्वथा त्याग देना चाहिये। जो जीवनकी इच्छा रखनेवाले जीवोंके मांस खाता है, वह घोर नरकमें जाता है और वहाँ उन्हीं प्राणियोंद्वारा वह स्वयं भक्षण किया जाता है। मांसकी उत्पत्ति घास, काठ या पत्थरसे नहीं होती, किसी जीवकी हिंसा करनेपर ही मांस मिलता है, अतः उसे सर्वथा त्याग देना चाहिये*। विद्वान् पुरुषोंको उचित है कि वे सब जीवोंको अपने ही समान देखें और पूरी शक्ति लगाकर उनकी रक्षा करें। जो जीवोंको मारता है, जो मारनेकी अनुमति देता है, जो उसे काट-काटकर अलग करता है, जो खरीदता और बेचता है, जो उसे पकाकर तैयार करता है, जो उसे परोसता है तथा जो खानेवाला है—ये आठ प्रकारके व्यक्ति घातक (हिंसक) माने गये हैं। खरीदनेवाला धनसे मारता है, खानेवाला भक्षणके द्वारा हत्या करता है तथा घातक वध और बन्धनके द्वारा मारता है। इस प्रकार जीवोंका तीन तरहसे वध होता है। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी जीवकी हिंसा नहीं करता, वह जरा-मृत्युसे रहित परम धामको प्राप्त होता है†। शाक, मूल और फलका भोजन करनेवाला ब्रह्मचर्यपरायण पुरुष भी यदि हिंसा-कर्ममें तत्पर है, तो उसे अपने नियम और व्रतका कोई फल नहीं मिलता। एक मनुष्य सौसे भी अधिक वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या करता है और दूसरा दयासे प्रेरित होकर केवल अहिंसा-व्रतका पालन करता है तो इन दोनोंमें जो दयालु पुरुष है, वही श्रेष्ठ है। जो मानव-दया-धर्मसे युक्त है, वह जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, दुर्लभ होनेपर भी उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है।' ऐसा कहकर वे महात्मा पुरुष मेरे देखते-देखते उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर स्वर्गलोकको चले गये। महामते! षडक्षर मन्त्रके माहात्म्यसे गन्धर्वलोग उनका यशोगान और किन्नर स्तुति करते थे।

उन महात्माके चले जानेपर मैंने भक्तिपूर्वक शिवमन्त्रकी दीक्षा ग्रहण की और तीनों सन्ध्याओंमें श्रद्धायुक्त हो भगवान् सिद्धेश्वरके समीप बैठकर मैं प्रतिदिन दस हजार मन्त्रका जप करने लगा। इसीसे मेरी युवावस्था स्थिर हो गयी है और मुझे लोकान्तरोंका ज्ञान एवं आकाशगमनकी शक्ति प्राप्त हो गयी है। द्वापरका अन्त होनेपर मैं सिद्धेश्वरजीका दर्शन करूँगा और सदा शिवलोकको प्राप्त होऊँगा। यह मैंने सत्य बात बतलायी है। सूतनन्दन! मैंने यह मोक्षदायक षडक्षरमन्त्रका माहात्म्य तुम्हें सुनाया है। जो मनुष्य उत्तम श्रद्धासे युक्त हो इसका सदा श्रवण करेगा, वह जन्मसे लेकर मृत्युतकके समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा। महाभाग! तुम भी इस मन्त्रका सदा जप किया करो।

**सूतजी कहते हैं—**महर्षियों! इस प्रकार पहले सद्गुरुके मुखसे सुना हुआ यह षडक्षर-माहात्म्य मैंने तुम्हारे समक्ष कहा है।


* न हि मांसं तृणात् काष्ठादुत्पलादपि जायते। हते जन्तौ भवेन्मांसं तस्मात्तत्परिवर्जयेत्॥
(स्क० पु०, ना० २९। २३२)

† हन्ता चैवानुमन्ता च विशस्ता क्रयविक्रयी। संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चाष्टघातकाः॥
धनेन क्रयकृद्धन्ति भक्षणेन च खादकः। घातको वधबन्धाभ्यामित्येवं त्रिविधो वधः॥
कर्मणा मनसा वाचा यो हिनस्ति न किञ्चन। स प्राप्नोति परं स्थानं जरामरणवर्जितम्॥
(स्क० पु०, ना० २९। २३४-२३७)

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १०८९ ---|---:

सप्तर्षि-आश्रमकी महिमा, सप्तर्षियोंका हाटकेश्वरक्षेत्रमें आगमन

सूतजी कहते हैं—द्विजवरो! हाटकेश्वरक्षेत्रमें सप्तर्षियोंका आश्रम हैं, जो समस्त कामनाओंको देनेवाला है। जो मनुष्य श्रावणमासकी पूर्णिमाको वहाँ स्नान करता है, वह मनोवांछित फलको पाता है। जो कन्द, मूल, फल और शाकद्वारा वहाँ श्राद्ध करता है, वह राजसूय तथा अश्वमेध दोनों यज्ञोंका फल पाता है। भाद्रपदमासके शुक्ल पक्षकी पंचमी तिथिमें वहाँ स्नान करके पुष्प, धूप और चन्दन आदिके द्वारा ऋषियोंका भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये। पूजनका मन्त्र इस प्रकार है—

ॐ अत्रये नमः, ॐ वसिष्ठाय नमः, ॐ कश्यपाय नमः, ॐ भरद्वाजाय नमः, ॐ गौतमाय नमः, ॐ कौशिकाय नमः, ॐ जमदग्नये नमः, ॐ अरुन्धत्यै नमः।

इस प्रकार उच्चारण करके पूजन करना चाहिये।

ब्रह्मर्षियो! पूर्वकालकी बात है। एक समय संसारमें बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं हुई। जीविकाकी साधनभूत समस्त ओषधियों (अन्न और फल आदि)-का नाश हो गया। इससे सब लोग भूखकी पीड़ासे व्याकुल हो गये। इस प्रकार अन्नका विनाश हो जानेसे जब सारा भूमण्डल भूखसे पीड़ित हो गया, तब सप्तर्षि लोग भी क्षुधासे व्याकुल होकर इधर-उधर भ्रमण करने लगे। घूमते-घूमते वे सब लोग वर्षार्दर्भि नामक राजाके राज्यमें गये। उनका आगमन सुनकर राजा वहाँ आये और इस प्रकार बोले—'मैं आपलोगोंको अन्न, ग्राम और धान-जौ आदि दूँगा।'

ऋषि बोले—राजन्! राजाका प्रतिग्रह बड़ा भयंकर होता है। वह स्वादमें मधुके समान है, किंतु परिणाममें विषके तुल्य होता है। अतः पुण्यात्मा ब्राह्मणोंको उसे दूरसे ही त्याग देना चाहिये। इसलिये तुम्हारा कल्याण हो, तुम घर लौट जाओ, हम तुम्हारा धन कदापि नहीं लेंगे। ऐसा कहकर ऋषिलोग चमत्कारपुरकी ओर चल दिये। तब राजाने गूलरके फलोंमें सोना भरकर उन फलोंको सप्तर्षियोंके मार्गमें बहुत आगे रखवा दिया। तब वे मुनि पृथ्वीपर गिरे हुए गूलरके फलोंको देखकर बड़े प्रसन्न हुए और भूखसे पीड़ित होनेके कारण उन सबको उठाने लगे। उन्हें भारी देख अत्रिने एक फल तोड़कर देखा और उसमें सुवर्ण देखकर कहा—'हमलोगोंकी ज्ञानशक्ति मन्द नहीं हुई है, हमारी बुद्धि मूढ़ नहीं है, जो कि इन फलोंको सुवर्णसे भरे हुए जानकर भी हम ग्रहण कर लें। अतः इन सुवर्णपूरित फलोंको दूरसे ही त्यागकर चल देंगे। एक मनुष्य सम्पूर्ण पृथ्वीका स्वामी है और दूसरा केवल निष्कामभावसे रहनेवाला अकिंचन है। इन दोनोंमें जो निष्काम पुरुष है, वही सौभाग्यशाली एवं श्रेष्ठ है।'

जमदग्नि बोले—जो अधम ब्राह्मण धन पाकर शोक करनेकी जगह प्रसन्न होता है, वह मन्दबुद्धि उससे होनेवाले नरकको नहीं देखता। दान लेनेमें समर्थ होकर भी जो उससे निवृत्त हैं, उन्हें वही लोक मिलता है, जो दाताओंको मिलता है।

कश्यपने कहा—मुने! यह जो धनका संग्रह प्राप्त हुआ है, सो महान् अनर्थरूप है; क्योंकि ऐश्वर्यसे मोहित चित्तवाला मानव आत्मकल्याणसे वंचित हो जाता है। अर्थसम्पत्ति मोहमें डालनेवाली है और मोह नरकमें गिरानेवाला है। अतः कल्याणकी इच्छा रखनेवाला पुरुष धनको प्रयत्नपूर्वक त्याग दे। धनके द्वारा जिस धर्मका साधन किया जाता है, वह नाशवान् बताया गया है और तपस्याद्वारा जिस धर्मका साधन किया जाता है, वह मोक्ष देनेवाला होता है, ऐसा मेरा विचार है।

भरद्वाजजी बोले—बुढ़ापेसे जीर्ण होनेवाले पुरुषके दाँत और केश जीर्ण हो जाते हैं, आँख और कान भी जीर्ण हो जाते हैं, परंतु उसकी

१०९० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तृष्णा तरुण होती जाती है। जैसे पूरे शरीरके बढ़नेके साथ-साथ प्रत्येक अंग भी वृद्धिको प्राप्त होता है, उसी प्रकार तृष्णा भी धनके बढ़नेके साथ-साथ बढ़ती रहती है। तृष्णाका कहीं अन्त नहीं है। उसे पूर्ण करना भी बहुत कठिन है, वह अपने साथ सैकड़ों दुःख लिये चलती है और उसके द्वारा प्रायः अधर्म ही होता है। अतः तृष्णाको सर्वथा त्याग देना चाहिये।^१

गौतमने कहा—जिसका मन सन्तुष्ट है, उसके लिये सर्वत्र सम्पत्तियाँ हैं। जिसने अपने पैरोंमें जूता पहन रखा है, उसके लिये सारी पृथ्वी ही चमड़ेसे आच्छादित है। सन्तोषरूपी अमृतसे तृप्त हुए शान्त चित्तवाले मनुष्योंको जो सुख प्राप्त होता है, वह धनके लोभमें पड़कर इधर-उधर दौड़ लगानेवाले लोगोंको कहाँसे मिल सकता है। असन्तोष सबसे महान् दुःख है और सन्तोष ही महान् सुख है। अतः सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुष सदैव सन्तुष्ट रहे।^२

विश्वामित्र बोले—किसी वस्तुकी इच्छा रखनेवाले पुरुषकी जब एक कामना पूरी हो जाती है, तब दूसरी वस्तुकी तृष्णा उसे बाणके समान बाँधने लगती है।

वसिष्ठजीने कहा—कामना रखनेवाला पुरुष सहस्रों कामनाएँ पाकर भी कभी सन्तुष्ट नहीं होता। जैसे घीकी आहुति देनेसे अग्नि प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार उसकी इच्छा रखनेवाला पुरुष मोहग्रस्त होनेके कारण कभी सुख नहीं पाता।

अरुन्धती बोलीं—जैसे अनन्त मृणालतन्तुएँ कमलनालमें जाकर स्थित हैं, उसी प्रकार देहधारियोंकी देहमें विद्यमान तृष्णा अनेक अनर्थोंका आश्रय है, खोटी बुद्धिवालोंके लिये जिसका त्याग करना अत्यन्त कठिन है, जो वृद्ध होनेपर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो प्राणान्तकारी रोगके समान है, उस तृष्णाका त्याग कर देनेवाले पुरुषको ही सुख मिलता है।^३

चण्डा बोली—मेरे ये स्वामीलोग जब इस धनसे सर्पकी भाँति डरते हैं, तो मुझे भी उस धनसे क्यों नहीं भय होगा।

पशुमुखने कहा—सदा धर्मपरायण विद्वान् पुरुष जैसा आचरण करते हैं, अपने हितकी इच्छा रखनेवाले विज्ञपुरुषको भी वैसा ही आचरण करना चाहिये।

सूतजी कहते हैं—ऐसा कहकर वे सप्तर्षिगण उन सुवर्णगर्भित फलोंको वहीं छोड़कर अन्यत्र चले गये। तत्पश्चात् उन्होंने चमत्कारपुरके क्षेत्रमें प्रवेश किया। वहाँ पहुँचते ही उन्हें सहसा अपने सामने आया हुआ शुनोमुख नामक संन्यासी दिखायी दिया। तब उसीके साथ वे किसी वनके भीतर गये। वहाँ जानेपर उन सबने कमलोंसे सुशोभित एक सुन्दर सरोवर देखा। तब भूखसे पीड़ित होनेके कारण उन्होंने उस पोखरेसे बहुतेरे मृणाल निकाले और किनारेपर रखकर सन्ध्या-तर्पण आदि पुण्यकर्मोंमें लग गये। तदनन्तर वे सब लोग जलसे निकलकर एक-दूसरेसे मिले। तब वहाँ उन मृणालोंको देखकर इस प्रकार कहने लगे।

ऋषि बोले—अहो! हम भूखसे पीड़ित हैं। इस दशामें भी किस निर्दयीने हमारे समस्त मृणाल इस स्थानसे चुरा लिये हैं।


१- अनन्तपारा दुष्पूरा तृष्णा दुःखशतावहा। अधर्मबहुला चैव तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ (स्क० पु०, ना० ३२।४५)
२- सर्वत्र सम्पदस्तस्य सन्तुष्टं यस्य मानसम्। उपानद्गूढपादस्य ननु चर्मावृतेव भूः॥
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्। कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥
असन्तोषं परं दुःखं सन्तोषं परमं सुखम्। सुखार्थी पुरुषस्तस्मात् सन्तुष्टः सततं भवेत्॥ (स्क० पु०, ना० ३२।४७-४९)
३- या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः। याऽसौ प्राणान्तको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्॥ (स्क० पु०, ना० ३२।५७)

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०९१

शुनोमुखने कहा—जिसने इन मृणालोंको चुराया है, वह साम आदि वेदोंको पढ़े, अतिथिप्रेमी गृहस्थ हो तथा निरन्तर सत्य बोले।

ऋषि बोले—वाह! आपने जो शपथ किये हैं, वे तो द्विजातियोंको अभीष्ट ही हैं। अतः यह निश्चय हो गया कि इन मृणालोंकी चोरी श्रीमान्ने ही की है।

शुनोमुखने कहा—निश्चय मैंने ही आपलोगोंके मृणाल चुराये हैं। आप मुझे इन्द्र जानें। द्विजवरो! आपमें लोभका अभाव देखकर मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ। अतः आप मेरे साथ शीघ्र स्वर्गलोकमें पधारें।

ऋषि बोले—देवराज! हम तो मोक्षमार्गके पथिक हैं। हमारे मनमें स्वर्गकी लिप्सा नहीं है। अतः इस तीर्थमें मोक्षके लिये हम तपस्या करेंगे।

जमदग्निने कहा—सुरेश्वर! हमने मृणालोंसे ही जीवन निर्वाह करते हुए समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीकी परिक्रमा की है। अब हमारे साथ आपका जो समागम हुआ है, इससे आपका ही कल्याण हो। आप यहाँसे स्वर्गलोकको पधारें।

इन्द्र बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वरो! मेरा दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता। इसलिये आपलोग अपनी कोई अभीष्ट वस्तु मुझसे ग्रहण करें।

ऋषियोंने कहा—इन्द्र! इस पृथ्वीपर हमारे नामसे यह आश्रम विख्यात हो और यहाँ आनेवाले मनुष्योंके सब पातकोंका नाश करनेवाला हो। हम सदा यहीं तपस्याके लिये तबतक निवास करेंगे, जबतक कि हमें सनातन-मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो जाती।

इन्द्र बोले—सप्तर्षियो! आपलोगोंका यह आश्रम तीनों लोकोंमें विख्यात होगा। जो जिस कामनाको मनमें लेकर श्रावणकी पूर्णिमाको यहाँ श्राद्ध करेगा, वह उस मनोरथको अवश्य प्राप्त करेगा। जो मनुष्य निष्कामभावसे यहाँ श्राद्ध अथवा दान करेगा, वह निस्सन्देह मोक्ष प्राप्त कर लेगा। जो आपलोगोंके शुभ आश्रमपर देहत्याग करेंगे, वे पापी होनेपर भी परम गतिको प्राप्त होंगे। जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो यहाँ इंगुदी, बेर अथवा बेल आदिसे भी पितरोंके लिये श्राद्ध करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त हो किन्नरगणोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ देवदुर्लभ परम सिद्धिको प्राप्त करेगा।

ऐसा कहकर इन्द्रदेव सब ऋषियोंसे प्रशंसित हो वहाँसे अन्तर्धान हो गये तथा वे सप्तर्षि वहीं रहने लगे। तदनन्तर दीर्घकाल व्यतीत होनेपर उन्होंने भी भारी तपस्या करके जरा-मृत्युरहित परमपद प्राप्त कर लिया। सप्तर्षियोंने अपने आश्रमपर त्रिशूलधारी भगवान् शिवके लिंगमय स्वरूपकी जो स्थापना की है, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। जो भक्तिपूर्वक पुष्प, धूप और चन्दन आदिसे उसका पूजन करता है, वह अवश्य मोक्षको प्राप्त होता है।


## अगस्त्य-आश्रममें शिव-पूजा आदिका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! हाटकेश्वरक्षेत्रमें एक दूसरा आश्रम महर्षि अगस्त्यका है। वहाँ साक्षात् विश्वात्मा भगवान् महेश्वर निवास करते हैं। वहाँ चैत्रमासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी तिथिको स्वयं भगवान् सूर्य आकर देवताओंके स्वामी महादेवजीकी पूजा करते हैं। जो कोई भी मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा करता है, वह उत्तम लोकोंमें जाता है और जो वहाँ श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके पितर उसी प्रकार तृप्त होते हैं, जैसे पितृमेध यज्ञसे उन्हें तृप्ति होती है। जिस समय विन्ध्याचल पर्वतने बढ़कर सूर्यदेवका मार्ग रोक लिया, उस समय वे सूर्यदेव ब्राह्मणका रूप धारण करके चमत्कार नामक नगरके क्षेत्रमें महर्षि अगस्त्यके आश्रमपर गये और बोले—'मुनिश्रेष्ठ! आज मैं आपके यहाँ अतिथिके रूपमें आया हूँ।'

अगस्त्यजीने प्रसन्नतापूर्वक कहा—मुने! स्वागत
१०९२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

है, स्वागत है। आपको जो अभीष्ट हो, वह वस्तु बतावें; मैं उसे दूँगा।

सूर्यदेव बोले—ब्रह्मन्! मैं सूर्य हूँ, ब्राह्मणके रूपसे आपके सामने आया हूँ। पर्वतोंमें श्रेष्ठ सुमेरुगिरिके प्रति ईर्ष्या होनेके कारण विन्ध्यपर्वत मेरा मार्ग रोककर खड़ा है; इसलिये आप साम आदि उपायोंसे उस पर्वतको रोकें। जिससे मेरी गति भंग होनेके कारण अतिकाल न होने पावे।

अगस्त्यजीने कहा—दिवाकर! मैं उस बढ़ते हुए कुल पर्वतको रोक दूँगा। आप अपने स्थानको पधारिये।

उनकी आज्ञा पाकर सूर्यदेव अपने लोकको चले गये। इधर अगस्त्य मुनि शीघ्र ही जाकर विन्ध्याचल पर्वतसे आदरपूर्वक बोले—‘पर्वतश्रेष्ठ! तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही लघु रूप धारण करो। इस समय मेरा विचार दक्षिणके तीर्थोंमें स्नान करनेको हुआ है। किंतु यह कार्य तुम्हारे ही अधीन है, इसलिये जैसा उचित जान पड़े वैसा करो।’ महर्षि अगस्त्यका यह वचन सुनकर विन्ध्यपर्वत तत्काल विनीतभावसे नीचा हो गया। तब उस पर्वतको पार करके दक्षिण किनारे पहुँचकर अगस्त्यजीने कहा—‘गिरिश्रेष्ठ! जबतक मैं पुनः लौट न आऊँ, तबतक तुम्हें सदा इसी स्थितिमें रहना चाहिये।’ अगस्त्य मुनिके शापसे डरा हुआ वह श्रेष्ठ पर्वत पुनः लौट आनेकी प्रतीक्षामें बढ़ नहीं सका। विप्रवरो! अगस्त्य मुनि तभीके गये हुए आजतक उस मार्गसे नहीं लौटे। वे अब भी दक्षिण दिशामें ही स्थित हैं। उन्होंने लोपामुद्राको भी वहीं बुला लिया और सूर्यदेवका आवाहन करके आदरपूर्वक कहा—‘उष्णरश्मे! आपके कहनेसे मैंने अपना आश्रम छोड़ दिया है परंतु वहाँ मैंने जो शिवलिंग स्थापित किया है, उसकी नित्यपूजा आपको करनी चाहिये।’

सूर्यदेव बोले—मुने! मुझे स्वीकार है, मैं तुम्हारे द्वारा स्थापित शिवलिंगका पूजन करूँगा और दूसरा कोई भी जो पुरुष उस दिन उस शिवलिंगकी पूजा करेगा, वह मेरे लोकमें आकर पुण्यका भागी होगा।

सूतजी कहते हैं—इसी कारण भगवान् सूर्य चैत्रमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तिथिको उस स्थानपर सदैव उपस्थित होते हैं।


दुर्वासा-लोमहर्षण-संवाद, मन्त्रसिद्धिकी विधि

ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन! मन्त्रका जप किस प्रकार सिद्ध होता है?

सूतजी बोले—महर्षियो! पूर्वकालमें दुर्वासा मुनिके सम्मुख इस विषयका वर्णन करते हुए पिताजीके मुखसे जो कुछ मैंने सुना है, वह बतलाता हूँ।

दुर्वासाजीने पूछा—सूतजी! मैं किसी अभीष्ट मन्त्रको सिद्ध करना चाहता हूँ, उसकी सिद्धिके लिये जो शास्त्रोक्त विधान हो, वह बताइये।

लोमहर्षण बोले—मुने! मन्त्रोंका साधन सबके लिये कष्टदायक, दोषयुक्त तथा अनेक प्रकारके विघ्नोंसे व्याप्त रहता है। अतः यदि आप मन्त्रके लिये सिद्धि चाहते हैं तो चमत्कारपुरके क्षेत्रमें चले जाइये। वहाँ महर्षि अगस्त्यजीके द्वारा निर्मित चित्रेश्वरी पीठ है। वह हृदयस्थित मन्त्रोंकी तत्काल सिद्धि करनेवाला पीठ बताया गया है। वहाँ न तो कोई विघ्न आता है और न किसी प्रकारका दोष ही प्राप्त होता है। देवताओंके वरदानसे वहाँ कोई भी मन्त्र सिद्ध हुए बिना नहीं रहता। वह सिद्धपीठ चारों युगोंके लिये हितकर है और जो वहाँ रहते हैं, उन्हें युगके अनुसार शीघ्र सिद्धिकी प्राप्ति कराता है। द्विजश्रेष्ठ! जो जिस मन्त्रकी सिद्धि करना चाहता है, वह उसको पहले ही एक लाख जप ले। ऐसा करनेसे वह मनुष्य पवित्र, सिद्ध एवं मन्त्रसाधनका अधिकारी बन जाता है। तत्पश्चात् पुनः उसका चार लाख जप करे और प्रज्वलित अग्निमें दशांश आहुति

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध *१०९३

दे। इससे अवश्य ही मन्त्रकी सिद्धि होती है। सौम्य कार्योंमें पीली सरसों और चमेलीके फूलोंसे हवन होता है। हवनके पश्चात् ब्राह्मणभोजन कराना चाहिये तथा रौद्र कार्योंमें लाल फूल एवं गुग्गुलसे होम कराना फलप्रद माना गया है। हवनके बाद कुमारी कन्याओंको भोजनादिसे तृप्त करना चाहिये। यह सत्ययुगके लिये उत्तम मन्त्रसाधन बताया गया है। त्रेतायुगमें एक चतुर्थांश कम किया जाता है, द्वापरमें आधा और कलियुगमें चतुर्थांश साधन आवश्यक है। इस प्रकार मन्त्र-सिद्धि प्राप्त करके उस पीठमें अपनी इच्छाके अनुसार सत्य साधन करे। ऐसा करनेसे मनुष्य शापानुग्रहमें समर्थ, तेजस्वी, सब प्राणियोंके लिये अजेय और साधुसम्मानित हो जाता है।

सूतजी कहते हैं—मेरे पिताजी वह सब बात सुनकर दुर्वासा मुनि चित्रेश्वर पीठमें चले गये और वहाँ उन्होंने सब मन्त्रोंका क्रमशः साधन किया।

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धुन्धुमारेश्वरकी स्थापना और महिमा, जलशायी विष्णु तथा अशून्यशयन-व्रतका महत्त्व, वाष्कलि दैत्यका वध

सूतजी कहते हैं—वहीं राजा धुन्धुमारके द्वारा स्थापित किया हुआ शिवलिंग है, जिसे उन्होंने अति मनोहर सर्वरत्नमय मन्दिर बनवाकर प्रतिष्ठित किया है। उस तीर्थमें आश्रम बनाकर राजाने बड़ी भारी तपस्या की। जिसके प्रभावसे भगवान् शिव उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगमें विराजमान हुए। उस मन्दिरके समीप उन महात्मा राजाने एक बावली बनवायी, जो अत्यन्त निर्मल जलसे परिपूर्ण, सब तीर्थोंके समान महत्त्व रखनेवाली और मंगलकारक थी। राजा धुन्धुमार सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए थे। वे बृहदश्वके पुत्र थे। उन्होंने मरुप्रदेशके जंगलमें निवास करनेवाले धुन्धु नामक महादैत्यको मारा था। इसलिये वे तीनों लोकोंमें धुन्धुमारके नामसे विख्यात हुए। उनका दूसरा नाम कुवलयाश्व भी था। चमत्कारपुरका क्षेत्र परम पावन है, ऐसा जानकर उन्होंने उसी क्षेत्रमें भगवान् शंकरका चिन्तन करते हुए भारी तपस्या की। रत्ननिर्मित प्रासादमें उत्तम महालिंगकी स्थापना करके भेंट, पूजा और उपहार आदिके द्वारा तथा पुष्प, धूप और चन्दन आदि सामग्रियोंसे भगवान् शिवका पूजन किया। इससे प्रसन्न होकर महादेवजीने वृषभपर आरूढ़ होकर गौरीदेवी तथा गणोंके साथ राजाको प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'तुम मनोवांछित वर माँगो।'

धुन्धुमारने कहा—सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी शिव! आप कृपापूर्वक अपने इस लिंगमय विग्रहमें सदैव निवास करें।

श्रीभगवान् बोले—नृपश्रेष्ठ! चैत्रमासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी तिथिको मैं गौरीदेवीके साथ सदैव यहाँ निवास करूँगा। उस समय इस बावलीमें स्नान करके जो मेरा दर्शन करेगा, वह मेरे लोकमें जायगा।

सूतजी कहते हैं—ऐसा कहकर भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये तथा राजा प्रसन्नचित्त हो वहीं निवास करने लगे। अन्तमें वे मुक्तिके भागी हुए।

वहीं चित्रशिला तीर्थके उत्तर भागमें जलशायी भगवान् विष्णुका सुविख्यात स्थान है, जो महापातकोंका नाश करनेवाला है। जो हरिशयनी तथा हरिबोधिनी एकादशीको उपवास करके उस तीर्थमें श्रीहरिकी पूजा करता है, वह वैकुण्ठधामको जाता है। भगवान् श्रीहरिके शयन करनेपर जो कृष्ण पक्षकी द्वितीया तिथि (श्रावण आदि मासोंकी कृष्णा द्वितीया) आती है, उसका नाम 'अशून्य-शयना' है। यह तिथि भगवान् विष्णुको बहुत प्रिय है। उस दिन जो वहाँ शास्त्रोक्त विधिसे भगवान् जलशायी (विष्णु)-का पूजन करता है, वह श्रीहरिके धामको जाता है।

ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन! भगवान् जलशायी

१०९४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

वहाँ कैसे प्राप्त हुए हैं और किस विधिसे उनकी पूजा की जाती है?

**सूतजीने कहा—**पूर्वकालमें वाष्कलि नामसे प्रसिद्ध दानवोंका राजा था। वह बड़ा बलवान् तथा सम्पूर्ण देवता, गन्धर्व, नाग एवं राक्षसोंके लिये भी अजेय था। उस महाबली दानवने सम्पूर्ण भूमण्डलको अपने वशमें करके दैत्योंकी सेना साथ ले देवलोकपर भी चढ़ाई की। वहाँ देवताओं और असुरोंमें एक-दूसरेका संहार करनेवाला बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। अन्तमें दानवराज वाष्कलिने सेना तथा सामग्रीसहित देवराज इन्द्रपर विजय पायी। तब इन्द्रने देवताओंके साथ स्वर्गका सिंहासन छोड़कर श्वेतद्वीपनिवासी भगवान् विष्णुकी शरण ली, जहाँ शेषनागकी शय्यापर श्रीहरि योगनिद्राको स्वीकार करके शयन करते हैं और देवी लक्ष्मी उनके युगल चरणारविन्दोंकी सेवामें संलग्न रहती हैं। वहाँ पहुँचकर देवताओंने सब ओरसे वैदिक सूक्तोंद्वारा भगवान् विष्णुका भक्तिपूर्वक स्तवन किया। तदनन्तर जगदीश्वर भगवान् श्रीहरि शय्यासे उठकर इन्द्रसे बोले—'सहस्राक्ष! इस समय तीनों लोकोंमें कुशल तो है न? तुम सम्पूर्ण देवताओंको साथ लेकर यहाँ कैसे आये हो?'

**इन्द्रने कहा—**भगवन्! दैत्यराज वाष्कलि भगवान् शंकरसे वरदान पाकर बड़ा बलवान् हो गया है। वह देवताओंद्वारा युद्धमें अजेय है। उसने युद्धभूमिमें मुझे परास्त कर दिया है। मधुसूदन! इस समय वह स्वर्गलोकमें निवास करता है। इसी कष्टसे मैं सम्पूर्ण देवताओंके साथ आपकी शरणमें आया हूँ। प्रभो! पूर्वकालमें हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपुके भयसे तथा अन्यान्य दुरात्मा दैत्योंके आतंकसे भी आपने हम सब देवताओंकी रक्षा की है; अतः इस महाबली दानव वाष्कलिसे भी आज हमारी रक्षा कीजिये। देवेश! आपको छोड़कर हम देवताओंके लिये दूसरा कोई उत्तम आश्रय नहीं है।

**श्रीभगवान् बोले—**इन्द्र! समय आनेपर मैं स्वयं उस दानवको दण्ड दूँगा। अतः जबतक वह समय नहीं आता, तबतक तुम कहीं तीर्थभूमिमें रहकर बड़ी भारी तपस्या करो।

**इन्द्रने कहा—**जगदीश्वर! मैं उस दैत्यका नाश करनेके लिये किस क्षेत्रमें तपस्या करूँ, यह आप ही बतावें।

**भगवान् विष्णु बोले—**इन्द्र! चमत्कारपुरका क्षेत्र सिद्धिदायक है, अतः तुम वहीं जाकर उसके वधके लिये तपस्या करो।

**इन्द्रने कहा—**केशव! हम दानवराज वाष्कलिसे डरे हुए हैं, अतः आपके बिना वहाँ नहीं जायेंगे। इसलिये आप स्वयं भी वहाँ चलिये। आपसे सुरक्षित होकर ही मैं वहाँ भारी तपस्या कर सकूँगा।

भगवान् विष्णुने 'एवमस्तु' कहकर देवताओं और लक्ष्मीजीके साथ चमत्कारपुरके क्षेत्रमें पदार्पण किया। उस समय सब देवताओंने अपने लिये पृथक्-पृथक् आश्रम बनाया। भगवान् विष्णुने वहाँके प्राचीन एवं सुविस्तृत कुण्डमें क्षीरसागरका आवाहन किया और श्वेतद्वीपकी भाँति वहाँ भी वे शयन करने लगे। उस समय सब देवता उनके चारों ओर विनीतभावसे खड़े हो उनकी स्तुति करते थे। तदनन्तर आषाढ़ कृष्णा द्वितीया (पूर्णिमान्त मासकी गणनाके अनुसार श्रावण कृष्णा द्वितीया)—का शुभ दिवस आनेपर बृहस्पतिजीने इन्द्रसे कहा—'पुरन्दर! आज अशून्यशयना नामवाली द्वितीया है। यह भगवान् विष्णुकी अत्यन्त प्रिय तिथि है।'

यह सुनकर देवराज इन्द्रने शास्त्रोक्त विधिसे व्रत करके उस दिन जलशायी विष्णुका पूजन किया और इसी प्रकार चार महीनोंतक प्रत्येक द्वितीयाके दिन वे श्रीहरिका पूजन करते रहे। इससे वे दिव्य तेजसे सम्पन्न हो गये। उन्हें तेजस्वरूपमें देखकर भगवान् विष्णु बड़े प्रसन्न हुए और बोले—'इन्द्र! अब तुम सम्पूर्ण देवताओंके साथ वाष्कलिका वध करनेके लिये जाओ, तुम्हारी विजय होगी। देवशत्रुओंको मारनेके लिये मेरा यह सुदर्शन चक्र भी तुम्हारे साथ

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १०९५ ---|---

जायगा।' ऐसा कहकर श्रीहरिने दानवेन्द्रका वध करनेके लिये इन्द्रके साथ अपने सुदर्शन चक्रको भी भेजा। इन्द्रने उस चक्रके साथ जाकर युद्धमें सम्पूर्ण दानवोंका संहार कर डाला। दानवराज वाष्कलि भी चक्रसे मस्तक कट जानेके कारण वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा। और भी बहुत-से शूरवीर बलोन्मत्त दानव युद्धमें मारे गये। इस प्रकार दैत्यसेनाका संहार करके सुदर्शन चक्र पुनः भगवान् विष्णुके हाथमें आ गया। वे इन्द्र आदि देवता भी निर्भय होकर पुनः भगवान् विष्णुके समीप आये और उन्हें प्रणाम करके बोले—'देवेश! आपके प्रभावसे हमारे सब शत्रु मारे गये और त्रिलोकीका अकण्टक राज्य फिर हमें प्राप्त हो गया। अब हमारे लिये सदैव कल्याण करनेवाला तथा हमारे शत्रुओंको भय पहुँचानेवाला जो कर्तव्य हो, उसका उपदेश कीजिये।'

श्रीभगवान्ने कहा—मुझे तो सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये पवित्र जलसे भरे हुए इस कुण्डमें अब सदैव निवास करना है। अतः तुम्हें प्रतिवर्ष यहाँ आकर प्रयत्नपूर्वक चातुर्मास्यमें होनेवाले 'अशून्यशयन' व्रतका पालन करना चाहिये, जिससे तुम्हारे शत्रु होंगे ही नहीं। दूसरा भी जो मनुष्य भक्तिपूर्वक यहाँ आकर मेरी पूजा करेगा, वह साधुपुरुषोंके लोकको प्राप्त होगा। इन्द्र! अब तुम स्वर्गमें जाकर राज्य करो। जब फिर आवश्यकता हो, तब यहीं आकर मुझसे मिलना।

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर इन्द्र भगवान् विष्णुको प्रणाम करके चले गये और भगवान् लोकहितके लिये वहीं रहने लगे। द्विजवरो! जो मनुष्य अत्यन्त श्रद्धापूर्वक भक्तिभावसे उन जलशायी विष्णुकी पूजा करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। सब देवताओंने मिलकर वहाँ द्वारका निर्माण की है। वहाँ चौमासेमें भगवान् विष्णुका पूजन करके मनुष्य मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। अतः सर्वथा प्रयत्न करके सब मनुष्योंको उस द्वारकाकी पूजा करनी चाहिये।


विश्वामित्रका मेनकासे वार्तालाप, सती स्त्रियोंके पालन करनेयोग्य धर्मका वर्णन, विश्वामित्रका वैराग्य, दोनोंका परस्पर शाप और तीर्थजलमें स्नानसे उद्धार

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! उस क्षेत्रमें एक दूसरा कुण्ड भी है, जो विश्वामित्र ऋषिके द्वारा प्रकट किया गया है। वह समस्त कामनाओंको देनेवाला है।

ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन! विश्वामित्र मुनिका वह निर्मल तीर्थ किस समय वहाँ प्रतिष्ठित हुआ है?

सूतजी बोले—द्विजवरो! वहाँ पहलेसे ही एक साधारण झरना था, जो पृथ्वीपर माहात्म्यसे युक्त होकर बहता था। फिर उसीमें देवनदी गंगा वहाँ स्वयं आकर स्थित हुई, जिसमें स्नान करनेवाला पुरुष तत्काल सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य वहाँ पितरोंके उद्देश्यसे श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसका वह श्राद्ध पितरोंको अक्षय तृप्ति प्रदान करनेवाला होता है। उस उत्तम तीर्थमें जो कुछ दान, होम और जप आदि सत्कर्म किया जाता है, उसका अनन्त फल होता है।

एक समयकी बात है। व्याधके बाणसे घायल हुई एक मृगी उस देवनदीके जलमें घुसी और वहीं उसकी मृत्यु हो गयी। उस पुण्यजलके प्रभावसे वही मृगी स्वर्गलोकमें मेनका नामक अप्सरा हुई। वह अप्सरा उस तीर्थके प्रभावका स्मरण करती हुई चैत्र शुक्ला तृतीयाको रविवार और भरणी नक्षत्रका योग होनेपर सदा वहाँ

१०९६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

आकर स्नान किया करती थी। किसी समय वैसा ही योग आनेपर मुनीश्वर विश्वामित्र भी कहींसे घूमते हुए उस तीर्थमें आ गये। इधर मेनका भी देवदर्शनके लिये स्वर्गलोकसे आयी और भगवान्‌की पूजा करके स्वर्गमें जाने लगी। तबतक उसकी दृष्टि वहाँ इधर-उधर घूमते हुए मुनिवर विश्वामित्रपर पड़ी। उन्हें देखते ही मेनका कामके अधीन हो गयी और शीघ्रतापूर्वक उनके समीप गयी। उस अदृष्टपूर्व सुन्दरीको देखकर मुनिने पूछा—'कल्याणी! तुम्हारा शुभ हो। मन, वाणी और क्रियाद्वारा भगवान् विष्णुके चरणोंमें तुम्हारी अविचल भक्ति हो। बाले! क्या तुम सदाचार और विनयसे युक्त होकर सदा प्रिय वचन बोलती हुई अपने पतिके चरणारविन्दोंकी सेवामें संलग्न रहती हो? क्या तुम्हें सदा अपने पतिकी प्रियतमा होनेका सौभाग्य प्राप्त है? क्या पतिके सामने अथवा परोक्षमें भी तुम दान आदिसे अपने बन्धु-बान्धवों तथा सुहृदोंका सत्कार करती हो? क्या तुम पतिके सो जानेपर सोती और उनके जागनेसे पहले ही उठ जाती हो? क्या प्रातःकाल उठकर तुम प्रतिदिन अपने घरमें स्वयं ही झाड़ू लगाती हो? क्या देवताओंको नमस्कार करके घरके गुरुजनोंको प्रतिदिन प्रणाम करती हो और उन सबको अपनी शक्तिके अनुसार अन्न और जल देकर स्वयं सबसे पीछे भोजन करती हो? क्या जलजन्तुओंकी रक्षा करती हुई अपने सघन वस्त्रसे पानीको सात बार छानकर पीती हो? कभी सूर्यास्तके समय तो तुम भोजन नहीं करतीं? अपने सेवकों, कुटुम्बीजनों तथा विशेषतः साधु-संतोंको दिये बिना तो तुम भोजन नहीं करतीं? क्या तुम दयाभावसे युक्त होकर शरीरको क्लेश देनेवाले जूँ, खटमल और मच्छर आदिका भी पुत्रकी भाँति पालन करती हो? क्या साधु-पुरुषोंके मुखसे प्रतिदिन भक्तिपूर्वक कल्याणमय धर्मका उपदेश सुनती हो और सुनकर आदरके साथ उसका पालन भी करती हो? क्या पवित्र शास्त्र-कथा सुनकर तुम शास्त्रका, वाचकका तथा उसकी विशेष व्याख्या करनेवाले विद्वान्‌का भी पूजन करती हो? क्या तुम मुनीश्वरोंद्वारा प्रतिपादित पुराण और शास्त्र-ग्रन्थोंको अच्छे पत्रपर सुन्दर अक्षरोंमें लिखाकर उन्हें साधु-पुरुषोंको अर्पण करती हो? क्या प्रतिदिन शिवमन्दिरमें अपनी शक्तिके अनुसार तुम संगीत, वाद्य आदिकी व्यवस्था करती और भेंट-पूजा उपहार चढ़ाती हो? क्या तुम साधु-पुरुषोंको उनका पूरा शरीर ढँकनेके उपयुक्त वस्त्र अर्पण करती हो? तुम दूसरोंके घरमें विशेषतः रातके समय व्यर्थ घूमनेके लिये तो नहीं जातीं? कहीं पतिके भूखे होते हुए भी तुम स्वयं तो भोजन नहीं कर लेतीं? क्या तुम प्रयत्नपूर्वक पतिकी आज्ञाका उल्लंघन करनेके दोषसे अपनेको बचाती हो? कभी पतिके कुपित होनेपर तुम उनकी बातोंका उत्तर तो नहीं देतीं? उनके क्रोधरूपी पापका निवारण करनेके लिये उनसे मीठे और प्रिय वचन तो बोलती हो न? तुम पतिके परदेश जानेपर मैले वस्त्र धारण करती और दीन, दुर्बल तथा म्लानवदन रहती हो न? कभी मन्दिरके पृष्ठभागमें तुम जूठा और फूटा बर्तन तो नहीं रखतीं? रात्रिमें जागरणकालमें तुम कथाके स्थान, झरना, एकान्त प्रदेश, नदीतट और वनमें कभी अकेली तो नहीं जातीं? शुभे! तुम कुलटा स्त्रियोंसे तथा दाइयों, मालिनों और धोबिनोंसे तो कभी मैत्री नहीं रखतीं? अपने मुखमण्डलमें तुम कुंकुमकी बेंदी तो लगाती हो न?

मेनका बोली—मुने! आपने जिनके धर्मोंका वर्णन किया है, वे दूसरी स्त्रियाँ हैं। हम तो स्वेच्छाचार विहार करनेवाली देवलोककी अप्सराएँ हैं। महाभाग! आप किस देशसे आये हैं? आपके दर्शनसे मेरा मन विचलित हो रहा है, मुझ अनुरागिणीको आप स्वीकार करें। अन्यथा मेरे प्राण नहीं रहेंगे। यदि ऐसा हुआ तो आपको स्त्रीवधका पाप लगेगा।

विश्वामित्रने कहा—भद्रे! हम तो शिव-शास्त्रोंकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले ब्रह्मचारी

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध *१०९७

हैं। समस्त व्रतधारियों और विशेषतः शिवभक्तोंका मूलधर्म हैं— ब्रह्मचर्यव्रतका पालन। अतः हम-जैसे लोगोंसे तुम फिर कभी ऐसी बात न कहना। व्रतधारी और शिवभक्त पुरुष सौ वर्षोंसे अधिक कालतक जो तपस्या करता है, वह एक बारके स्त्रीप्रसंगसे नष्ट हो जाती है। जो पापात्मा स्त्रीको स्वीकार करता है, उसका शिवोपासना-सम्बन्धी व्रत व्यर्थ हो जाता है। भगवान् शिवके भक्तोंको स्त्रियोंके साथ बातचीत करनेसे भी पाप लगता है, इसलिये तुम शीघ्र ही इस स्थानसे चली जाओ। तुम जीवित रहो या मर जाओ, परंतु मैं तुम्हारी इस बातको नहीं मानूँगा। व्रती पुरुषोंको स्त्रीवधकी अपेक्षा स्त्री-संगमसे ही अधिक पाप लगता है। स्त्रीवध करनेपर तो व्रती पुरुषोंके लिये विद्वानोंने प्रायश्चित बतलाया है, परंतु उनके संगमसे जो दोष होता है, उसका कोई प्रायश्चित ही नहीं कहा है। इसलिये तुमको यहाँसे चले जाना चाहिये। केवल व्रती पुरुषोंको ही स्त्रीसंगमसे पाप लगता है— ऐसी बात नहीं है। जो व्रतसे बाह्य हैं, ऐसे मनुष्य भी स्त्रियोंमें आसक्त होनेपर नीचे गिर जाते हैं। अतः समागमकी बात तो दूर रहे, जो बुद्धिमान् अपना कल्याण चाहे, वह स्त्रियोंके साथ वार्तालाप भी न करे।

सूतजी कहते हैं—विश्वामित्रजीकी यह बात सुनकर क्रोधमें भरी हुई मेनकाने उन्हें शाप दिया— 'ओ दुर्मते! मैं तुम्हारे प्रति अनुरक्त थी, फिर भी तुमने मेरा त्याग किया है; इसलिये आज ही तुम वृद्धावस्थासे जर्जर शरीरवाले हो जाओ। तुम्हारे बाल सफेद हो जायँ और शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जायँ।' उसके ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र उसी क्षण वैसे ही हो गये। तब वे भी कमण्डलुसे जल लेकर उसे शाप देनेको उद्यत हुए और इस प्रकार बोले—'ओ नीच! तुमने निर्दोष होनेपर भी मुझे शाप दिया है, इसलिये तुम भी शीघ्र ही जरावस्थासे जर्जर अंगवाली हो जाओ।' ऋषिके वचनसे वह भी तत्काल वैसी ही हो गयी। उस वृद्ध शरीरसे मेनकाने पुनः जाकर वहाँके जलाशयमें स्नान किया। स्नान करते ही वह पुनः पूर्ववत् रूप-लावण्यसे सम्पन्न हो गयी। यह महान् आश्चर्यकी बात देखकर ऋषि विश्वामित्रने भी तुरंत जाकर वहाँ स्नान किया और वे भी पूर्ववत् हो गये। उस तीर्थके माहात्म्यसे मेनका और विश्वामित्र दोनों रूप तथा उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न हो गये और प्रसन्नतापूर्वक एक-दूसरेसे विदा लेकर अपने अभीष्ट स्थानको चले गये। उस तीर्थका ऐसा माहात्म्य जानकर महर्षि विश्वामित्रने वहाँ देवाधिदेव महादेवजीका लिंग स्थापित किया और उस उत्तम तीर्थमें बड़ी भारी तपस्या की। उन्होंने उस सरोवरको और विस्तृत किया। वहाँ स्नान करके जो पुरुष उस उत्तम विश्वामित्रेश्वर लिंगका पूजन करता है, वह भगवान् शिवके लोकमें जाता है। आज भी उस तीर्थमें गंगाजलके समान पवित्रजल दिखायी देता है, जो सब पापोंको हर लेनेवाला है। जो श्रद्धायुक्त पवित्र हृदयसे वहाँ स्नान करता है, वह सर्वदेवपूजित विष्णुलोकको जाता है।


सरस्वतीतीर्थकी महिमा, राजा अम्बुवीचिकी मूकताका निवारण तथा राजाके द्वारा सरस्वतीदेवीका स्तवन

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! हाटकेश्वरक्षेत्रमें एक-दूसरा परम सुन्दर सारस्वततीर्थ है। वहाँ स्नान करनेवाला गूँगा मनुष्य भी बोलनेमें पटु हो जाता है तथा वह ब्रह्मलोकतकके सभी लोकोंमें अपनी रुचिके अनुसार जाता है। प्राचीनकालमें बलवर्द्धन नामसे विख्यात एक राजा थे, जो समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीको अपनी भुजाओंके बलसे जीतकर उसका उपभोग करते थे। उनके एक सर्वलक्षणसम्पन्न पुत्र हुआ। पिताने बारहवें दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बुलाकर उसका नाम अम्बुवीचि

१०९८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


रखा। तदनन्तर राजाका लाड़-प्यार पाकर वह बालक प्रतिदिन बढ़ने लगा, परंतु जन्मसे ही मूक होनेके कारण वह कुछ बोल नहीं सकता था। तत्पश्चात् उस बालकका सातवाँ वर्ष आनेपर राजा बलवर्द्धन मृत्युको प्राप्त हो गये। तब मन्त्रियोंने राजाके उसी पुत्रको राज्यसिंहासनपर बिठाया, क्योंकि उनके दूसरा कोई पुत्र नहीं था। इस प्रकार राज्यसिंहासनपर बैठे हुए बाल्यावस्थासे युक्त उस गूँगे राजाके राज्यमें सब ओर विप्लव होने लगा। जल-जन्तुओंकी भाँति बलवान् लोग सर्वत्र दुर्बलोंको सताने लगे। तब मन्त्रियोंने अपने पुरोहित वसिष्ठजीसे कहा—'महामुने ! इस राजाके बोलनेके लिये कोई उपाय कीजिये। इसकी जड़तासे ही सारी पृथ्वी उजड़ती जा रही। अतः कोई उचित उपाय कीजिये।' तब दीर्घकालतक विचार करके वसिष्ठजीने मन्त्रियोंसे कहा—'हाटकेश्वरक्षेत्रमें सब कामनाओंको देनेवाला सारस्वत नामक तीर्थ है, वहीं यह राजा स्नान करे।'

महर्षि वसिष्ठके कहनेसे राजा अम्बुवीचीने तत्काल जाकर उस तीर्थमें स्नान किया और उसी क्षण वे मधुर स्वरसे बोलनेवाले वक्ता हो गये। राजाने सरस्वतीदेवीका ऐसा प्रभाव जानकर बड़ी श्रद्धाके साथ उनका चिन्तन किया और नदीतटसे मिट्टी लेकर स्वयं ही सरस्वतीदेवीकी चतुर्भुजा मूर्तिका निर्माण किया। वे दाहिने हाथमें मनोहर कमल और नक्षत्रोंके तेजको तिरस्कृत करनेवाली अक्षमाला लिये हुए थीं तथा बायें हाथमें उन्होंने दिव्य जलसे भरा हुआ कमण्डलु और सब विद्याओंकी उत्पत्तिकी स्थानभूत पुस्तक ले रखी थी। ऐसी मूर्तिका निर्माण करके राजाने यत्नपूर्वक उसे शिलापृष्ठपर स्थापित किया और धूप, माला तथा चन्दनसे भक्तिपूर्वक उसकी पूजा की। तत्पश्चात् श्रद्धा-भावसे पवित्र हृदयके द्वारा उनके आगे शुद्ध एवं विनीत होकर नरेशने उच्च स्वरसे देवीकी स्तुति की—'देवि ! सत्-असत् (कारण और कार्य) रूप तथा बन्ध-मोक्षस्वरूप जो कोई भी वस्तु है, वह सब गुप्तरूपसे स्थित रहनेवाली तुम्हारे द्वारा व्याप्त है, ठीक उसी तरह जैसे अग्निके द्वारा ईंधन व्याप्त होता है। तुम्हीं सिद्धिरूपमें सब लोगोंके हृदयमें निवास करती हो। देवेश्वरि ! तुम्हीं जिह्वापर वाणीरूपसे और नेत्रमें ज्योतिःस्वरूपसे विराजमान हो। तीनों लोकोंमें एकमात्र तुम्हीं भक्तिभावसे ग्रहण करनेयोग्य हो। शरणमें आये हुए दीनों और पीड़ितोंकी रक्षामें तुम सदा तत्पर रहती हो। तुम्हीं कीर्ति, तुम्हीं धृति, तुम्हीं मेधा, तुम्हीं भक्ति और तुम्हीं प्रभा कही गयी हो। समस्त प्राणियोंमें निवास करनेवाली कान्ति, क्षुधा और निद्रा भी तुम्हीं हो। तुष्टि, पुष्टि, श्री, प्रीति, स्वधा, स्वाहा, रात्रि, रति, पृथ्वी, गंगा, सत्य, धर्म, मनस्विनी, लज्जा, शान्ति, स्मृति, दक्षा, क्षमा, गौरी, रोहिणी, सिनीवाली (जिसमें चन्द्रमाका दर्शन हो, ऐसी अमावास्या), कुहू (जिसमें चन्द्रमाका दर्शन न हो, ऐसी अमावास्या), राका, (पूर्णिमा), देवमाता अदिति, ब्रह्माणी, विनता, लक्ष्मी, कद्रू, दाक्षायणी, सती, शिवा, गायत्री, सावित्री, कृषि, वृष्टि, श्रुति, कला, वेला, नाडी, त्रुटि, काष्ठा (दिशा), रसना और सरस्वती सब कुछ तुम्हीं हो। इसके सिवा तीनों लोकोंमें और भी जो कुछ है, जो अधिक होनेके कारण मेरे द्वारा नहीं कहा गया हो, वह सब चेष्टायुक्त और चेष्टारहित वस्तुएँ तुम्हारा ही स्वरूप है। गन्धर्व, किन्नर, देवता, सिद्ध, विद्याधर, नाग, यक्ष, गुह्यक, भूत, दैत्य तथा विनायकगण आदि सब तुम्हारे ही प्रसादसे परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। अन्य देवता कष्टपूर्वक आराधना और पूजा करनेपर ही मनुष्यके पाप हरते हैं परंतु तुम केवल नाम लेनेसे सबका उद्धार करती हो।'

राजा अम्बुवीचीके द्वारा इस प्रकार स्तुति की जानेपर देवेश्वरी सरस्वतीदेवीने अत्यन्त हर्षित होकर कहा—भूपाल ! मैं तुम्हारी सुस्थिर भक्ति और इस स्तुतिसे बहुत सन्तुष्ट हूँ। अतः तुम शीघ्र ही मनोवांछित वर माँगो।

राजाने कहा—देवि ! आजसे मेरी प्रार्थना स्वीकार करके आप सदा इस तीर्थमें निवास करें और

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०९९

आपकी यह पूजनीय प्रतिमा त्रिभुवनविख्यात होकर इस तीर्थमें मेरी सुस्थिर कीर्तिके रूपमें विद्यमान रहे। जो यहाँ स्थित रहनेवाली आपकी आराधना जिस निमित्तसे भी करे, उसकी भक्तिके अनुसार उस कामनाको आप शीघ्र ही पूर्ण करती रहें।

सरस्वती बोलीं—राजन्! जो इस शुभ सलिलमें स्नान करके अष्टमी और चतुर्दशी तिथिको यहाँ मेरी पूजा करेगा, उसकी मनोवांछित कामनाओंको मैं पूर्ण करूँगी।

सूतजी कहते हैं—इस प्रकार परमेश्वरी सरस्वतीदेवी सब लोगोंके हितके लिये तभीसे वहाँ निवास करने लगीं। जो मनुष्य अष्टमी और चतुर्दशीको उपवास करके श्वेतपुष्प और चन्दन आदिके द्वारा वहाँ उनका पूजन करता है, वह जन्म-जन्ममें उत्तम वक्ता एवं मेधा (धारणाशक्ति)-से सम्पन्न होता है। सरस्वतीके प्रसादसे उसके वंशमें भी कोई मूर्ख नहीं पैदा होता। जो सरस्वतीदेवीके आगे धर्मकथा श्रवण करता है, वह उनके प्रभावसे तीन युगोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। जो सरस्वतीदेवीके मन्दिरमें सदा श्रद्धापूर्वक विद्यादान करता है, वह अश्वमेधयज्ञका फल पाता है। जो वहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मणको धर्मशास्त्रकी पुस्तक दान करता है, वह भी अश्वमेधयज्ञका फल पाता है। जो सरस्वतीदेवीके आगे खड़ा होकर वेदपाठ करता है, वह सम्पूर्ण अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है।


महाकालके समीप जागरणकी महिमा, राजा रुद्रसेनका पूर्ववृत्तान्त

सूतजी कहते हैं—पूर्वकालमें इक्ष्वाकु-कुलको आनन्दित करनेवाले रुद्रसेन नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे। सब गुणोंसे सम्पन्न कान्तिपुरी उनकी राजधानी थी और उनकी परम प्रिय धर्मपत्नीका नाम पद्मावती था। राजा रुद्रसेन वैशाखमासकी पूर्णिमाको सदैव रानी पद्मावतीके साथ थोड़ी-सी सेना लेकर चमत्कारपुरके क्षेत्रमें भगवान् महाकालका दर्शन करनेके लिये जाते और भगवान् महादेवके आगे स्त्रीसहित श्रद्धापूर्वक बैठकर रात्रिमें जागरण करते थे। उपवास करके महादेवजीका चिन्तन करते हुए रात बिताते थे। फिर प्रातःकाल उठकर स्नान करके धुले हुए वस्त्र पहन पवित्र हो ब्राह्मणों एवं तपस्वी जनोंको दान देते थे। साथ ही अन्य सहस्रों दीनों, अन्धों और कंगालोंको अन्न-वस्त्र बाँटते थे। इस प्रकार प्रतिवर्ष वे वैशाख पूर्णिमाको वहाँकी यात्रा करते और महाकाल देवके सामने रातभर जागते थे। इससे उनका सदा अभ्युदय होने लगा और शत्रु अपने-आप नष्ट होने लगे। एक समय उसी अवसरपर जब राजा हाटकेश्वरक्षेत्रमें आये तब उन्होंने देखा, महाकाल देवके समक्ष अनेकानेक देशों और दिशाओंसे श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ आये हुए हैं। वे सब वेदपाठमें तत्पर हैं और परस्पर देवों, ऋषि-मुनियों एवं प्राचीन राजर्षियोंकी कथा-वार्ता कर रहे हैं। राजाने क्रमशः उन सबको प्रणाम किया और स्वयं भी उनसे अभिनन्दित होकर एक ओर बैठ गये। कथा समाप्त होनेपर मुनीश्वरोंने पूछा—‘राजन्! तुम प्रतिवर्ष वैशाखी पूर्णिमाको दूर देशसे यहाँ आकर केवल रातमें महादेवजीके सामने जागरण करते हो। तीर्थोंमें जो स्नान, दान आदि अन्य क्रियाएँ बतायी गयी हैं, उन सबको छोड़कर पहले तुम इस जागरण-कार्यकी ओर ही ध्यान देते हो, अतः इसका फल क्या है, सो हम-लोगोंसे बताओ।’

राजाने कहा—विप्रवरो! आपलोगोंने जो कुछ पूछा है, वह यद्यपि गोपनीय रहस्यकी बात है, तथापि मैं आपसे कहूँगा। प्राचीन कालकी बात है, मैं वैदिश नगरके वैश्यकुलमें उत्पन्न हुआ था। मेरे पास धनका सर्वथा अभाव था। मेरे भाई-बन्धु पग-पगपर मेरा निरादर करते थे और

११०० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


अन्तमें उन्होंने मुझे त्याग दिया। तब मैं अपनी पत्नीको साथ लेकर परदेशको चल दिया। स्वराष्ट्रदेशको धन-धान्यसे सम्पन्न सुनकर मनमें उसीका चिन्तन करते हुए चला और मार्गमें भिक्षाका अन्न भोजन करता हुआ मैं क्रमशः आगे बढ़ते-बढ़ते आनर्त देशमें चमत्कारपुरके समीप आ पहुँचा। वहाँ मैंने स्वच्छ जलसे भरा हुआ एक सरोवर देखा, जो कमलवनसे सुशोभित था। भूख-प्यास और थकावटसे बहुत कष्ट तो पा ही रहा था, वहाँ पहुँचकर मैंने उस सरोवरके शीतल जलसे स्नान किया। तत्पश्चात् मेरी स्त्रीने मुझसे कहा—'नाथ! इस जलाशयसे कुछ कमल संग्रह कर लीजिये, जिससे आजका भोजन चले। यह पास ही इन्द्रपुरीके समान मनोहर नगर दिखायी देता है, वहाँ चलकर इन कमलोंको बेच लेना चाहिये।' तब मैंने बेचनेके लिये बहुत-से कमल संग्रह कर लिये और चमत्कारपुरमें आकर सब ओर भ्रमण किया। किंतु कोई भी मनुष्य उन कमलोंको खरीदता न था। भूखके मारे मैं दुर्बल हो रहा था। मेरा गला सूख गया था। उस समय सूर्यास्त हो गया। तब मैं वैराग्यभावको प्राप्त होकर स्त्रीके साथ एक टूटे-फूटे मन्दिरमें गया और उन कमलोंको पृथ्वीपर रखकर लेट गया। तदनन्तर आधी रात बीतनेपर मैंने गानेकी ध्वनि सुनी। तब मेरे चित्तमें विचार हुआ कि निस्सन्देह आज यहाँ जागरणका पर्व है। अतः चलूँ, यदि कोई मेरे इन कमलोंको मूल्य देकर ले लेगा तो भोजनकी व्यवस्था हो जायगी। ऐसा निश्चय करके कमल लेकर मैं अपनी पत्नीके साथ जहाँसे गीतकी ध्वनि आ रही थी, उसी ओर चल दिया। वहाँ जानेपर मैंने देवताओंके स्वामी भगवान् महाकालको श्रेष्ठ द्विजोंद्वारा पूजित होते देखा। वे द्विज भगवान्‌के आगे बैठकर जप और गीतमें लगे थे। कोई नृत्य करते, कोई गीत गाते, कोई होम करते और कोई धार्मिक उपाख्यान करते थे। तब मैंने एक व्यक्तिसे पूछा—'यहाँ क्यों जागरण किया जाता है?' उसने बताया कि—'आज भगवान् महाकालकी प्रसन्नताके लिये उपवासपरायण ब्राह्मणोंद्वारा भक्तिभावसे जागरण किया जाता है। आज वैशाखमासकी पुण्यमयी तिथि पूर्णिमा है। इस समय जो मनुष्य भगवान् महाकालके आगे भक्तिपूर्वक जागरण करता है, वह निश्चय ही स्वर्गलोकको प्राप्त होता है।' तब मैंने कहा—'भद्र पुरुष! मेरे पास कमलके फूल हैं। इनको ले लीजिये और बदलेमें मूल्य दीजिये, जिससे मेरा भोजन चले। तब उसने तीन पल सुवर्ण देना चाहा। यह देखकर मैंने सोचा, स्वयं ही क्यों न इन कमलोंसे देवेश्वर महादेवजीकी पूजा करूँ। जान पड़ता है, पूर्वजन्ममें मेरे शरीरसे कोई भी पुण्य नहीं हुआ था, इसीलिये इस जन्ममें मुझे ऐसी दुर्गति भोगनी पड़ती है; किंतु क्या करूँ, मेरी प्रियवादिनी पत्नीका गला भूखके मारे सूखा जा रहा है। इसमें सन्देह नहीं कि यदि अन्न उपलब्ध नहीं हुआ, तो यह कल जीवित नहीं रह सकेगी। इस प्रकार चिन्तामें पड़े हुए मुझसे मेरी विनयशीला पत्नीने मधुर वाणीमें कहा—'नाथ! धनके लोभसे इन कमलोंका विक्रय न कीजिये। आज अपने पास अन्न न होनेसे स्वतः उपवासव्रतका योग लग गया है। भूखके कष्टसे हम अबतक तो जागते ही रहे हैं, शेष रात्रिमें और भी जागरण कर लेंगे। हमने सरोवरमें दिनके समय स्नान करके देवपूजन किया ही था। इस समय भी इन कमलोंसे हम भगवान् महाकालका पूजन करें।' इससे हम दोनोंका परम कल्याण होगा।'

पत्नीके ऐसा कहनेपर हम दोनोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ कमलपुष्पोंसे महादेवजीका पूजन किया। भूखकी पीड़ासे नींद तो हमारे पास आयी नहीं। प्रातःकाल जब सूर्योदय हुआ, उस समय भूखसे पीड़ित होकर उसी स्थानपर मेरी मृत्यु हो गयी। तब मेरी पत्नीने मेरे शरीरको लेकर बड़े हर्षके साथ चिताकी अग्निमें प्रवेश किया। उसी पुण्यके प्रभावसे मैं कान्तिपुरका राजा हुआ और मेरी पत्नी दशार्ण देशके राजाकी

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११०१

पुत्री हुई, जिसे अपने पूर्वजन्मकी बातोंका भी स्मरण था। दशार्णराजने इसका स्वयंवर रचाया और उसमें इसने मुझे पहचानकर मुझको ही वरण किया और मैंने भी इसे अपने पूर्वजन्मकी पत्नी समझकर अपनाया। इसी कारणसे मैं प्रति वर्ष वैशाख पूर्णिमाको यहाँ आकर अपनी धर्मपत्नीके साथ महाकालदेवके सामने जागरण और पुष्प, धूप तथा चन्दन आदिके द्वारा उनका पूजन करता हूँ। ब्राह्मणो! उस समय तो मैंने बिना श्रद्धाके ही जागरण किया था तथापि महादेवजीकी कृपासे मुझे ऐसा फल प्राप्त हुआ। अब मैं जो श्रद्धापूर्वक शास्त्रोक्त विधिसे जागरण कर रहा हूँ, इसका फल भगवान् मुझे कितना उत्तम देंगे, यह मैं नहीं जानता।

यह सुनकर वहाँ आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने राजाको अनेक बार साधुवाद दिया और इस प्रकार कहा—'भूपाल! आपने ठीक कहा है, भगवान् महाकालके प्रसादसे इस भूतलपर कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। इसीलिये हमलोग भी प्रतिवर्ष श्रद्धासे यहाँ रात्रिजागरण करेंगे।' तदनन्तर राजा और उन ब्राह्मणोंने बड़े हर्षके साथ गीत, वाद्य, नृत्य, धर्मकथा आदि कार्योंको करते हुए महाकालजीके समीप रातभर जागरण किया। प्रातःकाल उठकर राजाने महाकालका पूजन किया और उन सब ब्राह्मणोंसे आज्ञा लेकर सेनासहित अपनी पुरीको प्रस्थान किया। तत्पश्चात् समयानुसार शरीरका अन्त होनेपर उन्होंने जरा और मृत्युसे रहित परम पदको प्राप्त कर लिया।

सूतजी कहते हैं—महर्षियों! इस प्रकार मैंने आप लोगोंके समक्ष भगवान् महाकालके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है।

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कलशेश्वरका माहात्म्य, नन्दिनी धेनुके द्वारा व्याघ्रयोनिको प्राप्त हुए राजा कलशका शापसे उद्धार

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! उसी क्षेत्रमें एक महापुण्यदायक कुण्ड है, जिसके तटपर कलशेश्वर-देवका निवास है। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। प्राचीन कालमें कलश नामसे प्रसिद्ध एक यदुवंशी राजा थे। वे विधिपूर्वक यज्ञ करनेवाले और सब लोगोंके हितमें तत्पर थे। एक समय महर्षि दुर्वासाके शापसे उन्हें व्याघ्र होना पड़ा था। व्याघ्ररूपमें वनमें रहते हुए वे बहुतसे ब्राह्मणोंको मारकर खा जाते थे। इस प्रकार उनका बहुत समय व्यतीत हो गया। कुछ कालके पश्चात् उस देशमें गौओंका एक मनोरम झुंड आ निकला, जिसके साथ बहुत-से गोप-गोपी थे। उस झुंडमें एक नन्दिनी नामक धेनु थी, जिसके थन बहुत मोटे थे और जो घड़ों दूध देती थी। वह धेनु घासके लोभसे आगे बढ़ती हुई एक कुंजके भीतर गयी तो वहाँ उसने भगवान् शंकरका लिंगमय स्वरूप देखा, जो बारह सूर्योंके समान तेजस्वी प्रतीत होता था। गौने बड़ी श्रद्धाके साथ वहाँ खड़ी होकर उस शिवलिंगको स्नान करानेके लिये उसपर बहुत दूधकी धारा बहायी। उसका यह नियम प्रतिदिन चालू रहा, किंतु इस बातको कोई नहीं जानता था। एक दिन उस स्थानपर तीखी दाढ़वाला वह व्याघ्र आया और दैवयोगसे नन्दिनी गायपर उसकी दृष्टि पड़ गयी। तब गौओंके समुदायमें बँधे हुए अपने छोटे बछड़ेकी याद करके वह गाय करुणस्वरमें विलाप करने लगी। फिर उसने मन-ही-मन कहा—'जिस सत्य एवं शिवभक्तिसे प्रेरित होकर मैं भगवान् शिवको स्नान करानेके लिये यहाँ आयी थी, उसीके प्रभावसे मुझे अपने बछड़ेसे मिलनेका अवसर प्राप्त हो।' इस प्रकार नन्दिनी जब करुण विलाप कर रही थी उस समय व्याघ्रने हँसकर कहा—'अरी! अब तो तू पूर्णतः मेरे वशमें है, क्यों व्यर्थ प्रलाप करती है?'

११०२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

धेनु बोली—मैं अपने लिये विलाप नहीं करती, भगवान् शिवकी पूजाके लिये आनेपर यदि मेरी मृत्यु भी हो गयी तो यह मेरे लिये शुभदायक ही होगी। किंतु मेरा बछड़ा, जो गोकुल (गौओंके झुंड)-में बँधा हुआ है, मेरे लौटनेकी राह देखता होगा। वह अभी दूध पीकर ही जीता है। सोचती हूँ, वह मेरे बिना कैसे जीवित रहेगा। महाव्याघ्र! बेटेके लिये मेरे हृदयमें स्नेह उमड़ आया है, अतः आज तुम मुझे छोड़ दो। मैं उसे अपनी सखियोंको सौंपकर फिर तुम्हारे पास लौट आऊँगी।

व्याघ्र बोला—तुम मृत्युके मुखमें आ गयी हो, अब यदि किसी प्रकार निकल जाओगी तो फिर उसी मृत्युके समीप कैसे लौट आओगी?

नन्दिनीने कहा—व्याघ्र! मैं शपथ खाकर कहती हूँ कि तुम्हारे पास लौट आऊँगी। ब्राह्मणकी हत्या करने और माता-पिताको छलनेसे जो पाप होता है, उसी पापसे मैं लिप्त होऊँ यदि पुनः लौटकर न आऊँ। रजस्वला स्त्रीसे सम्पर्क करनेवाले तथा नंगे सोनेवाले पुरुषोंको जो पाप लगता है, मैं उसी पापसे लिप्त होऊँ यदि मैं लौटकर न आऊँ। गौ, कन्या और ब्राह्मणोंको कलंकित करनेवाले लोगोंको जो पाप लगता है, उस पापसे मैं भी लिप्त होऊँ यदि पुनः लौटकर न आऊँ।

इन शपथोंको सुनकर व्याघ्रने कहा—यदि ऐसी बात है तो घरको जाओ और अपने पुत्रको जी भरकर देख लो। फिर उसे सखियोंको सौंपकर लौट आना। तदनन्तर नन्दिनी जहाँ उसका बछड़ा था उस स्थानपर गयी।

माताको रँभाती हुई देखकर बछड़ा बोला—माँ! आज तुम्हारा मन उद्विग्न क्यों हो रहा है?

नन्दिनी बोली—बेटा! पहले दूध पी लो, जिससे तृप्त होनेपर मैं तुमसे सब बात बताऊँ। उसकी बात सुनकर बछड़ेने यथोचित दूध पी लिया।

तत्पश्चात् बछड़ेने इस प्रकार कहा—माँ! आज जंगलमें जो कुछ घटना हुई है वह सब बताओ, जिसे सुनकर मेरा चित्त शान्त हो।

नन्दिनी बोली—वत्स! आज मैं घोर वनमें अपनी इच्छाके अनुसार घूमती चली गयी थी। वहाँ एक व्याघ्रने मुझे घेर लिया। वह मुझे खा लेना चाहता था, किंतु मैंने शपथके द्वारा उसे यह विश्वास दिलाया कि मैं गौओंके झुंडमें अपने बच्चेको देखकर फिर लौट आऊँगी। अनेक शपथ करनेपर उसने मुझे छोड़ा है। अतः अब फिर मैं वहीं जाऊँगी।

बछड़ेने कहा—माँ! आज तुम जहाँ जाओगी, वहीं मैं भी चलूँगा। यदि तुम्हारे साथ व्याघ्र मुझे भी मार डालेगा तो मातृभक्त पुरुषोंकी जो गति होती है, वही निश्चयपूर्वक मुझे भी मिलेगी। बालकोंके लिये माताके समान दूसरा कोई बन्धु नहीं है, माताके समान कोई रक्षक नहीं है और माताके सदृश दूसरी कोई गति नहीं है। माताके समान कोई पूज्य गुरु नहीं, माताके समान स्नेही सखा नहीं और माताके समान इहलोक या परलोकमें कोई देवता नहीं है*। ऐसा मानकर श्रेष्ठ पुरुषोंको सदा अपनी माताके प्रति भक्ति रखनी चाहिये। जो पुत्र मातृभक्तिको ही प्रजापतिनिर्मित परम भक्ति मानकर सदा उसका आचरण करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। अतः तुम इस गोकुलमें रहो, मैं ही व्याघ्रके समीप जाऊँगा और मैं अपने प्राण देकर तुम्हारे प्राणोंकी रक्षा करूँगा।

नन्दिनीने कहा—बेटा! आजके दिन मेरी ही मृत्यु नियत है, तुम्हारी नहीं; फिर तुम अपने प्राणोंसे मेरे प्राणोंकी रक्षा कैसे कर सकते हो? वत्स! तुम्हें तो अपनी माँके उपदेशका ही पालन करना चाहिये। वनमें भ्रमण करते समय कभी तुम प्रमाद न कर बैठना। अधिक लोभ होनेसे इहलोक और परलोकमें भी देहधारीका नाश हो जाता है। लोभसे मोहित पुरुष समुद्रमें, घोर


* नास्ति मातृसमः पूज्यो नास्ति मातृसमः सखा। नास्ति मातृसमो देव इहलोके परत्र च॥ (स्क० पु०, ना० ५१। १७)

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११०३ ---|---

जंगलमें और भयानक रणभूमिमें भी प्रवेश कर जाता है। लोभ, प्रमाद और सबपर विश्वास—इन्हीं तीन दोषोंसे प्रत्येक प्राणी बँधता और मारा जाता है; इसलिये लोभ न करे, प्रमादमें न पड़े तथा हर एकपर विश्वास न करे१। पुत्र! तुम्हें सदा प्रयत्न करके गहन वनमें भ्रमण करते समय सम्पूर्ण हिंसक जीवोंसे अपने शरीरकी रक्षा करनी चाहिये। दुर्गम स्थानमें यदि तृण और घास आदि हो तो किसी प्रकार भी उसे चरना नहीं चाहिये। अपना यूथ छोड़कर कभी अकेले नहीं जाना चाहिये।

इस प्रकार अपने बछड़ेसे कहकर और उसे बार-बार चाटकर नन्दिनीने अपनी सखियोंके पास वनमें जाकर कहा—बहनो ! मेरी बात सुनो। आज मैं अपने झुंडसे थोड़ी दूरपर घूमती हुई एक घने एवं निर्जन वनमें चली गयी, वहाँ मुझे एक व्याघ्रने पकड़ लिया; परंतु अनेक प्रकारकी शपथोंद्वारा उसे विश्वास दिलाकर मैं तुम लोगोंसे मिलने और बच्चेको देखनेके लिये यहाँ आयी हूँ। इस समय बच्चेको देखा, बातचीत की और इसे कर्तव्यका उपदेश भी दिया। अब इसे तुम्हारे अधीन सौंपती हूँ, इसको अपना ही बच्चा समझना। जानकर या अनजानमें मैंने तुम लोगोंका जो कुछ भी अपराध किया हो वह सब कृपापूर्वक क्षमा करना। मेरा यह दूधपीता बच्चा आजसे अनाथ हो रहा है। इस दीन, दुःखी, दुर्बल और मातृशोकसे सन्तप्त बालकका तुम सब लोग मिलकर पालन करना। यदि यह विषम स्थानमें घूमता हो, दूसरे किसी झुंडमें जाता हो या न करने योग्य कार्योंमें संलग्न होता हो तो तुम सदा इसे रोकती रहना। अब मैं, जहाँ वह व्याघ्र मेरी प्रतीक्षामें खड़ा है, वहाँ जाऊँगी।

दूसरी गौएँ बोली—नन्दिनी! तुम किसी प्रकार भी वहाँ न जाओ। हँसीमें या स्त्रियोंके बीचमें, विवाहकालमें, प्राणसंकटके समय तथा सर्वस्वका अपहरण होते समय—इन पाँच समयोंमें कही हुई असत्य बातें पाप नहीं मानी गयी हैं। इसलिये तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिये।

नन्दिनीने कहा—सखियो! दूसरोंके प्राण बचानेके लिये वैसा असत्य ठीक हो सकता है, परंतु अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये साधुपुरुष असत्यभाषणकी प्रशंसा नहीं करते। यह सम्पूर्ण लोक सत्यपर प्रतिष्ठित है, धर्म भी सत्यके ही आधारपर स्थित है, समुद्र सत्यवचनसे ही कभी अपनी सीमाका उल्लंघन नहीं करता२। दैत्यराज बलि भगवान् विष्णुको भूमिदान करके स्वयं पातालमें चले गये हैं। अपने उस सत्य वचनपर स्थित होनेके कारण ही वे पुनः वहाँसे बाहर नहीं निकलते। जो किसी बातकी प्रतिज्ञा करके उसका ठीक-ठीक पालन नहीं करता, उस चोर और अपवित्र बुद्धिवाले पुरुषने कौन-सा पाप नहीं किया है।

सखियोंने कहा—नन्दिनी! तुम समस्त देवताओं और दैत्योंके लिये भी वन्दनीय हो, जो कि सत्यकी रक्षाके लिये दुस्त्यज प्राणोंका त्याग कर रही हो। कल्याणी! तुम तो स्वयं ही धर्मार्थ वचन बोलनेवाली हो, समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न हो और सदा सत्यमें स्थित रहती हो। हमलोग तुम्हें क्या शिक्षा देंगी। महाभागे! जाओ, बच्चेके लिये शोक न करो। तुमने हमारे लिये जो आज्ञा दी है, उसका हम सब पालन करेंगी; परंतु हम इस बातको जानती हैं कि सदा सत्यमें स्थित रहनेवाले प्राणियोंका आरम्भ किया हुआ कोई भी कार्य निष्फल नहीं होता।


१- लोभात्प्रमादाद्विश्म्भात् पुरुषो बध्यते त्रिभिः । तस्माल्लोभो न कर्तव्यो न प्रमादो न विश्वसेत् ॥
(स्क० पु०, ना० ५१। २५)
२- परेषां प्राणयात्रार्थं तत्कर्तुर्युज्यते शुभाः। आत्मप्राणहितार्थाय न साधूनां प्रशस्यते ॥
सत्ये प्रतिष्ठितो लोको धर्मः सत्ये प्रतिष्ठिति । उदधिः सत्यवाक्येन मर्यादां न विलंघयेत् ॥
(स्क० पु०, ना० ५१। ४४-४५)